हम भारतीयों की बड़ी दिक्कत है. 26 जनवरी और 15 अगस्त को ‘कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैला, हे, भारत देश हमारा!’ जैसे प्रशस्तिगानों को सुनकर बिना अफ़ीम पिये नशे की पिनक में इतराते जितना भी रहें, हमें कश्मीर की ख़बर होती है, न कन्याकुमारी की. इन जगहों के वास्तविक भूगोल की ख़बर तो नहीं ही होती. भारतीय होते हुए जबकि मेरे साथ ऐसा एकदम नहीं है (शायद संवेदना, लेखकीय प्रतिभा, जीवन के प्रति अप्रतिम नज़रिया मेरे इस अनोखेपन, अद्भुतता का कारक हों?). कन्या व कुमारियों की बात उठते ही मैं ‘कितनी नावों में कितनी बार’ गुनगुनाता-मुसकराता आगे बढ़ जाता हूं. और कश्मीर तो मेरी नस-नस में है ही. साठ के दशक की शुरुआती हिंदी रंगीन फ़िल्मों के राजेंद्र कुमार-शम्मी कपूर-आशा पारेख-सायरा बानो-नंदा वाले दौर की ऐसी कोई कचरा फ़िल्म नहीं जो मेरे देखने से छुटी रह गई हो, या जिसके अनोखे गीतरत्नों से अपनी कापियों के अंतरंग कोने सज्जित न किये हों. इसलिए आप अपने साथ मेरी तुलना तो न ही करें. क्योंकि मैं जानता हूं कश्मीर क्या है. कन्या और कुमारियों को तो जानता हूं ही. लेकिन इस चर्चा का तात्कालीक संदर्भ आपके अज्ञान व मेरे संपूर्ण ज्ञान का नहीं.. फ़िलहाल इसकी वजह यह है कि पंद्रह अगस्त के पावन अवसर पर मैं भारतीयता की क्षुद्र सीमाओं से उठकर वैश्विक होना चाह रहा हूं. फैलना चाहता हूं. मुंबई के ट्रैफिक सिगनलों पर सस्ती पांच रुपल्ली वाली भारतीय झंडियों के दुष्चक्र से बाहर निकलना चाहता हूं.चूंकि मेरी कोई भी चर्चा येन-केन-प्रकारेण सार्त्र की चर्चा में बदलने को मजबूर हो जाती है, मैं पैरिस जा सकता था. मगर वहां पहले ही सच्चिदानन्द वात्स्यायन और निर्मल-टिर्मल पहुंच चुके हैं. फिर अपने अनोखत्व की आभा में अमरीका व यूरोप जाकर मैं पुरानी लीक पीटना नहीं चाहता. न ही डरबन व दक्षिण अफ्रीका पहुंचकर कोई राष्ट्रीय आन्दोलन छेड़ने की इच्छा है (दुनिया में पहले ही इतने आन्दोलन नहीं चल रहे? क्या हमें एक और नए आन्दोलन की दरकार है? कम-से-कम मुझे नहीं है. मैं शांति, बंधुत्व व कन्या-कुमारियों का पुजारी हूं). यही सब सोचकर मैं भावुक हो रहा था और भावुक होकर फिर से एशिया के नये पुनरुत्थान की सोचने लगा. कितने देश, कितनी दुनियाएं हैं- जिनका ओर-छोर जानना बाकी है. क्या चीन एक संभावना नहीं? क्या नगालैण्ड और असम न देख पाने की आंचलिकता मेरे चीन जाने के वैश्विकता की राह में रोड़ा बनेगी? बनने देना उचित होगा? क्या हमें, और ख़ासतौर पर मेरे जैसे अनन्य लेखक को चीन से सबक लेने की ज़रूरत नहीं? ‘एक बूंद सहसा उछली’ की तर्ज़ पर मैं अचानक एकदम-से चीन पहुंचने के लिए मचलने लगा. फिर ध्यान आते ही कि मुझसे पहले धर्मवीर भारती और मनोहर श्याम जोशी चीन पहुंच चुके हैं, मैं उदास भी हो गया. मगर क्या ये लेखकीय प्रतिभाएं(?) ज़रा भी भाव दिये जाने के क़ाबिल हैं? मेरी कन्याओं के सामने ‘कनुप्रिया’ कहीं भी टिक सकती थी? है? ‘अंधायुग’ और ‘गुनाहों का देवता’ लिखनेवाले से मैं कॉम्प्लेक्स ले रहा हूं? डज़ इट मेक एनी सेंस? फिर ‘भ्रष्ट्राचार’ और ‘हे राम’ जैसी फ़िल्मों के राईटर एमएसजो.. हू इज़ ही? ऑर वॉज़? कसप-टसप और कुरु-गुरु लिखनेवाला क्या किसी भी तरह मेरी प्रतिभा का मुक़ाबला करने योग्य है? था.. इवन कंसिडरेबल भी था? चीन को जिन अप्रतिम-प्रमुदित नज़रों से देख सकने में मैं समर्थ होता, क्या धर्मवीर और धर्मयुग की काली-सफ़ेद छपाई व डेटेड प्रिंटिंग टेक्नलॉज़ी हैंडल कर पाई होती? इस तरह एक झटके में इन सारे सवालों पर लात रखकर मैं चीन जाने के लिए प्रस्तुत हो गया.
मगर क्या चीन के भूगोल पर पैर रखने के पूर्व चीन के इतिहास पर एक सरसरी दृष्टिपात करना समीचीन न होगा? मैंने थोड़ी होशियारी खर्च की, कुछ दोस्तों को पट्टी पढ़ाई, उनके यहां से भारी पोथे उड़ाये.. दृष्टि गिराई और गहरे पाठ करने लगा. दो हज़ार वर्षों का गौरवशाली, विहंगम इतिहास.. चिंग डायनैस्टी, मिंग डायनैस्टी और जाने क्या-क्या तो डायनैस्टी.. जल्दी ही सिर दुखने लगा.. थकान होने लगी.
चीनी ड्रैगन सिरदर्द बाम के थोड़े इस्तेमाल के बाद मैं सोच में पड़ गया.. क्या चीन जाने के लिए चीन को जानना ज़रूरी था? अगर चीन को जान ही लेता फिर चीन जाने की ज़रूरत क्या बचती? फिर मेरे मन में अपनी अप्रतिम प्रतिभा के अनुरूप मानवीय सभ्यता का यह चिरन्तन प्रश्न भी उठा ही कि, ‘क्या मनुष्य कभी कुछ जान सका है?’ चूंकि मनुष्यता में मेरा हमेशा से अगाध विश्वास रहा है, मैंने तय किया चीन के इतिहास के पीछे समय खराब करने का कोई औचित्य नहीं, और चीन की ओर निकल पड़ा..
(शेष अगली किस्त में..)