Tuesday, August 21, 2007

हिंदी प्रदेशों में साहित्‍य की अतिशयता के फ़ायदे.. और काफ़ी सारा नुकसान

हिंदी ब्‍लॉगजगत में साहित्य के अतिशय बोझ पर संजय तिवारी की कल की चिंता पर हम ऑलरेडी चिंतित हो चुके हैं. मगर लगा अभी काम की कुछ और बातें जोड़ी जा सकती हैं, तो लौटकर चले आए. जिन्‍हें बुरा लगे वो मुंह बिचका लें.. ब्‍लॉगजगत में साहित्‍य का बोझ तो है, लेकिन उसे बोझ से ज़्यादा नागालैंड में भी क्रिकेट खेला जाता है जैसे रहस्‍य व रोमांचकारी तथ्‍य के बतौर देखा जाना चाहिए. क्‍योंकि आप और हम भले कयास लगा लें कि कोहिमा इसी देश में है, और हो न हो वहां के बच्‍चों में भी क्रिकेट का वही पागलपन होगा जो हमारी तरफ़ के बच्‍चों में देखा गया है, बीसीसीआई इसे मानने से मुकर जाएगी कि उसके गणित व चिन्हित बाज़ार से बाहर भी खेल-जीवन है. शायद जीवन हो, किंतु बीसीसीआई जो खेल खेलती है, वह न मिल पाये. हिंदी साहित्यिक संसार भी कुछ वैसा ही बहुआयामी है. एक खेल वह है जो कुछ प्रकाशकों की चतुर समझदारी से सरकारी खरीद व पुस्‍तकालयों, विश्‍वविद्यालयों में खेला जाता है, कुछ पुरस्‍कारों-सम्‍मानों में खेला जाता है, दूसरा वह है जो उत्‍साही कार्यकर्त्‍ता ब्‍लॉगजगत में खेल रहे हैं. दोनों की हम एक ही चीज़ के बतौर पहचान करें, यह स्‍वास्‍थ्‍यकर लक्षण नहीं. ज़रूरी तो एकदम ही नहीं.. श्रीलाल शुक्‍ल ने काफ़ी पहले (मार्च, 1993) लिखी एक टिप्‍पणी में विश्‍वविद्यालयी साहित्यिक योगदान को पहचानने की एक जहमत उठाई थी और मुंह की खाकर शर्मिन्‍दा हुए थे.. आईए, एक बार उनके लिखे से फिर गुज़रकर हम भी हों:
साहित्‍य-चर्चा

पिछले सप्‍ताह एक यात्रा के दौरान ट्रेन पर एक शिक्षित युवक से मुलाक़ात हुई. उन्‍होंने पढ़ने के लिए मेरी किताब उठा ली. किताब का नाम था: ‘अ अस्‍तु का’, लेखिका: ज्‍योत्‍सना मिलन. वे पन्‍ने पलटते रहे, अचानक बोले, ‘आप भी कुछ लेखक हैं क्‍या?’ मैंने पूछा, ‘क्‍यों?’ बोले, ‘लेखिका ने आपका नाम अपने हाथ से लिखकर आपको यह किताब भेंट की है.’ लेखक होने से इनकार करते हुए मैंने कहा, ‘वे मुझे जानती हैं, इसलिए किताब मुझे मुफ़्त मिल गई है.’ उन्‍होंने दो-चार पन्‍ने पढ़े, कहा, ‘बड़े विस्‍तार से लिखा है.’ मैंने पूछा, ‘ठस है?’ जवाब मिला, ‘ज़्यादा समझ में नहीं आयी.’

बातचीत में पता लगा कि पढ़ने के शौकीन हैं. ‘अ अस्‍तु का’ निर्मल वर्मा और कृष्‍ण बलदेव वैद को समर्पित है. ये दोनों नाम उनके लिए अजूबे थे. उन्‍होंने जिज्ञासा की, ‘आप कवि अंजनीकुमार को जानते हैं?’ मैंने खेद के साथ ‘नहीं’ कहा और मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय और सर्वेश्‍वर के बारे में पूछना चाहा, पर हिम्‍मत नहीं पड़ी. उनकी जगह मैंने अश्‍क का ज़ि‍क्र किया जिसका सही-सही मतलब उन्‍होंने आंसू बताया.

मुझे ज़रा भी झटका नहीं लगा. जो मन्दिर के जितना ही पास रहकर जितनी ही भक्ति दिखाता है, वह प्राय: उतना ही नास्तिक होता है. हिन्‍दी क्षेत्र के उत्‍तर प्रदेश में हिन्‍दी में बीए, एमए पास अधिकांश पाठकों की यही हालत है. अनेक परीक्षाओं में परीक्षक की हैसियत से मैंने न जाने कितने निबन्‍ध पढ़े हैं. उनके निबन्‍ध का एक बड़ा लोकप्रिय विषय है, ‘मेरा सर्वप्रिय लेखक’. उसमें मुझे प्राय: प्रेमचंद का एक रटा-रटाया निबन्‍ध पढ़ने को मिला है जिसमें लगभग हर बार यह वाक्‍य मिलता है, ‘प्रेमचन्‍द की भाषा अत्‍यन्‍त प्रांजल है.’ एक बार प्रतिष्ठित कवि और आलोचक तथा इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय में अंग्रेज़ी के प्रोफ़ेसर श्री विजयदेव नारायण साही ने इस विषय में थोड़ा बदलाव करके निबन्‍ध के प्रश्‍न में ‘मेरा सर्वप्रिय जीवित लेखक’ डाल दिया. वहां भी कुछ उम्‍मीदवारों ने तुलसीदास पर और अधिकांश ने प्रेमचंद पर निबन्‍ध लिखे. जीवित लेखकों पर दो-चार ही उत्‍तर आये. उनमें एक निबन्‍ध श्रीलाल शुक्‍ल पर था. पर वे श्रीलाल शुक्‍ल पूर्णिया के निवासी थे और ‘मैला आंचल’ उनकी सर्वश्रेष्‍ठ कृति थी.

साभार: आओ बैठ लें कुछ देर, राजकमल प्रकाशन, 1995.

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7 comments:

  1. आज आपकी पोस्ट आसानी से समझ आ गई। धन्यवाद !

    बाकी साहित्य की समझ न होने से कुछ कहने लायक नहीं हैं।

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  2. चलिए, एक अच्‍छा मसला छेड़ दिया। इस पर विनोद भाव से नहीं, थोड़ी संजीदगी से और कुछ दूर तक बात करनी चाहिए।

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  3. श्रीलाल शुक्ल का अनुभव सच का आईना है। लेकिन यही हिंदी पाठक प्रेमचंद की ज्यादातर रचनाओं से वाकिफ होते हैं। राहुल सांकृत्यायन को भी जानते हैं। गुलशन नंदा से लेकर समीर तक को पढ़ते हैं क्योंकि ये लोग उनकी इमोशंस को छूते हैं, साहित्य के नाम पर पूर्वाग्रह और भाषण नहीं पसोरते।

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  4. माफी चाहूँगा… पर हिंदी साहित्य की अतिशयता शब्द देखकर हंसी आ रही है… हिंदी हमारी मातृभाषा जरुर है पर इसका सबसे कमजोर पक्ष समृद्ध साहित्य का अभाव ही रहा है… चाहे अंग्रेजी हो… फ्रेंच हो या जर्मन इनकी तुलना में हमारे साहित्य कितने समृद्ध हैं यह विचारणीय प्रश्न है…।

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  5. इसका मतलब यही है कि अपने देश में सब बराबर हैं। ये नहीं कि आप साहित्यकार हो गये तो दुनिया आपके बारे में जान जायेगी।:)

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  6. @अनूप जी,
    सही फ़रमाया आपने.. अज्ञान के मामले में अपने यहां पूरी लोकशाही है..

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