Monday, August 27, 2007

दु:ख का अकेलापन

सत्‍यनारायण की कथा पर सब बुलाना चाहते हैं, सुख बड़ा सुखी रहता है. कब देखा है किसी ने सुख को सुना है कोई असुविधा की बात. हसंकर बात करते हैं लोग, मोबाइल हर वक़्त बिज़ी रहता है. भागती सवारी रोक एक शिकायत करता है- क्‍या महाराज, आजकल तो आपके दर्शन ही नहीं होते, ऐसा गजब मत कीजिए, सरकार! बच्‍ची तुनककर कहती है- मेरे साथ भी खेलो ना, अं‍कल, प्‍लीज़? मिलनेवालों की कमी नहीं रहती, मन कैसी तो अठखेलियों में डूबा गदबद भरा-भरा रहता है. मुसकराता नींद में बुदबुदाता है, सुख, ओह, कितना सुखी है तू!

जबकि दु:ख को देखते ही लोग परदा खींचने लगते हैं. बच्‍चों को मां छिपाती है, बाप खुद को छिपाता है मोबाइल बंद करके बरबराता है- साले, आये सामने तो सिर तोड़ दूंगा! ढेरों दरवाज़ों से टूटा सिर और बद्-दुआओं की गठरी लिए दु:ख भरी दुपहरी फिरता है सड़कों पर आवारा. नंगे पैर काली बियाबान रातों में कहीं भी रोने लगता है कभी भी. उसके सिर पुरखों का हाथ नहीं होता, उसके लिए नहीं गाती गीता दत्‍त दर्दभरे विरह के गीत.

मन्दिर की पुरानी, काली सीढ़ि‍यों पर अभाव में टूटकर कहता है एक दिन, ‘खुशी जीने की क्‍या, मरने का ग़म क्‍या’. प्रभु आंख मूंदे धीमे मुसकराते हैं- अच्‍छा भजन गाता है, बच्‍चा! उदासी के लम्‍बे पथरीले पुल पर जीवन दु:ख का खिंचा चला जाता है.

4 comments:

  1. हैं सबसे मधुर वे गीत....

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  2. अच्छा भजन गाता है बच्चा!

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  3. दूखी होगा पहला कवि, गमो से उपजा होगा गान..

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  4. तेरी गली में अपने सुख के लिये दुख के कंकड़ चुनता है......

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