Wednesday, August 8, 2007

नींद में रात



एक
जाने कहां किस जंगल, पहाड़, अजाने गांव के बाहर अटकी है रेल की दमघोंट अंतहीन इंतज़ार की तरह नींद आती कहां है. झपकियां आती हैं उखड़ी-उखड़ी-सी, अचक्‍के में ठेले गए किसी लापरवाह हाथ के धक्‍के-सी बैठे-बैठे गिराती हुई. चैन का कोई छोटा सुकूनदेह आंगन नहीं खुलता, थकान व खीझ की खुरदुरी लक़ीरें खिंचती चलतीं हैं. माथे पर घूमते हाथों में गुस्‍सा दीवाना बना चौंकता रहता है. घड़ी की टिकटिक ध्‍यान बांधे सुनती है हवा का दबी आवाज़ बड़बड़ाना, नींद नहीं आती.

दो
नींद के गहरे खोह में उतरने के बाद रात जाती कहां है. खिड़की पर बाहर का गाढ़ा अंधेरा तकती सोचती है क्‍या. कपड़ों, किताबों के आड़े-तिरछे भूगोल पर अधलेटी अलसायी आंखें मूंदे किस बात पर मुसकराती है. अपनी नज़र बचाकर जला लेती है एक सिगरेट. धीमे डोलते परदों से क्‍या बोलती है फुसफुसाती कितनी देर, और आंख खुलती है तो कहीं नहीं होती है रात. कहां जाती है.

ऊपर चित्र: 'उक्ति की नींद', गोया की एक कृति

7 comments:

  1. यह कहाँ खो गये?? अजब बात है.

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  2. चिंतन के लिये प्रेरित किया आप ने आज के पोस्ट द्वारा -- शास्त्री जे सी फिलिप

    हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
    http://www.Sarathi.info

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  3. झपकियां आती हैं उखड़ी-उखड़ी-सी, अचक्‍के में ठेले गए किसी लापरवाह हाथ के धक्‍के-सी बैठे-बैठे गिराती हुई

    बहुत सुंदर!!

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  4. वाह ! कौन कहता है कि गद्यगीत अब नहीं लिखे जाते!

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  5. दूसरी वाली बेहतरीन है, सर जी. आनंद आया. मारक और मोहक काम कर रहे हैं आप.

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  6. फिल्म जैसी कविता कहूं या कविता जैसी फिल्म। एक अद्भुत अनुभव!

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  7. आखिर रात जाती कहां है? क्या खूब...

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