Sunday, August 5, 2007

मैं क्‍या हूं?..

मैं क्‍या हूं? नायिका होता तो शायद ऐसी दुविधा न होती. टीला-पर्वत चढ़के चीख-पुकार करता- तेरे चरणों की धूल हूं, धरा हूं, श्‍यामला हूं, गगन हूं, पवन हूं, और सबसे ऊपर- सुलगता बदन हूं.. नायकदेव फ्रेम के दूसरे छोर से भागे हुए आते, देह से देह सटा के बल्‍ल-बल्‍ल बोलते- हिये की प्रिये, रक्‍त है, प्राण है, तू मेरे जीवन का संचित अरमान है!

एक तरह से अच्‍छा ही है कि नायिका नहीं हूं, कि टीला-पर्वत वाली बेमतलब की नौटंकी से बरी हूं. नायकदेव के नारकीय ऊबाऊ डिक्‍लरेशंस से भी. लेकिन अपने होने का सवाल तो तब भी बचा ही रहता है. मैं क्‍या हूं?

पत्रकार हूं न चित्रकार हूं. पत्रकार तो नहीं ही हूं. संजय दत्‍त के ऑर्थर रोड से यरवदा शिफ्ट करने पर लोग फ़ोन करके मेरा जीना दुलम नहीं किये हैं कि भई, मगर बात हुई क्‍या? संजू को तो प्रवीण महाजन वाले सेटअप में टोटल सेक्‍यूर्ड जगह रखा गया था? फिर क्‍यों हटा रहे हैं? अंदर वाली बात बताओ, गुरु? छै साल का टर्म तो वो नहीं ही काटेगा, प्रिया भी सोनिया से मिलके आयेली है! आप भीतर का असल सीक्रेट बोलो, सर? नहीं, ये सब कुछ भी मुझसे नहीं पूछा जा रहा. तो मेरे पत्रकार होने का प्रश्‍न नहीं. चित्रकार होने का भी नहीं. क्‍योंकि न अपने पास बोरीवली या लोनावला में कोई तीस इनटू तीस की स्‍टूडियो है, न कोई लड़की अपनी न्‍यूड बनवाने की ज़ि‍द कर रही है. न ही मैं हाथ में ईज़ल और ब्रुश लेकर फ़ोटो खिंचवाने की ही कर रहा हूं. न, चित्रकार नहीं हूं. सदाबहार भी नहीं हूं, क्‍योंकि अक्‍सर फ़ोन पर लोगों को जवाब देते हुए मुंह से निकल जाता है- अबे, कौन हो? क्‍या चाहिए क्‍या?

लोग समझदार नहीं, होते तो समझ जाते, कि उन पर बरस नहीं रहा, स्‍वयं से सवाल करता अपनी आवाज़ में उन तक अपनी उलझन पहुंचा रहा होता हूं कि कौन हूं, क्‍या हूं.. सवाल का तंज बना रहता है. लोग चिढ़े रहते हैं. जवाब रास्‍ते में कहीं ग़ुम बना रहता है- कौन हूं, क्‍या हूं? फ़ि‍ल्‍ममेकर हूं?

कोरेल में विज़ि‍टिंग कार्ड डिज़ाईन करने का खेल खेलते हुए, अभी भी, नाम के नीचे छोटे अक्षरों में ‘फ़ि‍ल्‍ममेकर’ टांक देने पर अभूतपूर्व प्रसन्‍नता होती है. मगर फिर चली भी जाती है, जब याद आता है कि फ़ि‍ल्‍म बनी नहीं, और रोल के लिए सिफ़ारिश लेकर आनेवालों ने अब याद करना बंद कर दिया है. पति भी नहीं हूं. क्‍योंकि कोई पत्‍नी गोद में पैर लेकर दबाते हुए अपने जीवन को धन्‍य व सार्थक होता नहीं बता रही है. पिता होने का भी सवाल नहीं उठता. क्‍योंकि फिर कुछ तेजी से बढ़ चुके बच्‍चे होते जिन्‍हें मेरी इस और उस आदत से इस या उस तरह की शिकायत होती, और उनके अपने प्रति संचित नफ़रत के आधार अब तक मैं कोई कालजयी रचना रच चुका होता. चूंकि ऐसी कोई रचना रची नहीं जा सकी है, इससे साफ़ होता है कि मैं पिता नहीं हो सका हूं. कालजयी रचना रच देनेवाला कालजयी साहित्‍यकार भी नहीं हुआ हूं.

फिर मैं क्‍या हूं? एक औसत ब्‍लॉगर भर हूं? वह भी जिसे चिट्ठाजगत प्‍लस अट्ठारह के टैग के साथ अपरिवारोपयुक्‍त खांचे में ठेल रही है? लेकिन हमारी पोस्‍ट के साथ इस प्‍लस अट्ठारह वाले टैग का एक्‍चुअली मतलब क्‍या है? कि इसे अट्ठारह वर्ष से ऊपर के लोग ही पढ़ें? बाकी क्‍या नौ और तेरह वर्ष के बच्‍चे पढ़ रहे हैं? माने ज्‍यादातर बालोपयोगी एंट्रीज़ हैं? इसीलिए अनूप शुक्‍ला के यहां इतनी ज्‍यादा स्‍माइली का प्रकोप है?

मगर मैं हूं क्‍या? सवाल अभी भी रह ही गया है.

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5 comments:

  1. कोई हमें बताए कि हम बताएं क्या?

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  2. आपके पिछले लेख से एक लाईन।

    रिपुदमन को अभी भी इन चूतियों के चूतियापे की थाह नहीं लग रही थी.

    हमने कुछ आपत्तिजनक शब्दों को अपरिवारोपयुक्‍त मान कर यह किया है। ध्यान दें यह स्वचालित है।

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  3. अरे क्या लिख दिया आपने मेरेको समझ नहीं आया और आपका दिल्ली कनेक्शन पढ्ने के बाद पता चला कि ये लेख तो अट्ठारह के ऊपर वालों के लिये हैं, मेरी उम्र १६ साल है और ये गुनाह लिख दिया आपने......जबकि १८ का मार्क पढ्ने के बाद ही आपके ब्लाग मे घुसा था पर आपने निराश किया.और चिट्ठाजगत से अनुरोध है कि जब वैसा मैटर हो तो १८ का मार्क थोड़ा और बडा और जादा लाल होना चाहिये.

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  4. जगत चिंतन: मै क्या हूँ?..

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  5. मेरे विचार में आप हैं - हिन्दी ब्लॉग मंडल के पूरे के पूरे मुक्तिबोध !

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