Tuesday, August 21, 2007

क़ुर्रतुल आपा गईं!..

क़ुर्रतुल-ऐन हैदर गईं. बयासी वर्ष की ज़ि‍न्‍दगी कम नहीं होती, मगर ऐसी ज़्यादह भी नहीं होती. अपन इस गफलत में पड़े रहे कि कभी टहलते हुए नोयेडा पहुंचेंगे और आपा की पहुंची हुई ऊंची, उलझी शख्सियत की एक झलक लेकर इस चिरकुट जीवन को धन्‍य करेंगे, आपा ऐसी आसानी से निकलनेवाली पार्टी थोड़ी हैं, मगर देखिए, हम यहां हें-हें, ठी-ठी करते रहे और वह चुप्‍पे-चुप्‍पे निकल गईं!..

क़ुर्रतुल-ऐन हैदर उर्दू की थीं. मगर सबसे पहले इस मुल्‍क़ की थीं. हिन्‍दुस्‍तान में रहकर व उपन्‍यासों में दिलचस्‍पी रखनेवाले- किसी ने अगर ‘आग का दरिया’ नहीं पढ़ा, तो कोई बहुत ही अज़ीज़, तरंगोंवाली, बहुआयामी कथरस से वंचित बना रहा!

कथा-साहित्‍य रचने से अलग आपा ने अंग्रेज़ी में पत्रकारिता की, काफ़ी घूमना-फिरना किया, और आज भी- जबकि एक हिन्‍दुस्‍तानी औरत के लिए इस तरह का जीवन बेहद मुश्किल है- अपने वक़्त में अविवाहित, अकेली रहीं.

साहित्‍य अकादमी, सोवियत लैण्‍ड नेहरु सम्‍मान, ग़ालिब सम्‍मान, ज्ञानपीठ व पद्मश्री से सम्‍मानित मालूम नहीं क़ुर्रतुल अपने आख़ि‍री वक़्त में समय व समाज से कितना खुश थीं, अलबत्‍ता यह वे हमेशा जानती रही होंगी कि लगभग बारह उपन्‍यास, उपन्‍यासिकाएं रचकर इस देश के रसिक पढ़वैयों को उन्‍होंने कितना धन्‍य किया!

(ऊपर की तस्‍वीर आब्रो, फ्लि‍कर फ़ोटो से साभार)

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8 comments:

  1. उनका नाम उच्चारित करने में हमेशा अटकता रहा.. और उनको पढ़ने में भी..कुछ कहानियाँ पढी़ हैं.. मगर आग का दरिया अभी भी नहीं पढ़ी है..
    उम्मीद है वे अपने जिए हुए जीवन से मुतमईन हो कर गईं..

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  2. आग का दरिया छोड उनकी बाकी सभी किताबें पढी और कई कई बार पढीं । बहुत बचपन में ज़िलावतन पढी थी । अब तक बहुत हिस्से अक्षरश:याद रहे । गर्दिशे रंगे चमन और आखिरी शब के हमसफर बेहद अच्छी लगी थी । आग का दरिया पढना है।

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  3. इसी गफलत में हम भी थे कि कभी न कभी मिल ज़रूर लेंगे । रह गये बस !

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  4. अभी इस ख़बर से जूझ ही रहा था कि आपकी पोस्ट देखने को मिली। अपनी शर्तों पर जीना और अपनी शर्तों पर ही लिखना- दोनों मुश्किल काम है और वह भी इस समाज में किसी महिला के लिए। कुर्रतुल एन हैदर ने ऐसा किया। ... उनकी रचनाएं, आने वाली पीढ़ी को उनके होने की याद दिलाती रहेगी।

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  5. आग का दरिया तब पढ़ी थी जब कॉलेज में ही थे और उसी समय से " क़ुर्रतुल-ऐन हैदर" के फैन हो गये थे..उस समय कुछ किताबें और भी पढ़ी इनकी (अभी नाम याद नहीं) उनकी किस्सागोई सचमुच बेमिसाल थी.यह पता ना था कि वो नौएडा में ही रहती हैं.

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  6. काफी सुना था उनके और उनकी कृति आग का दरिया के बारे मे..कभी पढने का मौका नही मिल सका...आपकी पोस्ट पढकर ऐसा लग रहा है कि काश ऐसी शख्शियत की एक झलक लेकर इस चिरकुट जीवन को हम भी धन्‍य कर पाते.

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  7. बंदे ने दर्शन भी किया था। आग का दरिया भी पढ़ी है। फोन पर तो कई दफा बात हुई है। अपनी तरह की अकेली महिला थीं। मेरा यकीन है उनको जन्नत मिलेगा।

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