Sunday, August 26, 2007

हम इतने ठस क्‍यों हैं?

व्‍यक्ति के सीखने की सीमा क्‍या है, क्‍यों है? आदमी कितना और कबतक सीखता रहता है (कब तक लिखूं, या कबतक) ? क्‍या ज्ञानदत्‍तजी ने कभी मैंडारिन या मलयालम सीखने पर विचार किया? याकि अपने हिंदी सीख लेने से ही वे गदगद बने रहेंगे? कभी अपने ड्राइवर को अंग्रेज़ी सिखाने का विचार आया? या उसके सीखने की सीमा पर एक राय बना, अपने सिखा सकने के उद्यम को उन्‍होंने एक बन्‍द किताब मान लिया है? अनूप शुक्‍ला और अच्‍छा लिखने, और मुझसे लगातार सीखते रहने की दिशा में प्रयासरत हैं, या ‘बहुत आगा चल आये, गुरू, अब और आगे जाये का आइडिया गड़ही में गिरना होगा!’ सोचकर हाथ खड़े कर दिए (दिए कि दिये?) हैं?..

अभय के हर नए पोस्‍ट में मैं हिज्‍जे की ग‍लतियां निकालता रहता हूं.. बच्‍चा जिज्ञासु व ‘सीखनोन्‍मुख’ छात्र की तरह उत्‍साह से उन्‍हें सुधारता भी रहता है.. लेकिन पंक्‍चुएशन और स्‍पेस डिस्‍ट्रीब्‍यूशन पर मेरी ऐसी ही नेक़ सलाहतों का रवीश या प्रत्‍यक्षा पर अब भी वाजिब असर नहीं पड़ा है.. अविनाश के वामपंथी कमिसार वाले कोड़े-सी ज़बान पर तो नहीं ही पड़ा है! शायद ये लोग मेरे महीन व ज़हीन ज्ञान और भाषायी प्रकांड प्रवीणता के जिज्ञासु इच्‍छार्थी विद्यार्थी नहीं.. ऐसे लोगों से सीखने की कैसी भी उम्‍मीद करना व्‍यर्थ है? फिर कैसे लोगों से सीखने की कैसी उम्‍मीद करना सार्थक है? भारतीय पुरूष-बर्चस्‍ववादी मानसिकता विनम्रता, आदर व सहोदरता के पाठ सीखेगी? कविता के लिए कच्‍चा (और ज़्यादातर घटिया) माल इकट्ठा करते हिंदी ब्‍लॉगर्स क्‍या कभी सचमुच व सच्‍ची कविता लिखना सीख पाएंगे? अच्‍छा मनुष्‍य बनना? मैं? सम्‍भव होगा?

मालूम नहीं, असिखेबल जन-गण! क्‍योंकि मैंने देखा है डिक्‍शनरी खरीदना मैं सीख गया हूं, लेकिन उसका इस्‍तेमाल सीखने के सवाल पर अब भी कांखने लगता हूं. अविनाश ने क़ुर्रतुल आपा के जाने पर ‘भाग गया! दौड़ गया! देखा! लिखा!’ वाली लिखाई की अदायें सीख ली हैं, किंतु क़ुर्रतुल के लिखे को पढ़ने के नाम पर अब भी, पहले की ही तरह, उदासीन हैं.

पश्चिम में पुरानी परम्‍परा है, लोग अपनी नई रुचियों को पर्स्‍यू करने के लिए उम्र के किसी भी मोड़ पर एक नया करियर शुरू कर लेते हैं (विविध रुचियों के दबाव में इसीलिए मैं आजतक एक करियर खड़ा करने के झंझट से बचा रहा!). जबकि हमारे यहां पुरानी व नयी दोनों परम्‍पराओं में देखा गया है कि किसी एक लाइन से लग जाने के बाद लोग ताउम्र उसी लाइन को पीटते रहते हैं. मकान बदलने तक के ख़्याल से लोगों को दहशत होती है (रवीश ने दिल्‍ली में एक अच्‍छा मकान मेरे लिए खोज रखा ही है, लेकिन बंबई वाले को छोड़ने के विचार से मेरा वजन घट रहा है! शायद वजन घटाने के मोह में ही मैं राजधानी को अपनी प्रतिभा से उपकृत करने से बच रहा हूं?).

हम आख़ि‍र इतने ठस क्‍यों हैं? आप क्‍यों हैं?

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13 comments:

  1. सचमुच हम ठस हैं..कम से कम मैं तो हूँ..एक जॉब चेंज करने में लगता है सब कुछ बदल जा रहा है..नया कैरियर शुरु करना हो तो क्या हो ??आप सब को तो सिखा रहे हैं..हमको क्यों नहीं?? चलिये कुछ दिनो बाद आते हैं फिर लड़ते हैं आपसे भी.

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  2. सवाल अच्छा है। पर आखिर हम ठस क्यों हैं ?

    कहते हैं बदलाव के अलावा कुछ भी स्थाई नहीं है। फिर भी बदलाव से झगड़ते झगड़ते उम्र बीत जाती है।

    अनजान चीजों से हमेशा डर लगता है। अँधेरों का एक ही मतलब मालूम है। उजाले का नहीं होना। स्वयं अँधेरों के कितने रंग हैं ,राम जाने। फिर उजाले के ही इतने रंग हैं। और सभी को साफ दिखाई भी देते हैं। उजालों से भिड़े या अँधकार को समझे और भेदें।

    शायद मैं आलसी हूँ ,इसलिये ठस हूँ,....या इनर्शिया ज्यादा है इसलिये, शायद मुझे विस्थापित कर सकने जितनी ऊर्जा ही नहीं आसपास इसलिये ठस हूँ, शायद कोई लैंडमार्क हूँ इसलिये....। कोई कब तक सुधारे हर रोज़ दिशा, नक्शा...जगह , पहचान....। फिर मैं चाहूँ या ना चाहूँ बदल तो मैं रही हूँ....हाँ किसी और के सम्मोहन में। इतनी ठस हूँ कि प्रतिरोध को भी बदलना नहीं चाहती...अगर कोई इससे बढ़कर आ जाये जहाँ चाहे ले जाये।

    सीखने की कोशिश करने को तैयार हूँ...
    क्या एड़मिशन चालू है??

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  3. @बेजी जी,
    बधाई, बधाई.. इसको कहते हैं रीयल स्‍टूडेंट स्पिरिट! मेरे डिक्‍शनरी के इस्‍तेमाल वाला रगड़ा लेके अभी से शुरू हो जाइए!

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  4. मैंने जीवन में २२ मकानों को अपना घर कहा है । १९ गाँवों , कस्बों, शहरों में रही हूँ । ११ प्रान्तों व २ देशों में अपना घर बसाया व फिर छोड़ा है । क्या मैं भी ठस की श्रेणी में आऊँगी ?
    घुघूती बासूती

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  5. @नहीं, घुघूती बासूती जी,
    सवाल ही नहीं उठता! आप 'विशिष्‍ट' वाली श्रेणी में आती हैं! मैं तो 'महान' वाली श्रेणी में आता ही हूं?

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  6. ये विशिष्ट के पहले 'अति' नहीं लग सकता क्या ? केवल एक सुझाव है । शब्दों की कंजूसी महान लोगों में कुछ ठीक नहीं लगती ।
    घुघूती बासूती

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  7. दिमाग खुराफ़ात करता रहता है - सो ठस तो नहीं हैं. मंडारिन/मलयालम सीखने का विचार तो नहीं आया, पर रोज नया सीखने की ललक तो रहती है. कभी-कभी हताश भी होते हैं.

    धत! यहां कन्फ़ेशनात्मक क्यों हुआ जाये! :)

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  8. हम तो इतने ठस हैं कि कमेंट लिखने में ही हाथ टूट रहे हैं, मराठी, उर्दू सब आधी-आधी सीखके छोड़ दी है. कई किताबें लिखने का मंसूबा दिल में लिए ऊँघ रहे हैं. ठस होने पर अपना बस नहीं है.

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  9. एक महान व्यक्ति दूसरे से कैसे सीख सकता है , ऑसमोसिस के लिये लेवल डिफ़रेंस होना चाहिये न । वैसे आप महान बनते ही और स्वघोषणा करते ही अभय की गलत हिज्जे वाले बिरादरी में क्यो‍ चले गये ?
    थोडे और मेहनत की आवश्यकता है । लगे रहिये । अभय माफ़ करिये ये हिज्जे की गलतियों वाली बात प्रमोद जी के लेख से ज्ञानप्राप्ति हुई है । वैसे ठसत्व का अपना अलग आनंद है ये महान बनने के बाद पता चला ।

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  10. अच्‍छा हुआ आपने जगा दिया ।
    अपने हम अपनी ठस्‍सई को खत्‍म करके कुछ ना कुछ सीखने में जुट रहे हैं ।
    फिलहाल सोच रहे हैं कि क्‍या सीखें ।
    बिल्‍कुल वैसे ही जैसे आप अपने ब्‍लॉग पर अधलेटी मुद्रा में विराजे थे और
    सोच रहे थे उठ जाएं या पड़े रहें ।
    हम उठ तो गये अब सोच रहे हैं
    क्‍या सीखें ।

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  11. महुआडीह की सरस्वती सभा ने जब हमें नामिनेट कर दिया प्रभो,तो काहे को कुछ सीखें जी। बड़का बड़का सीखे पड़ें हैं, उन्हे ना मिला यह सम्मान। वैसे जी मैंने तो शुरु इस स्टेटमेंट से किया था कि ब्रहमांड का सबसे धांसू रचनाकार हूं, मैं।
    बाद में अनामदासजी ने मुझे सलाह दी थी कि इसकोयूं एडिट कर लें-
    ब्रह्मांड का सबसे धांसू रचनाकार मैं हूं,
    किसी को कोई शक हो., तो मुझसे पूछ ले।
    पर शक होता है, लोगों की बुद्धि पर किसी ने पूछा नहीं, सो हम तो धांसू ही हैं।
    पर आपको हम परम धांसू मान लिये हैं।
    दिल्ली जल्दी आयें, तो फिर आपसे सीखने रोज आयेंगे, यह पक्का रहा। कब आ रहे हैं दिल्ली।

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  12. हमें तो कई साल पहले मुंबई के ही एक पार्ट-टाइम ज्योतिषी ने कुंडली देखकर बता दिया था कि आप मरते दम तक सीखते रहेंगे। तो...हम क्यों मान लें कि हम ठस हैं और जब नहिंये हैं तो सोचें क्यों कि ठस क्यों हैं? ठीक है?

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  13. सही है। अज्ञानी का आत्मविश्वास बड़ा तगड़ा होता है।

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