Saturday, August 11, 2007

एक कविता विवादरहित पत्‍नी के समर्पण में..



उपन्‍यास में पहले एक कविता रहती थी

अनगिन से निकलकर एक तारा था.
एक तारा अनगिन से बाहर कैसे निकला था?
अनगिन से अलग होकर
अकेला एक
पहला था कुछ देर.
हवा का झोंका जो आया था
वह भी था अनगिन हवा के झोंकों का
पहला झोंका कुछ देर.
अनगिन से निकलकर एक लहर भी
पहली, बस कुछ पल.
अनगिन का अकेला
अनगिन अकेले अनगिन.
अनगिन से अकेली एक-
संगिनी जीवन भर.

- विनोदकुमार शुक्‍ल

दीवार में एक खिड़की रहती थी, विनोदकुमार शुक्‍ल, वाणी प्रकाशन, 1997 से साभार.

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3 comments:

  1. शुक्रिया प्रमोद जी आपने ठीक कहा था कोई कविता के बिना कैसे रह सकता है मगर आपकी कविता ने मेरी कमी अवश्य पूरी की होगी...

    अनगिन से अकेली एक-
    संगिनी जीवन भर.
    अच्छा भाव है कविता का...

    सुनीता(शानू)

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  2. ये कविता मै पहले पढ चुकी हूँ विनोद कुमार शुक्ल जी की...

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  3. कविता छाप कर आप मुझे प्रेरित कर रहे हैं.. विनोद जी का गद्य छापने के लिए..

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