Thursday, August 30, 2007

रातभर बारिश..

अगस्‍त के मदमस्‍त मेघ झूमकर उतरते हैं नीचे हवायें लहराकर उड़ती हैं घास के मैदानों को घुमाती, कितना ऊपर उठाती. अपना फ्रॉक सम्‍हालती बच्‍ची के हल्‍के फाहों-से बाल उझराती हैं. एक कुत्‍ता चौंककर दौड़ता है, थोड़ी दूर जाकर दंभ में ऐंठता देह तोड़ता है. पड़ोस की मौसी भागकर तार से कपड़े हटाती है, मैं सीलनभरी महकते भागलपुरी में लिपटा उमड़ता हूं, पोर-पोर में उतरती है बरखा. खुश होता हूं ज़िंदा हूं ज़िंदगी है, नाक की नोक पर गुदगुदाती हवा है, फुहार का भीजापन है. भरभराते जल के साथ फिर भागती चलती हैं और कितनी ही तो बातें, उमड़-घुमड़कर सुन पड़ती है डायरियों के आड़े-तिरछे भूगोल में बन्‍द वही बनने-बिगड़ने की चोटखायी कहानी, पुरानी.

कितना अच्‍छा होता है रोज़ हथेली पर ज़रा-सा ज्ञान, कनपटी की थपकियों से उतरकर गाल पर बजता संगीत का जादू; थोड़ी अच्‍छी बातें, फ़ोन पर किसी दोस्‍त का हंसना, गिलास भर पानी गाल से सटाये दुनिया के दु:ख में दु:खी हो लेना, किसी ग़रीब की गरदन रेते बिना इंसानियत की समझदारी में एक और दिन जी लेना कितना अच्‍छा होता है. मगर अंधेरों में उतरती कभी एक महीन टिमटिमाहट का अंदेशा खोलती, खोह से निकलती बेचैनियों की इस रेल के सफ़र की आख़ि‍र कोई तो होती मंज़ि‍ल. कि हदबद बेकली में लिपटे, लटके चलते चले चलना ही अपना होना होगा. नहीं पहचानेंगे कहां हैं क्‍या हुआ हिसाब. अन्‍तहीन लगे रहना, पीसना जांत, सांस की थैली में हवा भरते रहना ही जीना होगा.

किस पल पड़ता है चैन, कब होता है सचमुच दिन का अन्‍त. शुरू होती है रात गायब होती है चिन्‍तायें, चुकती है सब बात. वही तो दिक़्क़त है नहीं होती कहां होती है. फटी छतरी पट-पटा-पट पीटती रहती है बूंदें, निर्गुन बजती रहती है बेतरतीब विचारों की ठठरी. कभी नंगी पसलियों से छूकर गुज़रती है ताज़ा बारूद-सी डंक, कभी काई लगी भारी काली दीवारोंवाले पुराने क़ि‍ले के बीहड़ गहरे सूनसान अंधेरों में गूंजता है सबको न सुन पड़नेवाला घड़ि‍याल. ठंडे निर्जन भय की सनसनी में बिंध जाती है देह, टप-टप बहने लगता है ख़ून. आत्‍मा अचक्‍के में टूटती निकलती है एक हूक. थकी पथरायी पपड़ि‍यों पर झीना गिरता हटता है कोई परदा. एक हंसी फीक़ी होंठों पर अचकचायी पसर आती है और आंखों में पानी निकल आता है. बजती रहती है रातभर बारिश, चैन नहीं आता.

ऊपर की तस्‍वीर: नेशनल ज्‍यॉग्राफ़ि‍क डॉट कॉम से साभार

6 comments:

  1. फोटो शानदार, कविता जानदार

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  2. Chacha , bahut Khoobsurat hai ! aap aisaa hi likhiye !

    Mukhiya !

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  3. आपके शब्दों को महसूस कर सकते हैं। आपकी सभी पोस्ट जो मुक्त गद्य के गल्प के अंतर्गत लिखे हैं बेहद पसंद हैं। ए स्ट्रोक ऑफ जीनियस!!

    अपनी एक कविता यहाँ लिख रही हूँ...बहुत पहले लिखी थी...आपकी पोस्ट से याद आ गई।

    क्या तुमने आवाज़ दी थी ....??

    ना जाने क्या सुना उठ गई.....
    कहीं कोई ध्वनी की तरंग नहीं...
    सन्नाटा रात की गोद में एकदम छुप...
    फिर यह दस्तक मेरी रूह पर...
    क्या तुमने दी थी...??


    खिड़की से झाँका
    साये एक दूसरे के आसपास सुस्ता रहे थे
    कुछ गहरे..कुछ हल्के ...
    ....करवट बदल रहे थे
    अँधेरे के चश्मे से...
    मन का ग्रहण साफ नज़र आ रहा था

    मुड़ी थी...
    लगा पास ही कुछ सिसक रहा हो
    .....................................
    कुछ भी नहीं था…
    फिर किसका हाथ लगा था...
    कुछ चींटे उड़े थे..
    और आँख गीली हुई...

    महसूस कर सकती थी
    हवा में कोई खुशबू…
    कोई पैगाम मेरे नाम…
    शायद खिड़की से बाहर...

    बाहर समय की बारिश हो रही थी
    अब दिखा हवा में उड़ता हुआ…
    भीगा धुँधला कोई संदेश…
    किनारों से फटा ...सायों के पास

    बारिश तेज़ थी
    कहीं बिजली भी गिरी
    …………………..
    जब थमी...
    सुबह हो चुकी थी...

    मुर्गे की बाँग की आवाज़ कहीं दूर से आ रही थी..

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  4. ज़बर्दस्त पोस्ट. बहुत-बहुत धन्यवाद इसे लिखने के लिए.

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  5. एक हंसी फीक़ी होंठों पर अचकचायी पसर आती है और आंखों में पानी निकल आता है. बजती रहती है रातभर बारिश, चैन नहीं आता...
    ये नमी से भरा कैसा पार्थक्य है!!
    एक-एक शब्द पूरी शिद्दत से अपनी बात कह रहा है।

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