Saturday, August 25, 2007

एक पतनशील बिम्‍ब..



अरे, ओ कालजयी अजेय रवि!
बाहर निकल, सजीली सवि
(मेरे दोस्‍त की गर्लफ्रेंड
का नाम.. मेरी भी है)
देख, आया है तुझे जीतने
अनरीडेबल रेनेगेड कवि!
अंकवार भर, स्‍वागत कर!

नया-नया धंधा है मगर पैर
फैला रहा हूं प्रकाशक थोड़ा
भाव दे रहा है मैं ज़्यादा खा रहा हूं
करीने से फंदे सजा रहा हूं.

प्रकाशक की नई गाड़ी से शहर
देखने का मज़ा ही कुछ और है
वैशाली से चढ़ा हूं, बल्‍लीमारान
होता वसंत विहार जाऊंगा
एसएमएस और एमएमएस से
दोस्‍त की गर्लफ्रेंड पर ज़लवे बिखेरूंगा
बुढ़ऊ आलोचक को सेटियाऊंगा
लम्‍बी कविता के शिल्‍प में छोटी
ठेलूंगा और छोटी का बैलून फुलाऊंगा
ओह, आत्‍मरति का विज्ञापन सामाजिक
चिन्‍ताओं के पोस्‍टर-सी चिपकाऊंगा
सारे रास्‍ते गा-गा-बां-बां गाऊंगा?

लिखा होगा विष्‍णु खरे ने ‘शिविर में शिशु’
केदार ने ‘त्रिनिदाद’, मैं अंवागार्द लिखूंगा
आप हंसियेगा तो आपकी दो कौड़ी की हंसी
माफ़ कर दूंगा, हलके से मुस्‍करा लूंगा
आपकी साहित्यिक अदा के
फीतों से जूते बांध लूंगा
आप अचकचाकर ऐं-ऐं करेंगे मैं
बिना हें-हें करता आगे बढ़ जाऊंगा!

5 comments:

  1. अब और कितना गिरेंगे..? कुछ दूसरों के लिए छोड़ दीजिये..

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  2. आपने अच्छी बखिया उधेडी. मजा आयेगा लोगो को, हमे भी आया.

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  3. आपकी साहित्यिक अदा के
    फीतों से जूते बांध लूंगा
    काफी इन्नोवेटिव होते जा रहे हैं आप !!यह चीन यात्रा का परिणाम तो नही ??

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  4. अपना तो इस पर अमल करने का इरादा है

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  5. कितना तो सही जा रहे हैं । और कितने लोगों को मशाल भी दिखा रहे हैं । इसी पतनशीलता में प्रगतिशीलता छिपी हुई है । ओह कितने अवांगार्द । लेकिन कितने अनरीडेबल भी ।

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