Friday, August 31, 2007

अच्‍छा प्‍यार और सच्‍चा दोस्‍त फिर उसके बाद?..

जो आंखें मूंदे सुखी हैं उनका मुझे नहीं पता.. लेकिन छाती में अकुलाहट लिए सुबहो-शाम सोचनेवालों के साथ एक बात है.. यह चोटखायी क़ौम अनवरत, सायास-अनायास एक खोज में जुटी रहती है.. उसकी खोज दैनन्दिन के झमेलों व रोज़ी-रोटी की फजीहतों से परे अपने खोजी कारखाने में कभी बिना जाने तो कभी पूरे जोशो-ख़रोश के साथ ईंधन फूंकती चलती है.. फ़र्नेस के अंदर लाल सुलगते कोयले जलते होते हैं.. क्‍या खोजती है?..

एक प्‍यार जो जीवन में नये अर्थ भर दे.. पोर-पोर में संजीवनी फूंक दे? एक किताब, भरोसे का एक दोस्‍त जो जीवन के अनसुलझे पहलुओं पर रोशनी डाल दे.. गहरे अंधेरों में दबे अव्यक्‍त सत्‍य की खिड़कियां खोल दे? एक गुरू? एक धारा? थोड़े सूत्र-वाक्‍य?..

अच्‍छा प्‍यार और सच्‍चा दोस्‍त पा लेना आज के ज़माने में हंसी-खेल नहीं (डाउट है कभी रहा होगा).. मरीचि‍काओं में भटकते होते हैं, लेकिन सारे सवालों का हल ढूंढ़ लाये, ऐसी चमकती किताब और सुलझा गुरू कहां हाथ आते हैं? जब आते भी हैं तो उनके हाथ आने का क्षणिक अहसास ज़रा आगे जाकर नये सवाल व नये भ्रमों का रास्‍ता नहीं खोलता?..

मेरा एक संवेदनशील मित्र है जो खोज के इस सारे कार्यक्रम को व्‍यर्थ घोषित करता रहता है. उसके अनुसार खोजी बेचैनियां और कुछ नहीं, अपने को महत्‍वपूर्ण मानने की बौद्धिक अदायें हैं.. निपट अंधेरे में आदमी की रचना होती है और कुछ वैसे ही गाढ़े अंधेरे में उसका अंत! जबकि एक दूसरा संवेदनशील मित्र है, आठ महीने से अमरीका के एक बड़े न्‍यूरोलॉजिस्‍ट हैं- अंतोनियो दमासियो, उनकी किताब ‘लुकिंग फ़ॉर स्पिनोज़ा’ घोंट रहा है.. कि अबकी मर्तबा सतह की सच्‍चाइयों से परे जीवन का वास्‍तविक अर्थ जाने बिना रहेगा नहीं! अपनी चिन्‍ताओं में सुलगता जब वह मुझसे सवाल करता है कि नहीं, तुम बताओ जीवन का अर्थ क्‍या है और सुखी होने की मेरी परिभाषा.. तो मैं लरबराया, अटकता सामाजिक स्‍वास्‍थ्‍य की कुछ पिटी-पिटाई धारणायें बड़बड़ाने लगता हूं.. मित्र चोटखायी नज़रों से मुझे तकता ताज्‍जुब करता है कि अपने को कलाकार, साहित्यिक बतलाता रहता हूं जबकि मेरे पास ऐसे सामान्‍य, एलिमेंटरी सवाल तक का कोई सफ़ाईभरा जवाब नहीं?

मैं शर्म से चेहरा गिरा उसकी सारे आरोप अपने सिर ले लेता हूं.. अब यह सच्‍चाई तो है कि जिन गूढ़ अर्थों में वह अपने प्रश्‍न की व्‍याख्‍या चाहता है, उसका समाधान मेरे पास नहीं.. हम क्‍यों हैं इस संसार में?.. निजी व समाज के स्‍वास्‍थ्‍य, भौतिक-पारिवारिक सुख की नेक़ कामनाओं के बाद जीवन की यात्रा का क्‍या मतलब बचता है मेरे लिए?.. आपके लिए?..

मेरे मित्र का सवाल मुझ निर्बुद्धि की बजाय आपकी गोद में होता, तो आप क्‍या जवाब देते? क्‍या मतलब है जीवन का? किस बात से अर्थपूर्ण व सुखी हो जाएगा आपका जीवन?..

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6 comments:

  1. ऐसे कीमती सवाल का जवाब आप बहला फ़ुसला कर टिप्पणी में करा लेना चाहते हैं.. अरे चलिए..

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  2. सामने सब के स्वीकार करता हूँ
    हिन्दी से कितना प्यार करता हूँ
    कलम है मेरी टूटी फूटी
    थोड़ी सुखी थोड़ी रुखी
    हर हिन्दी लिखने वाले का
    प्रकट आभार करता हूँ
    आप लिखते रहिए
    मैं इन्तज़ार करता हूँ ।
    NishikantWorld

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  3. साथी, जीवन का मतलब और उसकी सार्थकता के पैमाने समय-सापेक्ष हैं। इस सवाल की परतें उघाड़ी जाएं, मज़ा आएगा। आप भी सोचिए। हम भी गुनते हैं। सभी मिलकर माथापच्ची करते हैं। आज के ज़माने में अपने होने का मतलब तलाशते हैं।

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  4. अभय जी ठीक कह रहे हैं । (ऐसा कहने से ऐसा तो लगेगा कि हमारे पास उत्तर है ! )
    घुघूती बासूती

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  5. इस सवाल के बारे में नहीं, अलबत्ता स्पिनोजा के बारे में एक बात जरूर कहनी है। आधुनिक यूरोपीय चिंतन परंपरा में स्पिनोजा अकेले यहूदी और बाकी सबसे ज्यादा एशियाई हैं। उनकी चिंतन प्रक्रिया किसी पोस्ट रिनासां बौद्धिक के बजाय किसी अधुनातन भारतीय मुनि जैसी जान पड़ती है। 'नॉट टु बी हैपी, नॉट टु बी सैड, बट टु अंडरस्टैंड' उन्हीं की एक लातीनी सूक्ति का अंग्रेजी अनुवाद है, जिसे मैंने लियोन त्रॉत्स्की के मृत्यु से ठीक पहले लिखे गए लेख में उद्धृत पढ़ा था। बताते हैं, अपनी वैचारिकता के उरूज पर पहुंचकर स्पिनोजा ने सिर्फ साठ किताबें पढ़ी थीं और इकसठवीं पढ़ने की कोई नौबत ही नहीं आई। लुकिंग फॉर स्पिनोजा में क्या है, मैं नहीं जानता लेकिन यह चिंतक मुझे इतना अपना-अपना सा लगता है कि इसके बारे में कुछ भी पढ़ने को दिल करता है।

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  6. इस सवाल पर तो अनुगूँज कराईये. यह ऐसे थोड़े ही न होगा.

    खुशी इस बात की है कि आजतक जो मै मै-सबसे बड़ा ज्ञानी मैं, सबसे बड़ा साहित्यकार यानि मैं-कम से कम वो रेलगाड़ी रुकी तो!!! :)

    आपका दोस्त अंतोनियो दमासियो साधुवाद का हकदार है जिसने आपके आलोकिक मुख से यह कहलवा लिया..मैं निर्बुद्धि.. बहुत आभार भाई का. उनके साथ हमारी बहुत छनेगी..काहे से कि मैं तो अभी भी बुद्धिमान हूँ. :)

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