Thursday, August 23, 2007

अजनबियों के बीच सालगिरह..

“एक अध्‍ययन बताता है कि 20 से 40 वर्ष की आयु के दरमियान सालाना 1.2 के हिसाब से लोग मित्र गंवाते हैं. काम की भागदौड़, पारिवारिक ढांचे का कमज़ोर पड़ना, गाड़ि‍यों व तकनालॉजी पर निर्भरता आदि वजहें हैं जिसने हमें और ज़्यादा अकेला किया है. संचार तकनालॉ‍जी के रोज़ नई खोजों के बावज़ूद असलियत यह है कि ऐसे लोगों की संख्‍या बहुत ही कम होती है जिनसे हमारी क़ायदे की व अर्थपूर्ण बातचीत होती हो. हम घंटों मोबाइल फ़ोन और कंप्‍यूटर से संपर्क में बने होने की ग़लतफ़हमी पाले रहते हैं जबकि हमारा अपने निकट तक से नाता टूटा होता है. हम लगातार ‘बुलबुले-सी ज़ि‍न्‍दगी’ की ओर बढ़ रहे हैं जहां परिचितों, मित्रों से कटे हम अपने एकांतिक खोह में मगन रहते हैं.”

ये विचार हैं बहुचर्चित ‘एन इंटिमेट हिस्‍टरी ऑफ़ ह्यूमैनिटी’ के लेखक, मशहूर इतिहासकार, दार्शनिक थियोडोर ज़ेल्डिन के जिन्‍होंने अपनी 74वीं वर्षगांठ पर एक दिलचस्‍प प्रयोग किया. लंदन में कल मनाये उनके जन्‍मदिन पर दुनिया के हर हिस्‍से से हर कोई आमंत्रित था. बस एक छोटी-सी शर्त थी कि बर्थडे पार्टी में पहुंचने वाले मेहमान को किसी ऐसे अजनबी से ‘प्रॉपर कन्‍वरसेशन’ करना होता जिससे पहले कभी उसकी मुलाक़ात न हुई हो! इस ख़ास पार्टी में मेन्‍यू में खाना नहीं, बातचीत के विषय थे. समाज में बातचीत के महत्‍व पर ज़ेल्डिन ने 'कन्‍वरसेशन' नामकी एक किताब भी लिख रखी है.

थियोडोर ज़ेल्डिन की इस ख़ास पार्टी की पूरी ख़बर के लिए यहां देखें.

11 comments:

  1. थियोडोर ज़ेल्डिन को हमारी भी ढेर सारी शुभकामनाएं,अपनॊ से हम दूर होते जा रहे हैं.फिर अजनबियों संग बातचीत... और फिर अनजानों से मित्रता... मज़ेदार अनुभव होगा... चिट्ठे की भी तो यही खासियत है...बिना मिले अनजान मित्र...अटपटा फिर भी कितना सहज है.. अन्जान लोगों से मैं तो रोज़ ही मिलता रहता हूं..कभी कभी ही सुखद होता है...

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  2. जंनम दिन की शुभ कामनाये..

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  3. शानधारम्, किताब जुगाड़ता हूं।

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  4. अंतरजाल भी पुराने मित्रों से दूर कर रहा है पर अजनबियों को पास भी ला रहा है।

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  5. हमारे यहाँ के ज़ेल्डिन रेल मार्गों के साथ की दीवारों पर अपना निमंत्रण देते रहते हैं: रिश्ते ही रिश्ते.. मिल तो लें..

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  6. ज़ेल्डिन साहब को खबर करिये कि यह प्रगत-उन्नत समाजों की दिक्कत ज्यादा दिखती है .

    विकासशील भारत के अविकसित गांव-ढांणी में चले जाइये,ट्रेन के अनारक्षित डिब्बे या स्लीपर क्लास में चले जाइये ऐसा 'इन्टीमेट' और 'ऐनीमेटेड' संवाद होता मिलेगा मानो सारे फ़ैसले वहीं लिए जाने हैं . मानो देश-दुनिया का भविष्य उसी बात-चीत पर टिका है .

    अमर्त्य सेन साहब तो 'इंडियन्स' को परम्परागत रूप से 'आर्ग्यूमेन्टेटिव' बता ही गये हैं . सो ज़ेल्डिन साहब को बताइये कि हमारे यहां अज़नबियों से भी शास्त्रार्थ से लेकर गाली-गलौज तक की पुष्ट परम्परा है .

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  7. @सही फ़रमाते हैं, प्रियंकर बाबू,
    गांव-ढांणी व ट्रेन के अनारक्षित डिब्‍बों की शायद यही सच्‍चाई हो, मगर उससे बाहर एक विराट शहराती संसार भी है इस देश में. मोबाइलों और कंप्‍यूटरों पर बझी-बुझी-इतराई-खोई. उस दुनिया के लफड़े ज़ेल्दिन के आंके लफड़ों से बहुत अलग नहीं, ये आप अपने कोलकाता में भी देख ही रहे होंगे.

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  8. "हम घंटों मोबाइल फ़ोन और कंप्‍यूटर से संपर्क में बने होने की ग़लतफ़हमी पाले रहते हैं जबकि हमारा अपने निकट तक से नाता टूटा होता है."
    बहुत सही कहा,जर इसे भी देखे
    http://qatraqatra.blogspot.com/2007/08/blog-post_07.html

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  9. इन बातों मे सच्चाई तो है।

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  10. थियोडोर ज़ेल्डिन की ख़ास पार्टी की जानकारी के लिये आभार. बिल्कुल सच कह रहे हैं:

    पिछले वर्ष कुछ इसी से मिलते जुलते ख्याल पर बात की थी:

    http://udantashtari.blogspot.com/2006/08/blog-post_15.html

    कभी फुर्सत से देखियेगा.

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