Sunday, September 30, 2007

जीवन की फ्रीलांसिंग के खतरे..

दक्षिणी दिल्‍ली की हरियाली देखकर मेरे हरियाये रहने पर न केवल पूर्वी दिल्‍ली के काकेश को एतराज़ था, कनैडियन छांह में वजन चढ़ा रहे समीर भइय्या भी चौकन्‍ना हो रहे थे. उन्‍हें दोष नहीं दे रहा. चौकन्‍ना तो स्‍वयं मैं भी हो रहा था. ऐन हरियाहट से सुखी होने के क्षणों में. सुख में दुख और दुख में सुख के इस विरोधीभाव से तो अपनी पुरानी यारी है. ख़ून का हिस्‍सा है्. सो उससे मुक्‍त कहां से होते, होंगे? हरियाली की टहलाहटों के बाद चौकन्‍ना होना स्‍वाभाविक है. तो हरियालियों से निकलकर कुछ मॉल के वेताल से गुजरकर मन में दूसरे भाव बन रहे हैं. सारंगी की एक नई धुन बन रही है. तो वह भी जरा सुन लीजिए. नौकरी से खलियाये आरामी संडे की ऐसी की तैसी करवाइए. थोड़ा फेंस के उस पार जाकर सोचिए, सोचवाने में मैं मदद करूंगा. कल पहलू में चंद्रभूषण ने ‘एक प्रस्‍ताव’ लिखा था, इस सोचवाहट में उसकी भी भूमिका है.. सो हमारी बात सुनकर मन खिन्‍ना जाये, आप जूता-चप्‍पल फेंकना चाहें, तो कृपया थोड़ा चंदू की दिशा में भी फेंकें.. अजनबी शहर में मैं अकेला हूं, लोगों के लात-जूते भी लगेंगे, मगर कुछ वक्‍त तो शांति से गुजर जाने दीजिए. आइए, चलिए, असल बात पर चलते हैं. उदासियों में..

पहले जीवन में इतना पैसा नहीं था. खरीदने को इतनी चीज़ें भी नहीं थीं. आवारागर्दी को स्‍पेस था. मुझसे ज्‍यादा प्रतिभावान लोग आवारा हो सकते थे. अब सबने नौकरी पकड़ ली है. ज्‍यादा लोग ज्‍यादा कमा रहे हैं. जो नहीं कमा रहे हैं उसकी कोशिश कर रहे हैं. घर और अपने ऊपर पैसा खरचने के तकाजे बढ़ गए हैं. जो नहीं खरच पा रहे वो घबरा रहे हैं, टेंस हो रहे हैं. आवारागर्दी एज़ अ वैल्‍यू घुस गई है, हास्‍यास्‍पद हो गई है. मैं, जिसने जीवन के डेढ़ साल से ज़्यादा कभी नौकरी नहीं की, लगातार हास्‍यास्‍पद होता रहता हूं. उंगलियों पर गिने जाने लायक जो मित्र-सित्र टाइप चंद हितैषी हैं, हतप्रभ होते रहते हैं- कि बिना नौकरी चलता कैसे है? सुबह उठकर कहीं काम पर जाते नहीं, फिर दिनभर करते क्‍या हैं? जवाब देना मुझे अटपटा नहीं लगता, गाली देने की तबियत होती है, क्‍योंकि यह कुछ उसी तरह का सवाल है कि किसी कलाकार-लिखनेवाले से पूछा जाये कि लेखन-फेखन तो ठीक, मगर, गुरु, काम क्‍या करते हो?..

गुस्‍सा ज़ाहिर करना तो मेरी झुंझलाहट हुई.. उससे अलग क्‍या जवाब दिया जाये? कि फुरसत में फ्रीलांसिंग करता हूं? ऐसे ही आड़े-तिरछे पैंतरों से गुजारा चलता है? मगर फिर पूछनेवाले यह भी पूछने लगते हैं कि गुजारा चल जाता है? दिन में हजार रुपये टाइप एक लेख भी लिखे तो सारे महीने भागदौड़, जी-तोड़ लिखाई के बाद कमाई हुई कितनी.. कुल तीस हजार.. इत्‍ते में महानगर में गुजर हो जाती है? सवाल दस बार सुनकर मैं भी सोचने लगता हूं कहां से हो जाएगी? नहीं ही हो सकेगी. आदमी भाग-भागकर इस तरह हजार रुपये वाले काम जुगाड़ता रहा भी, हाड़तोड़ू परिश्रम से महीने-महीने भर मशीन बना विचार उगलता रहा भी तो इस तरह की गदहगिरी कितनी देर, कितनी दूर तक खिंचेगा? ज्‍यादा से ज्‍यादा चार महीने? उसके बाद फ्रीलांसिंग नहीं करेगा, अस्‍पताल में लॉंच होगा. और ऐसा नहीं है कि जीवन के खर्चे कम होंगे, या आदमी महानगरीय भागमभाग हवाई चप्‍पल में डील करेगा. क्‍यों करेगा? हास्‍यास्‍पद लगेगा!

फिर? समाधान क्‍या है? स्‍वतंत्रचेता, स्‍वतंत्र‍जीवियों की कोई जगह नहीं, जैसे बड़े शहरों में मॉल व मैकडॉनल्‍ड मानिया का अब विकल्‍प नहीं? कहीं नौकरी पकड़कर रोज़ एक पागलपने में भागते रहना और नशे में रमे रहना ही समाधान है? यह सच्‍चाई तो है ही कि फ्रीलांसिंग की ये तीस हजारी अदायें पोली हैं, सब सुधीश पचौरी होकर विचार उगलने की दनदन मशीन नहीं हो सकते. मैं तो नहीं ही हो सकता. बहुत बार सिर्फ दनदन ही होगा, विचार दो कौड़ी न होगी. गलत बोल रहा हूं? आप भी कुछ बोलिये.

Friday, September 28, 2007

फ़ुरसत में सावन का अंधा मैं..

बैठे, उठंगे, लेटे, ज़रा सा इधर-उधर टहलते दिल्‍ली में लगभग दो हफ्ते निकल गए.. चार दिन कंजंक्टिवाईटिस की आंख की छूत के नाम छोड़ भी दें तब भी कुल दस दिन का हिसाब निकलता है. लेकिन महसूस यही हो रहा है जैसे शहर में कल ही दाखिल हुए हों. पैरों में हवाई चप्‍पल है मगर सब तरफ हरा-हरा ही दीख रहा है. ऐसी अनोखी चीज़ हो क्‍यों रही है? ऐसा तो है नहीं कि राजधानी में सब हरा-हरा ही हो. हारी हुई दुनिया का अच्‍छा-खासा भूगोल होगा. होगा क्‍या है ही. लेकिन अपने को अभी ठीक-ठीक नज़र आना शुरू नहीं हुआ हैं. अपन फ़ि‍लहाल बाहरगांव से आए 'मेहमान' वाली मेहमाननवाज़ि‍यों में इतरा रहे हैं. वह ख़ुमार उतरेगा तो दुनिया फिर ज्‍़यादा ढंग से नज़र आएगी. अभी तो नक़्शा ही नहीं है. उत्‍तर-दक्खिन का ठीक-ठीक बोध भी नहीं है. खुली-चौड़ी सड़कों का व्‍य‍वस्थित इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर दिख रहा है और हरियाली दिख रही है. खूब सारे पेड़ दिख रहे हैं और फिर यह दिख रहा है कि हम पांच पेड़ों से ज़्यादा न पेड़ों की पहचान रखते हैं, न ही उनका नाम हमें मालूम है. मन अंदर ही अंदर लगातार मुंबई को गालियां देता रहता है, कि आधुनिकता के हो-हल्‍ले के बावजूद इस तरह का इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर वहां क्‍यों नहीं है, वहां बड़े ट्रैफिक जंक्‍शन पर गाड़ि‍यों के बीच फंसे ऐसी अनुभूति क्‍यों होती है मानो किसी देहाती जगर-मगर में फंस गए?..

दिल्‍ली को लेकर मैं ज़्यादा लड़ि‍या रहा हूं? ठीक है, घबराइए नहीं, जल्‍दी पटरी पर आ जाऊंगा. थोड़ा वक़्त आंखों को, आत्‍मा को हरियाली पी लेने दीजिए. साऊथ दिल्‍ली से जल्‍दी ही बाहर निकलकर कड़वाहट का विषपान करना ही होगा. अविनाश के घर पहुंचना तो क्‍या मैथिलीजी के ब्‍लॉगवाणी के दफ़्तर की गली भी कोई रोमानी दुनिया नहीं है. जेएनयू की बाहरी हरियाली और बनावट के निखरेपन के ज़रा भीतर तेल, शैंपू, सिगरेट खरीदने अगर केतकी शॉपिंग सेंटर की ओर जायें तो चायनीज़ खाने के ढाबे और बाजू में बासी सब्जियों की बसावट जैसे तत्‍काल मन उदास कर देती है, कुछ वैसा ही हाल मैथिलीजी के दफ़्तर के बाहर की गली का भी है. कचर-मचर के मात्रात्‍मक फर्कों वाली ऐसी ही गलियां तो हमारी राष्‍ट्रीय पहचान हैं (राष्‍ट्रीय न सही, उत्‍तर भारतीय तो हैं ही), फिर भला दिल्‍ली उनसे कहां, कैसे अछूता रहेगा. फर्क मेरी मस्‍ती की है. चढ़ी हुई है जो सपरकर कुछ वक़्त की आवारागर्दी कर रहा हूं, जल्‍दी उतर जाएगी, फिर दिल्‍ली का नक़्शा भी हरा-हरा नहीं, लाल ही दीखेगा. आप, बंधुवर, मुझे दिव्‍यदृष्टि मिले, इस दिशा में कोई मदद कर नहीं रहे हैं?..

Thursday, September 27, 2007

अज्ञानियों के बीच महापुरूष का अकेलापन..

राजधानी में अज्ञानीजन नौकरियां करते सुखी है. बेकाम, व कोमलांगी कामातुर कंधे के अभाव में महापुरुष दुखी है. अज्ञानी स्‍कूटर से उतरकर कार पर चढ़ रहे हैं. या कार से उतरकर कार में ही चढ़ रहे हैं.. महापुरुष के अनफ़ैशनेबल धज से नज़रें बचाते सवाल करते हैं- बस-यात्रा अच्‍छी तो हुई होगी? आप अच्‍छे से तो रहते रहे होंगे! ओह, अज्ञानीजन.. ठिठोली करते हंसते हुए बंगाली मार्केट जा रहे हैं. गाल बजाते कह रहे हैं हमने ये किया वो किया, उसको करने में इतनी मुश्किल थी; आप क्‍या जानो, उसको करना घंटा कितना असंभव था! भीड़ में अकेला महापुरुष सन्‍न है. इतने आत्‍ममुग्‍ध, आत्‍मकेंद्रित सहचरों(?) की संगत का सफ़र कैसा होगा.. कितनी दूर तक का होगा? तप व्‍यर्थ जाएगा? तपोवन का सपना?.. वह भी? व्‍यर्थ?.. ओह, मन कैसा क्‍लांत और सदाहारा है. जबकि बंगाली मार्केट अपनी जगह ही प्रकट हुआ है. बंगाली मिठाइयां भी. अलबत्‍ता बंगाली लड़कियां नहीं हैं. कामातुर क्‍या कोमलांगी भी नहीं. बंगालीपने से लदबद बस बातें हैं. निरुदे्श्‍य, दिशाहारा जिरहें. आंखें मूंदे महापुरुष गाल में उंगलियां धंसाये चिंतन करता है राजधानी महज माया है, कदम-कदम पर फ़रेबी साया है..

महापुरुष को प्रभावित करने के लिए अज्ञानीजन भाग-भागकर किताब की दुकान की ओर लपक रहे हैं. एक, दो.. और तीन तक की संख्‍या में किताबें खरीद रहे हैं. और फिर यह सोचकर घबराते हुए कि भला इसे पढ़ना कैसे संभव होगा, अकबकाकर, वहीं दुकान में, खरीदी किताब महापुरुष के जिम्‍मे कर बौद्धिकता से उऋण हो ले रहे हैं. बौद्धिक अभिजात्‍य के इस सहज तिरस्‍कार से महापुरुष की आंखें तरल हुई जाती हैं.. हृदय नहीं.. वह शनै: शनै: कठोर हुआ चलता है.

अज्ञानीजनों के जीवन में कहीं सौंदर्य की उपस्थिति नहीं. न सौंदर्य है न उसका कोई सहज, सरल बोध. पोलि‍थीन में तहाकर रखी दवाईयां, गंदे मोजे और हेल्‍मेट को जीवन में स्‍थान व आदर है, सौंदर्य को नहीं. किताबों को तो नहीं है ही. मगर अज्ञानीजन सुखी हैं. महापुरुष नहीं है. अकेला है. ओह, कितना..

Saturday, September 22, 2007

शनिचरी शैतानियां..

सोचने बैठा हूं तो सोचकर तबीयत हरी हो रही है.. (सुना है कि नहीं?.. तबीयत इन दिनों बेग़ाना-ऐ-दिल होती जाती है.. कहां से सुनेंगे, मेरी संगत में रहते तो ऐसी गूढ़-गंभीर चीज़ें समझते!).. एनीवे, मामला ये है कि सुबह से फ़ोन की घंटी बजी नहीं है.. न ही पड़ोस की किसी सुकुमार संवरिया ने सीटी बजाकर हमें याद किया है.. तो हम टिल्‍ल-बिल्‍ल करके कलाकारी कर रहे हैं.. मतलब विशुद्ध टाइम-पास कर रहे हैं.. बीच-बीच में काली कॉफ़ी की फ़रमाइश करके अपने मेज़बान से खुद को बाहर फिंकवाये जाने का माहौल तैयार कर रहे हैं.. यह सारा नाटक किसी मंजिल तक पहुंचे उसके पहले हमने अपने कलाकर्म को किसी मुकाम तक तो पहुंचा ही दिया है.. कितने गड्ढे में यह तो आपकी कल्‍पनाशीलता तय करेगी.. बाकी मेरे कलाकर्म की ऊंची, अनोखी उड़ान तो है ही..

मेरी पहुंची हुई कला का सही लुत्‍फ़ उठाने के लिए ऊपर के स्‍केच को चटकायें.. और ‘नया ब्‍लॉग ब्‍लड’ के इस अनोखे, अद्भुत अंक के महारथी ब्‍लॉगरों की पहचान करके कंविंस करें कि आपकी कला की कोई समझ है भी.. अदरवाइस सिंपली चटकीला, रसीला आनन्‍द लें..

अजनबी शहर में..

सुबह पानी के नल के नीचे बाल्‍टी के भरने की राह तकते दिमाग में दूसरी ढेरों टोंटियां खुल जाती हैं.. अलबत्‍ता नल के फ़ंक्‍शन और दिशा की तरह उनमें व्‍यवस्‍था नहीं होती.. जलती कड़ाही में छौंक-सी वह नाटकीय झांस में आती हैं.. ड्रामा को स्थिर व सपरकर जमने में समय लगता है.. छिटके-छिनकते विचार कोई वाजिब तरकारी बनायेंगे.. या ड्रामा महज सजीली पाककला की अदा बनके रह जाएगी, इसका ठीक अंदाज़ भी कुछ बाद में जाकर ही होता है.. बहुत बार लगता ही है कि हम छनौटा, कलछुल घुमाते रहे; अच्‍छी मात्रा में धुआं और कालिख फैलाया, कायदे का पकाया कुछ नहीं.. फिर कहीं किसी कोने से, कभी दबी कभी मुखर भी, आवाज़ आती है कि जाने क्‍या लिखते हैं ससुर, कुछ साफै नहीं होता!.. ढेरो मर्तबा दूसरों की नहीं, खुद मेरी भी- खुद को ठीक से समझ न आने की- शिकायत रहती है.. अब ये है, क्‍या किया जाये.. ब्‍लॉग का एक पहलू यह भी है.. कि सब प्रोसेस्‍ड नहीं रहता.. बहुत सारी चीज़े बीच प्रक्रिया में रहती हैं.. कुछ एक पोस्‍ट से निकलकर सीधे कचड़े में भी जाती हैं.. आपके धीरज व सहभागिता में मुस्‍कराते हुए एक धन्‍यवाद का इशारा करने से ज़्यादा क्‍या कर सकता हूं?..

क्‍योंकि मामला तो कुछ ऐसा है कि दिन के शुरू होते ही दिमाग की मशीन दस या जाने कितनी, किन-किन दिशाओं में भागना चालू हो जाती है.. समय, शब्‍द, साहित्‍य, शहर, सिविक सेंस, सिविलाइज़ेशन, विकास, लोग, गरीबी, जीवन, मूल्‍य.. और कला.. सबकी अलग-अलग स्‍तरों की थरथराहटों का एक अनगढ़ भूगोल बुना जाने लगता है.. और मैं भागने लगता हूं.. उनके साथ, उनके पीछे.. कभी एक संभली, समझदार चाल में तो कभी बस एक बदहवास लपक में..

जगहें पहचानी न हों तो चिंतायें भी कुछ उखड़ी, ऐंडे-बेंडे रूपाकारों में उलझती हैं.. उनका क्‍या किया जा सकता है.. परायी जगहों में अंतरंग विचार भी जैसे ज़रा दूरी बनाकर पराये-पराये से चलते हैं.. छिटककर बार-बार दूर होती हैं, मैं बार-बार करीब लाने की कोशिश करता हूं.. मगर दोस्‍ताना हवाओं से भरे लेकिन एक स्‍तर पर खुद के लिए निहायत पराये शहर में जैसे देह के नीचे साफ़-धुली चादर, पैरों के आसपास थोड़ी खुली जगह और सोचने को ज़रा सुकूनदेह एकांत- सोचता हूं दिन की शुरुआत के लिए इतनी-सी मांग क्‍या ज़्यादा है.. और फिर जल्‍दी तेजी से समझने लगता हूं कि कितनी असंभव सी लालसा है.. तो फिर बेचारे विचारों से कमिटमेंट की क्‍या और क्‍यों भोली आशायें?.. कभी लय और गहराई में साथ रहें तो अच्‍छा.. न रहें तो इकतरफा प्‍यार की तरह हम मन की मरोड़ लिये उन्‍हें ख़ामोश-ख़ामोश तकते रहेंगे.. और क्‍या कर सकते हैं..

Friday, September 21, 2007

महानगर में साइकिल..

कहीं आंतरिक कोई मैनुफैक्‍चरिंग डे‍फिशियेंसी होगी.. या यथार्थ की निर्ममता से मुंह फेरे रहने का भोला पलायनवाद.. कि मन की उड़ानों का भौतिक बिंब रूपांतरण खुद को अब भी निर्दोष तरीके से साइकिलचारी की शक्‍ल में देखता चलता है.. जबकि शहरों के बदले-लगातार नाटकीय तेजी में बदलते- जटिल कॉरपोरेट-विधान में साइकिल की सुस्‍त चाल को जगह कहां है.. उस किसी भी जीवनशैली की कहां और कितनी जगह है जो तत्‍काल और तेजी से पैसे न जेनरेट कर रही हो?.. एक पैर पैडल पर जमाये दूसरी ज़मीन पर टिकाये आसपास के संसार को जिज्ञासु नज़रों से देखने का मौका निकाले, इसका अब अवकाश ही कहां है.. उस जीवन-दृष्टि के पास तो नहीं ही है जिसने पिछले दस वर्षों में अपने को ही नहीं, देश को भी एक नई पहचान दी है.. अपने ‘वर्किंग आवर्स’ और ‘फ़न’ का एक रिगरस अनुशासन खड़ा कर लिया है..

ऐसा नहीं है कि अनुशासन-पर्व में अपना यज्ञ चला रहे इन जांबाज़ सिपाहियों से बाहर संसार नहीं, या उस संसार में साइकिलें नहीं.. हैं.. महानगरों से बाहर के बेतरतीब, ‘अनक्‍लेम्‍ड’ संसार में अभी भी बहुतेरी होंगी.. मगर वह चकमक-जगमग विकास-यात्रा की चहेती, पसंदीदा सवारी नहीं.. छूटे, पिछड़े, उजबक समय की प्रेत-छायायें हैं जिनका आंखों के आगे से गुजर जाने पर एकनॉलेज न करना ही बेहतर!

विकासी बरगद की घनेरी छांह से बाहर का जो भी अप्रीतिकर रूप है उसे भूले व भुलाये रहना ही अच्‍छा.. क्‍या करना हमें उस समूचे असभ्‍यलोक का जहां दिल, दिमाग और जेब सब तरफ बस गड्ढे ही गड्ढे.. निजीकरण व वैश्‍वीकरण के रंगोत्‍सव में इन फटों में क्‍या फंसना.. कौन इनका जिम्‍मा ले? और क्‍यों ले?..

दिल्‍ली की दीवाली के पीछे हम पीछे छुटी हुई दुनिया के किन-किन प्रतीकों की होली जलायेंगे.. वह लिस्‍ट कितनी बड़ी होगी जिसे बिना एकनॉलेज किये आंखें मूंदे हम आगे देखते रहेंगे (या कन्‍फ्रंट करने की मजबूरी हुई ही तो कुहनिया-धकेलकर फर्र से आगे बढ़ जाना चाहेंगे).. यह किस तरह का, कैसा भविष्‍य होगा.. साइकिल और मेरी इस भ‍विष्‍य में जगह नहीं होगी यह मैं ढंग से समझ रहा हूं.. पता नहीं आपकी कितनी जगह होगी यह आप कितना समझ रहे हैं..

Sunday, September 16, 2007

बहुरुपिया समय के मार्मिक, दिलफोड़ किस्‍से..

क्‍या क्‍लोनिंग संभव है?’ का भोला सवाल करनेवालों की भोली बुद्धि पर तरस आता है. क्‍या लोग सही और सीरियस सवाल करना भूल गए हैं? नहीं भूले हैं तो ऐसी बकवास भला कैसे कर सकते हैं? और करना ही हो तो इल्‍लू, बिल्‍लु, टिल्‍लु के ब्‍लॉग पर करें, मेरे नहीं.. आज के वर्चुअल समय में क्‍या वास्‍तविक और क्‍या क्‍लोन? दूसरों का प्रोसेस्‍ड माल मेरे लिए हमेशा अधूरा व बेमतलब रहा है, अपने निज के अनुभव ही प्रामाणिक व फ़ाईनल रिज़ल्‍ट प्रोवाइडर रहे हैं.. तो मेरे रास्‍तों के अन्‍वेषी सच तो कुछ और ही कहानी कहते हैं! और वह कहानी अदरवाइस जितनी भी फ़रेबी और पतनशील हो, क्‍लोनिंग को क्‍वेश्‍चन करनेवालों के मुंह पर तो करारा तमाचा है ही..

अब जैसे सर्कुलेशन में आए इस नए किस्‍से को ही लीजिए.. कुछ भाई लोगों ने मेरी दिल्‍ली में उपस्थिति मात्र ही नहीं दर्ज़ करवा ली, मुझे नैन लड़ाते, व उस नैन लड़ाने के एवज में कंजंक्टिवाईटिस पाना भी देख लिया! (भगवान करे नज़रों के पिटे इन सारे नमूनों को कंजंक्टिवाईटिस हो जाये फिर ये चिरकुट जानें कि ऊलजुलूल बकने या नैन लड़ाने की सज़ा क्‍या होती है!).. एनीवे, मैं इन भले व बेशऊर लोगों से बस इतना पूछना चाहता हूं कि हमें आपने दिल्‍ली में नैन-मटक्‍का करता ताड़ लिया तो वह अज़दक कौन है जो मुंबई में अनूप शुक्‍ला की ब्‍लॉगर्स मीट और अनपेड बिलों के भुगतान से सिर छिपाता-जान बचाता भागता फिर रहा है? जिसकी बाइक की डिक्‍की से पड़ोस की नर्सरी स्‍कूल की रस्टिकेटेड मिस के प्रेमपत्र बरामद हुए हैं, और मिस का मिस्‍टर जिसे बरामद करने को मचल रहा है?.. और बात यहां महज़ दो शहरों के बीच भर की नहीं.. दुनिया के दो दैत्‍याकार मुल्‍कों की है.. हम चाहें भी तो क्‍या भूलने की धृष्‍ठता कर सकेंगे कि यहां से (कहां से?) हजारों मील दूर एक बेवकूफ़ मां (गाओपिंग) और समझदार बेटी (नानान) के प्रेम ने अज़ांग को किस तरह न घर का न चीन का बनाके रख छोड़ा है?..

इनमें से किसी एक को सही और दूसरे, तीसरे किसी को भी आप गलत साबित कर सकते हैं? करेंगे तो जिसे करेंगे वह नहीं, आप गलत होंगे.. गलत से ज़्यादा हास्‍यास्‍पद होंगे.. क्‍योंकि मैं तो सोच-सोचकर सन्‍न हो रहा हूं कि किसकी सत्‍यता को विशिष्‍ट कहकर सत्‍यापित करूं.. मेरे लिए तो ये सभी सच्‍चाइयां प्रामाणिक और अनक्‍वेश्‍चनेबल हैं.. आपके लिए नहीं हैं तो आपसे हमारा फिर संबंध क्‍या है? एक ब्‍लॉग भर का भी नहीं है.. अच्‍छा हो अभी आईने में आंखें उतारकर देखिए, हो सकता है लाली ऑलरेडी उतरना शुरू हो गई हो, और जल्‍दी ही आप भी कंजंक्टिवाईटिस का आई ड्रॉप ले रहे हों!

amazing colorscape by amazing pakhi s.

नज़र के धोखे..

"क्या करूँ कहाँ जाऊँ" के सवाल का मतलब यह थोडी था कि यहाँ आऊँ? और इस हालत में आऊँ, कोई मतलब बनता है इसका? कैसा मुश्किल समय हो गया है कि छोटी से छोटी चीज़ के लिये भी इतना दिमाग उलझाना पडता है जबकि, अदरवाईज़ देखिये, मैं इतना सुलझा हुआ व्यक्ति हूँ लेकिन यह भी सच्चाई है कि फिलहाल उलझा हुआ हूँ . तात्कालिक तो है ही . जिनको मित्र समझने और कहने की गलती करता रहा हूँ ; जो खुद भी मुझे अपना मित्र बता के प्रत्यक्ष या परोक्ष अपने हित साधते रहे हैं सब अचानक इस गाढे ज़रूरत के वक्त लापता हैं फरार हैं ( ओह अकेला मैं! ) .

दे जस्ट रिफ्यूज़ टू टेक अ स्टेप टूवर्डस माई डाईरेक्शन . ओह, दिल्ली मेरा परदेस . फिलहाल देस जो है वो आँख की कंजंक्टीवाईटिस है और बडी तकलीफ दे रही है लगभग वैसी ही जैसे दोस्त देते रहे हैं या देना उनका फर्ज़ बनता है . मेरी बातों में तरतीब का अभाव दिखे तो आप उसे मेरी तीक्ष्ण बुद्धि पर आरोपित करने की बजाय अपने को दोस्त बताने वालों के घटिया बरताव व फलस्वरूप तदजनित मेरी आई फ्लू की आग पर मढें . कृप्या दुखी होने की अदायें मत लीजिये दुखी मैं हूँ .

अनोखी अभूतपूर्व कलाकृति : मैं, मैं, केवल मैं



Wednesday, September 12, 2007

क्‍या करूं कहां जाऊं?..

मन उद्वि‍ग्‍न हो गया है. आदमी किस पर भरोसा करे? इतनों पर किया.. देखता रहा भरोसा ज़मीन पर कितने गहरे और गंदा लोट सकता है.. जिन पर किया वो किसी शर्म में नहीं लोटते, महज खुद में लहालोट रहते हैं? अविनाश का ही उदाहरण ले लीजिए. ‘क्‍या पत्‍नी, क्‍या घर, क्‍या करियर, जी? सब फालतू है, महाराज!’ वाली अदायें लिये रहता है, और देखिए, जवान सारे मोर्चों पर चकाचक सेट है! सिगरेट मैं छोड़ना चाहता था, सुअर की तरह खों-खों करके दोहरा मैं हो रहा था, और छोड़ दी अभय आनन्‍द ने! छोड़ी ही नहीं, मेरे सिगरेटों को अपने यहां छोड़वाने का कौशल भी अर्जित कर लिया. और अब उसे अपने प्रताप-गान की तरह गाकर ताली भी बजवाना चाहते हैं? अभय से भरोसा उठ गया है. यशलिप्‍सा में आदमी कितना नीचे गिर जाता है. अविनाश का उदाहरण मैंने पहले दिया ही. खुद पीते रहकर अभय मियां मेरी सिगरेट छुड़वाने का लोकोपचार नहीं कर सकते थे? वह वस्‍तुत: असल मित्रोपचार होता. मानवीय होता. मगर अभय की तो मुझसे पुरानी ईर्ष्‍या है! अब भई, लड़कियां आप पर नहीं गिरतीं, मुझ पर गिरती हैं तो इसके लिए मैं दोषी थोड़े हूं? निमग्‍न होइए निर्मल-ब्रह्माचार में.. आपही ने तय किया आनन्‍दमग्‍न होंगे.. तो दाय भरिये उसका! हमें दोष न दीजिए.. ओह, प्‍लीज़?

तो मैं भरोसे के उठने की कह रहा था. तो फिर करूं क्‍या? यशलिप्‍सा की चाहना तो है मुझमें. बहुत ज़्यादा है. पैसों की भी है. और बहुत ज़्यादा पैसों की है. हिंदी के रेगुलर लिखवैया तीस ब्‍लॉगरों पर एकक्षत्र शासन की भी है. इसका अंतत: इलाज क्‍या है? शहर छोड़ दूं? अरुण पंगेबाज के आश्रम चले जाऊं? या कोई और वाजिब, कंफ़र्टेबल डेस्टिनेशन आपके ध्‍यान में है? कृपया मेरी मदद करें, मित्र! आप पर भरोसा कर सकता हूं या नहीं? कैन आई?..

Monday, September 10, 2007

अमेरिका, अमेरिका..

शांति कहां रहती है? रोज़मर्रे का मामला हो गई हैं लड़ाइयां.. एक चुकती नहीं कि कोई दूसरी, नया, मोर्चा बांधकर खड़ी हो जाती है.. शायद जीवन जीने का अब एक मतलब ही हो गया है कि आप कितनी सक्षम व समर्थ लड़ाई लड़ सकते हैं.. या नहीं लड़के एक हारे व मारे जीवन के अधिकारी बने रहते हैं.. कभी हमें सीधे-सीधे दीखती है.. तो कभी नहीं भी दिखती.. कि कैसे हमारी छोटी, पिद्दी-सी ज़िंदगी बड़ी लड़ाइयों का मोहरा है.. कैसे सारी लड़ाइयों का बाप अमरीका हमारी ज़िंदगियों को चक्‍करघिन्‍नी सा नचाता है!..

इस पर मैं एक-दो दिनों में फिर कुछ लिखूंगा.. मगर फिलहाल केपी शशि की बनाई और बी जयश्री के गाये इस चुटीले, लंगी लगाते विडियो का लुत्‍फ़ उठायें.. विडियो ज़रा वियर्ड है, मगर आज के हमारे जीवन में तब क्‍या नहीं है.. विडियो फॉरवर्ड कराने के लिए पहाड़ के हमारे एक पुराने मित्र विपिन बिहारी शुक्‍ल का शुक्रिया..



Technorati tags: ,

एक बेवक़ूफ लड़की का अंत..

दरवाज़े के ओट खड़े होकर रीझाना, मुंह बिराना, और उचित मात्रा में जब ज़रूरत पड़े लजाने का गुर जानती थी वह. जानती थी देवरजी की खाने में पसन्‍द, भसुरजी का गुस्‍सा और जेठानीजी को दोपहर सब निपटाने के बाद गोड़ दबवाना कितना पसन्‍द है. ओसारे में पराये-ठिलियाये मेहमानों की बतकुट्टन में जब भौजी का दिमाग नहीं चलता, सिर पर साड़ी डाले, सिल पर मसाला पीस चुप्‍पे बैंगन-लौकी का बजका और चाय चलाकर सबको खुश करने का सलीका जानती थी वह. मलपुआ में कितना केला जाएगा, परवल का अचार कब सूखेगा, रात में बच्‍ची उठ जाती है दीदी से नहीं सपरता तो बिना किसी के खबर हुए दीदी की बच्‍ची संभालती थी वह. औरतें ताज्जुब करतीं सोनिया ने सब सीखा है कहां से. अभी सत्रह की भी तो नहीं हुई थी, माथे में महीन सिन्‍दूर और कलाई में हरी चूड़ि‍यां सजाकर बदमाश इतरायी छत से कपड़ा हटाती और टीवी का नया गाना गुनगुनाती सबको मोह रही थी. कभी कहां बताया विपन्‍नता के बिहारी माध्‍यमिक शाला की फर्स्‍ट डिविज़नर है.

चालाक थी होशियार थी, सब जानती थी सोनी. एक यही ऐब था कि चोट लगती तो दिल पर ले लेती, खाना छोड़ देती, अपनी बात से पीछे नहीं हटती. सब जाननेवाली बेसऊर दुलहिन नहीं जानती थी ससुराल की हिंसा का मतलब. किरासन के कनस्‍तर वाले तंग कमरे में देर रात देवरानी और देवरजी से उलझने का मतलब क्‍या होता है नहीं समझ सकी बेवक़ूफ लड़की.

Friday, September 7, 2007

‘बाज़ार से गुज़रा हूं खरीदार नहीं हूं’ के करेक्‍शंस..

मैं बहुत शेरो-शायरी वाली मिजाज़ का नहीं.. चचा ग़ालिब तो दूर दुष्‍यंत कुमार भी कभी याद नहीं रहे.. तो ऐसा नहीं है कि ‘बाज़ार से गुज़रा हूं खरीदार नहीं हूं..’ सुनकर मुझे अचानक अक्रबर इलाहाबादी की याद आने लगी.. याद अभय और ज्ञानदत्‍तजी को आई थी.. मैं बस उनके याद आने को उधार लेकर कुछ और बातें सोचने लगा हूं.. खरीदने की कुछ अदायें भले हों, कूवत कभी ज़्यादा नहीं रही.. मगर बाज़ार से गुज़रना तो होता रहता है.. कभी-कभी या रोज़ नहीं, सोचने लग रहा हूं तो लगता है हर वक़्त बाज़ार से ही तो गुज़र रहा हूं! ज्ञानदत्‍त सही कहते हैं ‘स्‍पेस’ तो (या जो भी देखा जाना हो) अंतर्मन में होता है, जो नहीं देख पा रहे उनके लिए रेलवे लाइन के दोनों बाजू पर्याप्‍त जगह है, वह उससे आत्‍मा जुड़ायें. यह ज्ञानदत्‍तजी की समझ है, क्‍योंकि मेरे मानस-पटल में तो रेलवे लाइन के आसपास भी धकापेल और कोहराम की दुनिया ही है.. इलाहाबाद में शायद सुकूनी शांति रहती हो, मेरे शहर में नहीं रहती!.. जबकि बेजी दूसरे एक्‍स्‍ट्रीम पर जाती हैं.. कहती हैं ‘खुले मैदान में अकेले बैठे हों तो कभी इतना शोर हो जाता है कि म्यूट का स्विच ढूँढने का मन करता है.’ अब इसका क्‍या कहें? कि वास्‍तविकता बस झाईं मात्र है? और वर्चुअल के इस दौर में बाहर का दीखना महज़ हमारी रीलेटिव आंतरिक मन:स्थिति? देखने का एक सर्टेन पर्सनल एंगल?..

स्‍पेस सचमुच है? अंतमुर्खी अंतर्मन की शुद्धता मात्र से मुहैय्या हो जाएगा? किसी दूसरी परिस्थिति में श्रीश्री रविशंकरजी या किन्‍हीं अन्‍य पहुंचे हुए प्रभु की ममतामयी हस्‍त-कमलों के नीचे मैं कोई दूसरा व्‍यक्ति होकर ‘स्‍पेस है, स्‍पेस है!’ का भजन गाने लगता? ज्ञानदत्‍तजी को लोगों की असहजता दिखती है, मगर मैं समझने की कोशिश कर रहा हूं स्‍पेस के अभाव की मुश्किल उससे अलग चीज़ है? वह सबकी नींद और जागे में का बाज़ार नहीं है? जो हर वक़्त और हर कहीं इन दिनों सबके माथे चढ़ा एक ख़ास किस्‍म का राग बजाता रहता है.. जिसके नशे में बाकी का सबकुछ धुंधला व मलिन हुआ जाता है?..

अभी कुछ देर पहले किसी से बात हो रही थी.. वही सामाजिक झमेलों के किस्‍से.. मेरे उचटे मन में लगातार घूम-घूमकर यही बात आती रही कि सन् नब्‍बे के बाद के इस बदले समय में किसको किसकी चिन्‍ता है? और कितनी है?.. गरदन पर एक लात लगती है तो जैसे खोए-खोए-से नशे में ऊंघते हमारे मन में चिन्‍ता की एक महीन लकीर बनती है.. कभी-कभी हम गुस्‍से में उबलने लगते हैं.. मगर फिर जल्‍दी ही हमारी ऊंघ हमें वापस दबोच लेती है.. उस नशीली ऊंघ में हम और हमारे घर के सुख से परे और कोई भी बात मायने नहीं रखती.. कोई भी बात!.. मतलब रखती भी है तो उतना ही जितना शाहरुख ख़ान का परदे के पीछे पेप्‍सी बेचते हुए परदे पर देश के लिए चिन्‍ता करना..

पानी में जरे मेरा सांवर बदन!..

बेग़म रामजीत राय का सखी सकीना को पत्र..

जलम-जलम का साथ है! निभाने को हमने कई-कई जलम लिये! हमरी हमदन, हमरी दोस, किलोज़ टू द हर्ट, सकीना कुमारी बज़्मी! कइसी हो, सखी? जनाप नूर मुहम्‍मत बाबू कइसन हैं (खुसखबरी सुनावे वाला कौनो काम किये हैं कि नहीं? सच्‍ची बताना, सकीना.. कवन महीना चल रहा है?) ? अऊर तोहरे जियरा के सत्‍तपरकास, मद्धम-मद्धम जरै वाला डलैबर साहेब.. ऊ कइसे हैं? ए बीच अऊर कौची-कौची का झांकी देखाये हैं, कि खाली पकीचा के राजकुमार वाला मूंछिये देख-देखके मोरझाती रही हो? गीत-गचल का आदानी-परदानी त ज़रूरे होइबै किया होगा, नै? हो सकता है तोको लेके लाल बजार में चुनरी अऊर चूड़ी का मरकिटिंगो कराये हों? कहंवा-कहंवा मउज-मजा की, सच्‍ची-सच्‍ची बोल ना रे, चोट्टी? डलैबर साहब सेन-फेन का इस्‍प्रे मारते हैं कि मुंह से दारू का बास छूटता है? तोराके त ऊहो बास कवनो सेन से कम थोड़े बुझाता होगा?.. तोरा मन का पापी को हम खूब पहचानते हैं! ऊपरी-ऊपरी सधवा, साया का नीचे पतुरिया? है कि नै? ठी-ठी-ठी...

अरे, त एमें मुंह फुलाये का कवन बात है? हम कवनो तोता-चिरैया वाला कथा कि टीबी का रिपोटिन थोड़े बोल रहे हैं, तोहरा आगे तोरा मन का फैट खोल रहे हैं! ई कारज तू थोड़े करेगी.. मन में कहंवा-कहंवा का साकर-समुंदर उमड़ा रहा होगा.. ई जिम्‍मेदारी वाला काम त कवनो तोरा दिल का अचीच नै करेगी, सखी? संगी-साथी अऊर कवन बास्‍ते होवे करता है, तूहीये बोल ना, सकीनिया? मगर तू सच्‍चो में कइसन ठीठ अऊर बेसरम निकलीस रे? डलैबर साहेब का संगे एतना कहानी का लांग चम्‍प लेके चल गई, अऊर हमको कवनो डिटेलिनो नै दी? एही बदे अपना को हमरा सहेली बोलती है? तू त चइली-चइली पिटाये वाला काज की है! मियां नूर मुहम्‍मत का कानी तलक बात पहुंचेगा तब तोरा अकिल खुलेगा, हां! तब टेसुआ बहाये बास्‍ते हमको जिन याद करना.. बड़ सखी बनती है, चोट्टी कहींकी! हीं-हीं, ठी-ठी-ठी..

एगो बात बोल, सकीनिया.. बोलेगी ना? ई आज हमरा करेजा एतना काहे फर्र-फर्र उड़ि‍ रहा है? काहे ला हम एतना हीं-हीं अऊर ठीं-ठीं कै रहे हैं? बूझ ना? नै बुझाया? मन्‍नू मौसी एंड मम्‍मीजी भी नै बूझ पायीं! मगर तू त हमरा डियरेस डियर है रे, सखी? एनीबेस, आजकल कवन केकरा के समझता है.. सब अपना-अपना बुड़की में मगन-मस हैं?.. अब तोहरे जीवन में एतना गो उत्‍पात हो गया त हम्‍मे कवन है जे के डलैबर साहेब का हाल-बंदगी पूछै खातिर तोरा नजीके चल गए? डलैबर साहेब का फोटो अपना परस में रक्‍खै का त कब्‍बो सपनो में नै सोचे! बड़ स्‍वारथ वाला जुल्‍मी जमाना हो गया है, रे सकीना? एनीबेस, खुसखबरी ई है कि तोहरे भइया जी आज संझा हमको लेवे बास्‍ते आय रहे हैं! एतना त हमको टेंसन चढ़ा है कि का बोलें.. सुबही से लिपसिक मल-मलके एगो सोगहग लिपसिक का डंडी खा गए हैं! नवका लिपसिक खातिर फूलकुमारी का हिंया पूछवाई खातिर एगो लइकी पठाये त चोट्टी जबाब भेजायी है कि हम लिपसिक कंहवा करते हैं? चोट्टी, छिनरी कहींकी! तोरा को नै, सखी, फूलकुमरिया को बोल रहे हैं!

उनका संगे नजर भेंटाने पर कवन वाला गाना गाये का सचेसन करती है? मोरा अंक लग जा, बालमा? कि पानी में जरे मेरा सांवर बदन?

तुमरे जलम-जलम की सहेली,
बेबी कुमारी राय

खड़ा आदमी कितने खुले में खड़ा है?..

पता नहीं आपने हिंदी फ़ि‍ल्‍में देखते हुए लोग जिस तरह मकानों के भीतर रहते हैं उस पर कभी गौर किया है या नहीं.. हीरो ईमानदार सब-इंस्‍पेक्‍टर हो या शहर में ‘अच्‍छी’ ज़िंदगी और प्रेम कमाने पहुंचा नया-नया स्‍ट्रगलर.. वह पहले से ही काफ़ी अच्‍छी ज़िंदगी जीता दिखता है.. पानी की किल्‍लत नहीं होती, गैस के कनेक्‍शन का सोचकर वह उदास नहीं होता.. और सबसे ऊपर भंसाली, संतोषी, मणि रत्‍नम से लेकर इल्‍लु-बिल्‍लु-टिल्‍लु किसी की भी फ़ि‍ल्‍म में अपने बेचारे-किस्‍मत के मारे कैरेक्‍टर को ‘स्‍पेस’ की दिक्‍कत तो नहीं ही होती! भला आदमी गांव में ठौर जमाये हो चाहे बीच मुंबई में, जवान पसरकर रहता है.. कभी सोलह बाई बाईस के हॉल में लेटा हुआ चिंतित हो रहा है तो कभी अट्ठारहवीं मंज़ि‍ल की बालकनी से शहर का नज़ारा लेता उदास हो रहा है कि कब लाइफ पटरी पर आएगी!..

हिंदी फ़ि‍ल्‍मों में स्‍पेस की हैंडलिंग इतनी फूहड़ और हवाई होती है कि तथाकथित गंभीर फ़ि‍ल्‍मों में भी एक पॉयंट के बाद नहीं, शुरू से ही हम उसे गंभीरता से लेना बंद कर देते हैं.. बड़े शहरों में रहते हुए, अंदर ही अंदर इस सच्‍चाई को हम भी जानते हैं कि बी ग्रेड के हीरो तक ने- जिसने अपनी पिछली फ़ि‍ल्‍म में फलाने प्रिंस का रोल किया था- हो सकता है असल जीवन में अपने तीन कमरों वाले औसत मकान और गाड़ी की अभी तक किश्‍तें पटा रहा हो!..

हिंदी फ़ि‍ल्‍मों में स्‍पेस (सटेल्‍टी, कहानी, अभिनय के पैनेपन की ही तरह) दया जगाता है.. हतप्रभ और चकित नहीं करता.. उस तरह की जुगुप्‍सा व हतप्रभता समूची दुनिया में जगाने का काम सहजता से हॉलीवुड की फ़ि‍ल्‍में ही करती हैं.. मैं कभी अमरीका गया नहीं, जो गए हैं उन्‍हें इसका सही अन्‍दाज़ा होगा कि मकानों के भीतर आदमी कभी सांसत महसूस करता है या नहीं.. औसत मकानों के भीतर टहलते हुए लोग अभिषेकों और विवेकों और सलमानों के बंगलॉज़ से ज़्यादा सुखी जीवन जीते दिखते हैं.. जी रहे हैं? सचमुच?..

यहां तो ज्ञानदत्‍तजी के पोस्‍ट से बीच-बीच में याद आ जाता है वर्ना बंगलॉ तो हम भूल-सा गए थे.. घर के अंदर क्‍या, बाहर भी हाथ-पैर संभाल-संभालकर चलाना पड़ता है.. कि मालूम नहीं कब किसी पर पड़ जाए (हाथ और पैर दोनों)! मेरी बिल्डिंग में बच्‍चे एक तंग संकरी पट्टी में क्रिकेट खेलने की अदायें प्‍ले करते रहते हैं.. खुला मैदान वास्‍तविक जीवन में नहीं, सपने में भी देखे अर्सा हो गया.. शायद मैं स्‍पेस की किल्‍लत की कुछ ज़्यादा ही उदास तस्‍वीर बुन रहा हूं.. पता नहीं.. लेकिन ज़रा आपही सोचिए.. ठीक से याद करने की कोशिश कीजिएगा.. आखिरी मर्तबा कब ऐसा मौका आया था कि आपने खुद को खुले, बड़े मैदान में खड़ा पाया था.. और चारों ओर बीस हाथ की दूरी तक सिर्फ़ आप ही थे.. कोई दूसरा शरीर आपसे टकरा नहीं रहा था?..

कुछ याद आ रहा है? कि स्‍पेस का सोचकर आप भी मेरी ही तरह हिंदी फ़ि‍ल्‍मों के दिमागी दिवालियेपने पर हंस रहे हैं, और अपने ‘वास्‍तविक’ पर रो रहे हैं?..

नशे में डूबे तार और कायतानो वेलोज़ो की नशीली आवाज़..

राइ कूडर गिटार बजाते हैं. गुरू गिटारिस्‍ट हैं. स्‍लाइड गिटार की कलाकारियों ने उन्‍हें ख़ास पहचान दी (अब कृपया मुझसे स्‍लाइड गिटार एक्‍सप्‍लेन करने को न कहिए, इसे कोई गिटार में दखल रखता हो तो वही साफ़ करे). अस्‍सी के आखिर में पहली दफा मैंने राइ का जादू विम वेंडर्स की फ़ि‍ल्‍म ‘पेरिस, टैक्‍सास’ के बैकग्राउंड स्‍कोर के बतौर सुना था.. फिर उसमें रमा बहुत दिनों तक सुनता रहा था.. राइ साहब की गिटार-बजाई की एक विशेष खूबी है कि वह तारों पर उंगलियां फेरते-फेरते अचानक कहीं कोई तार खींचकर छोड़ देते हैं.. और फिर देर तक हवा में एक अकेला स्‍वर, दूसरे स्‍वरों के बीच, अपने अकेलेपन में गूंजता रहता है!.. वेस्‍टर्न फ़ि‍ल्‍मों के अकेलेपन, उजाड़पने की एक काटती, कचोटती-सी कशिश बन जाती है.. राइ को चाहनेवाले बाज मर्तबा उन्‍हें सुनते हुए अनजाने जैसे उस अकेले तार के बजने के इंतज़ार में बंधे रहते हैं!..

बाद के वर्षों में दुनिया में घूम-घमकर अलग-अलग मुल्‍कों के संगीतकारों के संग उन्‍होंने ढेरों जुगलबंदियां रेकर्ड कीं(भारतीय सितारवादक विश्‍व मोहन भट्ट ने जो ग्रैमी अवार्ड पाया था वह राइ के साथ तैयार किये उन दोनों की संगतकारी वाले एलबम: ए मीटिंग बाइ द रिवर का ही नतीजा थी).. राइ के कॉलाबरेशंस में अली फरका तूरे के साथ तैयार एलबम ‘टॉकिंग टिम्‍बकटू’, क्‍यूबा के पारम्‍परिक संगीतकारों के साथ तैयार ‘ब्‍युने विस्‍ता सोशल क्‍लब’ काफ़ी मशहूर रहे. ‘ब्‍युने विस्‍ता सोशल क्‍लब’ पर राइ ने एक डॉक्‍यूमेंट्री भी प्रोड्यूस की (निर्देशक विम वेंडर्स थे.. फ़ि‍ल्‍म और फ़ि‍ल्‍म का संगीत दोनों को ही सांस्‍कृतिक जगत में काफ़ी स्‍नेह और सम्‍मान मिला).

नीचे मैंने जो टुकड़ा आपके सुनने को रखा है, वह राइ साहब की पहचानी हुई सिग्‍नेचर शैली का नमूना नहीं है (हाथ आई नहीं, आगे कभी आएगी तो उसे सुनवाऊंगा).. यह बाद के वर्षों की घुमाई और कॉलाबरेशंस वाले दौर से हैं. राइ के साथ संगतकार हैं मानुएल गालबान.. टुकड़े का शीर्षक है: Echale Salsita..



दूसरे का शीर्षक है: सिक्रेट लव..



अफ़्रीका का माली.. माली के तूमानी दयाबते.. पता नहीं उस निहायत छोटे से मुल्‍क माली में ऐसी क्‍या बात है.. एक से एक धुरंधर फ़नकार निकलते रहते हैं.. किसी की आवाज़ मिश्री में सराबोर है तो किसी का संगीत ऐसा कि सीधे आत्‍मा में सेंघ लगाकर उतर जाए!.. बहुत सारे नाम हैं, यहां नाम नहीं गिनाऊंगा.. इन्‍हीं बहुतों के बीच एक पहुंची हुई हस्‍ती जनाब तूमानी भी हैं.. और बहुत पहुंचे हुए हैं. जो वाद्य बजाते हैं उसका नाम है तोरा.. क्‍या और कैसा वाद्य है और तूमानी की उंगलियां उसपर कैसे चलती हैं, इसे आप नीचे के वीडियो में खुद देख लीजिए..



मेट्रोटेक ब्रुकलिन में तूमानी का तोरा..



अफ़्रीका से वापस अमरीका आइए.. चार्ली हेडेन के सपनीले तारलोक में.. नीचे जो टुकड़ा वह बजा रहे हैं उसमें पैट मेथनी की संगत है..



अहाहा, आवाज़ की मिठास हो तो रफ़ी और मेंहदी साहब वाली हो.. या फिर कायतानो वेलोज़ो की.. सुनकर लगता है जैसे सीधे शहद की बरसात हो रही है!.. नीचे जो टुकड़ा कायतानो गा रहे हैं- कुकुर्रूकु पलोमा- एक स्‍पानी पारंपरिक रचना है.. पांच वर्ज़न तो खुद मैंने सुने हैं.. यहां कायतानो की मिठास है...



अंत में यह एक जुगलबंदी है.. याओ गिलबेर्तो और कायतानो वेलोज़ो.. बोल हैं.. Acontece que eu sou baiano..



Technorati tags: ,

Wednesday, September 5, 2007

सूअरों के बाड़े में..

मालूम नहीं आप दिन में कितनी दफा सहमते हैं, मैं अक्‍सर डरा हुआ आंखें खोलता हूं. फिर अनायास सहमा-सहमा-सा दिन बन जाता है ख़ास कोशिश नहीं करनी पड़ती. यह सच है बहक आती है (किसके नहीं आती?), मगर सामने बैठा व्‍यक्ति ज़्यादा हंसने लगे, समाज का ज़ि‍क्र आते ही दांत निपोरे और फिर चौककर कहे, अच्‍छा, आप उसकी बात कर रहे हैं! तब एकदम चौकन्‍ना होकर गाल पर चपत लगाता खुद को याद दिलाता हूं सूअरों के बाड़े में निश्चिंत होकर गुनगुनाना अच्‍छी शिक्षा नहीं. अभी पूरा दिन पड़ा है, आगे कदम-कदम पर सूअरों के बाड़े आएंगे; और बेहया मैं जितना होऊं, कंधे पर गंदे दांतों से मितली अब भी आती है, समय और समाज को सलीका से बरतने का शिकार हूं, दूसरे मानें इसलिए नहीं, खुद के लिए कलाकार हूं. तो संगत बनी रहती है, चादर तानने के साथ भय की वाजिब खुराक होती है जभी नींद सोती है.

Sunday, September 2, 2007

बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी..

ऐसी महफ़ि‍ल कब थी? ले गया छीन के कौन आज (कल, परसों, जाने कब से) मेरा सब्र-ओ-क़रार? बेक़रारी मुझे ऐ दिल कभी ऐसी तो न थी? कहां से ये लफड़े आये? ऐसी ढलन ढले कि गुलेल चला रहे हैं? जाने अभी आगे क्‍या चलायेंगे! एक सस्‍ता, देसी तमंचा ही चला लेते? एक चिरकुट तमंचा तक मैनेज नहीं कर सके? ओह, कितना हृदयविदारक हो सकती है ह्यूमन डेस्टिनी.. मेरी तो होती ही रहती है! रुना ना होती तो जाने कहां किस गहरे चला जाता! कहां जाता? यहीं जंगल-गलियों में गुलेल से गोलियां दाग़ता भरम पाले रहता कि यथास्थितिवाद पर परिवर्तनकामी बम फेंक रहा हूं! ओह, मनुष्‍य कितनी गफ़लत में रहता है.. फिर मनुष्‍य रह ही कहां पाता है?

देखिए, रुना की ज़रा-सी संगत और थोड़े से दुलार से कैसे मेरी ज़बान लरबराने लगी है.. कैसा तो जादूभरा गाती है कि सारे मेरे अपने, खुद के जादू कपूर होकर उड़ने लगते हैं.. उड़ते कहां से कहां निकल जाते हैं.. एकदम खाली, फिर निश्‍शब्‍द हो जाता हूं.. स्‍नेह मनुष्‍य को इतना बिगाड़ देती है? रुना का स्‍नेह मुझे इतना उखाड़ देता है? हाऊ इट हैपेंस?..

चलिए, फिर आप भी उखड़ते रहिये.. मेरी तरह कड़वा नहीं, मीठे-मीठे उखड़ि‍येगा!

Get this widget Share Track details


ग़ुलों में रंग भरे..

Get this widget Share Track details


रंजिश ही सही दिल दुखाने के लिए आ..

Get this widget Share Track details


आए कुछ अब्र कुछ शराब आए..

Get this widget Share Track details


Technorati tags: ,

Saturday, September 1, 2007

अज़दक को गुस्‍सा क्‍यों आता है?

चूने और सफ़ेद तेल रंगों से रंगे केश और रंगीन वेश बनाये इस आदमी की दिक़्क़त क्‍या है? अमेजोन या कहां के जंगलों में भटकता ये साबित कर क्‍या रहा है? पुलिस इसे पकड़ क्‍यों नहीं रही.. या अविनाश ही इसके खिलाफ़ पोस्‍ट क्‍यों नहीं लिख रहा? किसके विरुद्ध यह इस तरह के हिंसावाद पर उतारू है?.. या नंगावाद.. जो भी है, क्‍यों उतार रहा है?.. कोई ठुमरी गाकर अनामदास ने तो इसका कुछ नहीं बिगाड़ा? फिर किसके अंगेस्‍ट यह ऐसा भयानक मिसाइल ताने है? ज्ञानदत्‍तजी को यह धोबियापाट देना चाहता है? या इरफ़ान के सब पॉडकास्‍ट्स को ब्‍लास्‍ट कर देना चाहता है? कि प्रत्‍यक्षा को धमका रहा है कि झोली में चार किताबें डालकर पढ़वैया वाली अदायें न दिखाये? कि बोधि की कविताओं पर.. अभय को अपनी पुरातन शेर-सविता पर.. भई, किस पर बम-बम मुर्दाबाद हो रहा है? कि यह अपनी ही पतनशीलता के विरुद्ध है? कि सामा‍जिक सहोदरता और सदाचारी व्‍यवहार के खिलाफ़ ज़ेहाद? कि युनूस कुछ सुना नहीं रहे उसके लिए.. कि जो सुना रहे हैं वैसा क्‍यों सुना रहे हैं, उसके लिए? भई, जिसके भी लिए है, इस हिंसा को रुकवाये कोई.. ऐसी गंधाती पतनशीलता को पटरी पर लाये कोई?..

ये आदमी, ये कुत्‍ते..

स्‍टाइनबेक के ‘ऑव माइस एंड मेन’ के चूहों को हटा, कुत्‍तों को ठेल मैंने ये शीर्षक तैयार नहीं किया है. नहीं, सर. मैम, मिस, मादाम, मोहतरमा व्‍हॉटेवर. शीर्षक के पीछे कोई इंस्पाइरिंग स्पिरिट चिन्हित ही करना हो तो ज़्यादा से ज़्यादा मैं यहां बंगाल के ख्‍यातिलब्‍ध सिने-निर्देशक गौतम घोष का नाम ले सकता हूं.. 2003 में उनकी एक फ़ि‍ल्‍म आई थी- ‘आबार अरण्‍ये’.. अंग्रेज़ी में ‘इन द फ़ॉरेस्‍ट... अगेन’. गुरू सत्‍यजीत राय की 1970 की बनी ‘अरेण्‍येर दिन रात्रि’ के संसार में 33 वर्ष बाद चेले की पुनर्वापसी. याद आया? जाने दीजिये, मत याद आने दीजिये. वैसे भी ‘आबार अरण्‍ये’ दो कौड़ी की फ़ि‍ल्‍म थी.. आबार कम था.. ‘गोबार’ ज़्यादा. मैंने सिर्फ़ इसलिए चर्चा की क्‍योंकि यहां ‘आबार कुकुर’ का सन्‍दर्भ है. जाने क्‍या है अज़दक में बार-बार इस थीम पर लौटता रहता हूं.. थोड़ा वक़्त बीतता नहीं कि फिर कुत्‍तों की कोई शोभायात्रा.. उनका यशगान.. मानो ऐसी अनुपम रचना हैं कि बार-बार पुनर्वापसी को जी करे.. ‘जिय राजा!’ करे!

आख़ि‍र ऐसा क्‍या ख़ास है कुत्‍तों में? इससे अलग कि कुत्‍ता अपने नंगेपने से शर्माता नहीं.. यौन-उत्‍सव के मुक्‍ताचार, सार्वजनिक प्रदर्शन में यकीन रखता है.. और ‘अहा, कितना मार्मिक, सुखकारी अनुभव है!’ जैसा फ़रेबी नकाब चेहरा पर चढ़ाने की जगह, दीवार पर कील ठोकने या मंदिर के बाहर चप्‍पल उतारने की स्‍वाभाविकता के साथ सेक्‍स का वरण करता है. आदमी जिस चीज़ की इतनी गहरे कामना करता है, ‘ओरल जॉब’ की महंगी सेवायें लेता है.. कुत्‍ते को देखिये, उस जॉब पर बिना किसी महंगाई या चतुराई का रबर चढ़ाये बड़े ही सहज (योग) भाव से दिन में चार मर्तबा निपटाता चलता है!.. और चेहरे से रत्‍ती भर यह भाव ज़ाहिर करने नहीं देता कि देखो, गुरू, कितना बड़ा जॉब निपटा लिये!.. बावजूद ऐसी गरिमामय प्रतिभा व सुलझी हुई दार्शनिकता के कुत्‍ते का इस्‍तेमाल लोग (निर्मल-आनन्‍द) ‘आप पर कुत्‍ता छोड़ देंगे तब जानियेगा!’ जैसी गालियों में करते हैं! क्‍या यह किसी भी तरह से उचित है? एक पतित आनन्‍द का इसमें आभास भले मिले, निर्मल तो यह किसी भी दृष्टि से नहीं..

कुत्‍ता गुणों की जितनी भी चर्चा की जाये, कम है.. कुत्‍तागान की सांगितिका का कोई अन्‍त नहीं.. मैं दस किताबें लिख डालूं तब भी मेरे श्रद्धापुष्‍पों का पूर्ण विसर्जन न हो सकेगा. ओह! कुत्‍ते!..

अपनी गली में किसी नये अजनबी को घुसता देख आदमी क्‍या करता है? आगे बढ़कर उसे गली के आख़ि‍री मकान के पते का डायरेक्‍शन देने लगता है. या अजनबी के किंचित संकोच का आंखों ही आंखों एक अटपटे मुस्‍कान में जवाब देता है.. भई, मैं पूछता हूं क्‍यों इतने सारे ढकोसले? ये सरासर की मूढ़ता? अजनबी आततायी, आतंकवादी हुआ तो? मुसलमान हुआ तब? फिर गली के बमकांड का असल दोषी कौन साबित होगा- आदमी या अजनबी? अब इसी एक्‍ज़ांपल में ज़रा कुत्‍ते को ठेलकर देखिए.. पहला काम तो कुत्‍ता करेगा, नथुने ऊपर और आंखें फ़ोकस्‍ड करके ‘गुर्र-गुर्र’ करके अजनबी को ताड़ेगा, तोड़ेगा.. फिर मौक़ा लगते ही ‘एंटी बांब स्‍क्‍वॉड’ की टेकनीक फ़ॉलो करता शत्रु कुत्‍ते का अगड़ा-पिछाड़ा सब सूंघकर उसकी असलियत बाहर कर देगा.. क्‍यों करेगा ऐसा? क्‍योंकि आदमी नहीं है, कुत्‍ता है. समझदार!

समाज को फांक-फांक करके उसे दो कौड़ी का बना डालने की आदमी की नासमझी की ही एक झलक लीजिए.. हर किसी को वह कैटगराइज़ करता चलता है.. फलाने ‘गुप्‍ता’ हैं तो ढेकाने ‘बाभन’ हैं.. बिहारी, चिरकुट, नक्‍सल, कांग्रेसी, भ्रष्‍ट, दुकानदार, पत्रकार, फिरंगी, चोर, लुच्‍चा.. जैसे इन विशेषणों से स्‍वतंत्र हम आदमियत पहचान ही नहीं सकते?.. अविनाश तो नहीं ही पहचान सकता.. जबकि कुत्‍तों की पहचान बड़ी साफ़ होती है.. उनकी चर्चा और संज्ञा में हम क्‍या कहते हैं? सिर्फ़ कुत्‍ता कहते हैं!

आदमी का कोई भविष्‍य नहीं.. जबकि कुत्‍तों का भविष्‍य एकदम सुरक्षित है.. कुत्‍तों पर आसन्‍न मेरी सनसनीखेज़ पुस्तिका की सनसनीखेज़ प्रतिक्षा करें तो शायद आपका भविष्‍य भी कुछ सुरक्षित हो जाये.. (गारंटी मैं नहीं लेता. गारंटी मैं किसी चीज़ की नहीं लेता)!

Technorati tags: ,