Tuesday, August 28, 2007

ओय-होय, राखी बंधा ले, भइया!.. अच्‍छा?..

सुबह से कितनी मिठाई अंदर डाल चुके हैं? बोलिए, बोलिए! सवाल सामने आते ही अकबका गए? आं?.. अकबकानेवाली बात है ही.. क्‍योंकि मैंने नहीं डाला है.. हाथ पर तागा भी नहीं!..

मिठाई (और जाने क्‍या-क्‍या?) अंदर लेते हुए एक बार भी मेरा ख़्याल नहीं आया? कि इतनी मिठाई आप सर्कुलेशन से हटा रहे हैं, और मैं नहीं हटा पाने पर कैसा कड़वा-कसैला फ़ील कर रहा होऊंगा?.. एक बार भी? जस्‍ट वन सिंगल टाईम?.. और जब देखो दुनिया के बिगड़ते हालात, मानवता और ब्‍लॉग-बंधुत्‍व की ठुमक-ठुमककर ठुमरी ठेलते रहते हैं.. और मैं शरीफ़ आदमी की तरह झेलता रहता हूं?.. इस देश में मानवता नाम की कोई चीज़ बची है कि नहीं? ब्‍लॉगजगत में?

दुनिया में आदमी किसी चीज़ पर भरोसा करे या नहीं? मिठाई तक से उम्‍मीद छोड़ दे? बहनों का बाद में कहीं कुछ नुकसान हो तो फिर मुझे दोष मत दीजिएगा! किसी का कुछ भी नुकसान हो, मुझे मत लपेटियेगा.. बहुत लिपटा-लिपटी जी ली.. देख ली.. अब क्‍या दिखाइएगा? एक मिठाई तक तो दिखा नहीं सके!

हां, हां, मालूम हैं, कहेंगे- ‘अरे, आप तो चीन में हैं.. इतनी दूर जाकर भी मिठाई का रो रहे हैं?’.. क्‍या हैं आप, जोकर हैं क्‍या हैं? अरे, चीन जाने पर मिठाई की तलब छूट जाती है? परदेस में तो त्‍यौहार ज़्यादा उंगली करता है. मिनट-मिनट में यह अहसास उठा-उठाकर पटकता रहता है कि क्‍या आज समूचा दिन सूखे मुंह में जीभ घुमाते ऐसे ही निकल जाएगा? क्‍या हीं-हीं, ठीं-ठीं करतीं बहिनें घर में, और बाहर घेरेंगी नहीं? और मैं ‘अरे! ओहो!’ करता उचक-उचककर आशीर्वाद देने से रह जाऊंगा (रह गया ही!) ? समीर लाल से पूछिये, अनामदास से पता करिये! क्‍यों लड़ि‍या के बेटे के रैटल पर पोस्‍ट लिखा है? आपको लगता है ऐसे ही लिख दिया? इसलिए लिखा कि आज बहनों पर सोचने के नाम से रूह फ़ना हो रही थी इसलिए घबराकर बेटे का जाप करने लगे! बेटा पहले रैटल नहीं खेल रहा था? तब पहले क्‍यों नहीं रैटलटम-रैटलटाक् किये? सीधी बात है. तब वजह नहीं थी. आज है! मिठाई वाला मसला तो है ही. नहीं खाने की कड़वाहट बेटे पर की नाराज़गी में निकाल लिए. सब मेरी तरह साफ़ और सच्‍चे थोड़ी होते हैं.. स्‍पष्‍टवादिता के लिए कलेजा चाहिए.. मिठाई न खा सकने की जेनुइन कड़वाहट चाहिए.

मज़े में रहिए. रक्षाबंधन-रक्षाबंधन करते रहिए. लेकिन आज के बाद से बंधुत्‍व-टंधुत्‍व मत कीजिएगा! क्‍योंकि आप मुंह खोलेंगे और मेरे मुंह में कसैलापन फैलने लगेगा! बहनों के प्रति दायित्‍वभाव तो नहीं ही फैलेगा. अदबदाके पतनशील होने लगूंगा.. और ज़ि‍म्‍मेदार सिर्फ़ आप होंगे! हां!

2 comments:

  1. आपके चीन जाने का आज सबसे बड़ा फायदा यह दिखा कि आप हमारी जुबानी अपनी कलम से कह रहे हैं बिना अकबकाहट के.

    इतना बढ़िया इसके पहले या तो मैं या अनामदास लिख पाते थे.

    अब बार बार आया करें चीन. फिर चाहे पहाड़ में घूमें या नदी बन जाये उसे मछली बनाने को, हमें कोई परेशानी नहीं. कम से कम तीसरा अच्छा लिखने वाला तो हो जायेगा. :) देखिये न!! कल तो दो ठो शेर भी लिख मारे थे.

    हमारा तो नेचरवा ही अइसा है कि अच्छे लेखन को प्रोत्साहन के लिये जुझारु टाईप भये हैं. आप तो सब जानते हैं.

    --भाई, कोई चौथा या चौथी बुरा न मानें, बस कोशिश करता रहे. एक दिन उनका नाम भी आ सकता है इस लिस्ट में. :)

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  2. काहे फ़िकर करते है..आजकल तो चीनी कम का समय है..आते और खाते समय खास ख्याल रखे..:)

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