Saturday, August 18, 2007

डारलिन, आई लभ यू इन गुट टैम एंड बैट..

रामजीत राय का नैहर गई पत्‍नी बेबी को पत्र..

ऊ वाला ग़चल सुनी थी कि नहीं- चांद के देवार न तोरी, प्‍यार भरा दिल तोर दिया? अबहीं ले लाइफ में सच्‍चल-सच्‍चले चल रहा था, मगर ऊहो हाथ झारके बेगाना ठाड़ा हो गया है.. पेयार भरा दिल त पहिलही से टूटल था, ऊको तोर के तू अपना मम्‍मी का हिंया जाके बइठे गई हो, लेकिन हिंया, घर का पेछाड़ा वाला देवार, चांदी का नहीं मिलावटी सिमेंटे का था, तब्‍बो पक्‍का तो थइय्ये था न जी, चार दिन का बरसाती में जाने कल रात कब्‍ब भर्र-भर्र होके बइठ गया! सकाली पापाजी अंजुरि में डाबर मंजन डालके अंगना का ओर गये त उनका देमागे फेल हो गया.. सुबहे-सुबह पांड़े, दुबे, बिसेसर चाचा, पदमा मौसी सबको मां-बहिन गरियाने लगे.. एतना गंदा-गंदा गारी बोल रहे थे कि हम तीन दिन पुरनका नूजपेपर का पीछा मुंह लुका लिये.. देवार का दूसरका तरफ एगो गइया चुप्‍पे-चुप्‍पे घास चर रही थी.. हाई टेन्‍चरेचर सुनके ऊहो मुंह उठाके देखी कि कौन बात का हल्‍ला है त पापाजी एगो चइली खींचके गायो मइया को मारे! हम तड़ देना माथा छूके मने-मन माफियो मांग लिये लेकिन तबहंही मम्‍मीजी जाने कौन जनम का हमसे बैर नेकाले लगीं. मुंह पे अंचरा रक्‍खे, हमरा डरेक्‍सन में देखके बुलका चुआके बोले लगीं- जबले हम अप्‍पन लइका का बियाह किये हैं, हमरा जिनगी में संकट का पहारे टूट गइल है..

पापाजी का मूट तो फर्र-फर्र जरे रहा था, जाने कौन बात का सुलकाहट में आके हमको एगो कंटाप मार दिये! फिर बरबराने लगे कि साला, मूतने का लिये दस दफा देवारी पे जाते हो, देवार टूट रहा था, तुमको धियान नै गया? सुबही-सुबह गिरल देवार देखके, फिर ऊपरी से कंटाप खायके हम्‍मो अकबका गये, त मुंह से निकले गया- अरे, कोची ला मार रहे हैं? देवार पे देखे हैं कभी हमको ठाड़ा हुए? नीम का पेर का तरफ जाते हैं, देवार वाला साटकट त आपे यूज करते हैं!..

मुंह से निकले का बाद अंजाद हुआ कि पापाजी का आगे एतना नहीं बोले के चाहिये था.. मगर अब त बोल दिये थे! त ऊ बूढ़ ससुर एगो टूटही छाता से हमको ऊ मारीस है, ऊ मारीस है, कि का बोलें, सलम! अबहीं ले ऊपरी से नीचे ले अंग-अंग पिरा रहा है! अऊर ऊ मुरचा खाया टूटही छाता ससुर ई नै कि हमरा मरदाना देह का चोट खाके भंग हो जाय.. हम्‍में भंग हुए हैं, छतवा का डंडी अब्‍बले सलामत है!

सुबहे-सुबह मूट खराब हो गया. रात में त खराबे था. मम्‍मीजी पे बहुते मन लहक रहा था कि अपना डायलाक कवनो दूसरका डैरक्‍सन में देखके नहीं बोल सकती थीं? ऊहो पगलाय रही हैं, बात-बात में आजकल पहार, बांध अऊर जाने कौची-कौची टूटे का बात बोलती रहती है!

छतरी घोमा-घोमाके जब पप्‍पाजी का हाथ बेथा गया त चिंचिया के हमको बहरी चइली कलेक्‍सन का बास्‍ते भेजे (अरे, ऊहे जेकरा से खींचके गइया मइया का डैरक्‍सन में मारे थे).. सगरे सुबह का डेरामा से येहिये फयदा हुआ कि गाय माता बहरी गोबर का चार गो चोथा छोर गई थीं.. मम्‍मीजी का पूजारुम का अब आज ओही से लिपाई होगा.. मगर ई टूटही देवार का मरम्‍मत कंहवा से होगा? करीगर का खोज में वही बास्‍ते हम मर्किट तरफ आये हैं, तूको चारगो लाइन लिखके मन का दुख कमाय रहे हैं (सब ओर तबाहिये-तबाही है, शिवाला का सीढ़ी पर पानी फैला हुआ है. मोती बाबू का चक्‍की में पानी घूस गया है. करीगर ससुर आज खूबे बिची रहेगा, एगो टूटल देवार का मरम्‍मत बास्‍ते ऊ काहे ला आयेगा? केतना बरसाती हो रहा है, जी, ए साल? तोहरो तरफ हो रहा है?).

जल्‍दी ले चिट्ठी पठाओ, ई टूटल मूड का बेहाली को अपना परेम का लाइट से उजियार कै दो!

तुम्‍हारा हिरदय सम्राट रामजीत

Technorati tags: ,

8 comments:

  1. वाह क्या भासा है , क्या इस्टाइल है , मजयो आ गया ।
    बहुत बढ़िया लिखा है आपने ।
    घुघूती बासूती

    ReplyDelete
  2. बहुते दिन पर. बढिया. चीन से लौका का पिर्मोत भाय?

    अउर सब का हाल है?

    ReplyDelete
  3. हँसी आती है पर कुछ सोच के नही आती..

    ReplyDelete
  4. रमजीतवा को बेबीराय कब भेटायेगी? दूर रहकर उसका लभ तो अच्छे लग रहा है.काहे बदे बेबी अतना दूर है रमजितवा से एक बार तो मिलवा दीजिये.फिर देखा जाय रमजितवा का लभ का श्टाइल कौने तरह का होता है.. बढिया चल रहा है यहां हम रामजीत का पत्र सार्वजनिक कर दिये हैं घर में हम उसका लभ लेटर जोर जोर से पढ कर सुनाते है और घर में बैठी पारिवारिक जनता लहालोट हुई जाती है.

    ReplyDelete
  5. रमजितवा रुमैंटिक आदमी है बेचारा, उसको ऐतना बेदरदी पिटवा के का लेखकी झाड़ रहे हैं। मेहरारू भी भागल है और बाप कूच रहा है और आपको तनिको माया नहीं लगता है।

    ReplyDelete
  6. हा, हा!!

    बहुत बढ़िया मनोरंजक.

    ReplyDelete
  7. यह हुई खांटी अजदकी और मस्त पोस्ट! इसमें तो आनन्द ही आनन्द आया. कोई लिंक करने का मुद्दा ही नहीं है.
    पर यह चीन के रास्ते कैसे आ रहा हैं. वहां भी जलवृष्टि हो रही है क्या?

    ReplyDelete
  8. शानदार! दुख कमाय रहे हैं। बहुत अच्छा। अपने एक बंगाली बास की याद आ गयी। कम करने के लिये कहते थे- कमाओ।

    ReplyDelete