Saturday, September 1, 2007

ये आदमी, ये कुत्‍ते..

स्‍टाइनबेक के ‘ऑव माइस एंड मेन’ के चूहों को हटा, कुत्‍तों को ठेल मैंने ये शीर्षक तैयार नहीं किया है. नहीं, सर. मैम, मिस, मादाम, मोहतरमा व्‍हॉटेवर. शीर्षक के पीछे कोई इंस्पाइरिंग स्पिरिट चिन्हित ही करना हो तो ज़्यादा से ज़्यादा मैं यहां बंगाल के ख्‍यातिलब्‍ध सिने-निर्देशक गौतम घोष का नाम ले सकता हूं.. 2003 में उनकी एक फ़ि‍ल्‍म आई थी- ‘आबार अरण्‍ये’.. अंग्रेज़ी में ‘इन द फ़ॉरेस्‍ट... अगेन’. गुरू सत्‍यजीत राय की 1970 की बनी ‘अरेण्‍येर दिन रात्रि’ के संसार में 33 वर्ष बाद चेले की पुनर्वापसी. याद आया? जाने दीजिये, मत याद आने दीजिये. वैसे भी ‘आबार अरण्‍ये’ दो कौड़ी की फ़ि‍ल्‍म थी.. आबार कम था.. ‘गोबार’ ज़्यादा. मैंने सिर्फ़ इसलिए चर्चा की क्‍योंकि यहां ‘आबार कुकुर’ का सन्‍दर्भ है. जाने क्‍या है अज़दक में बार-बार इस थीम पर लौटता रहता हूं.. थोड़ा वक़्त बीतता नहीं कि फिर कुत्‍तों की कोई शोभायात्रा.. उनका यशगान.. मानो ऐसी अनुपम रचना हैं कि बार-बार पुनर्वापसी को जी करे.. ‘जिय राजा!’ करे!

आख़ि‍र ऐसा क्‍या ख़ास है कुत्‍तों में? इससे अलग कि कुत्‍ता अपने नंगेपने से शर्माता नहीं.. यौन-उत्‍सव के मुक्‍ताचार, सार्वजनिक प्रदर्शन में यकीन रखता है.. और ‘अहा, कितना मार्मिक, सुखकारी अनुभव है!’ जैसा फ़रेबी नकाब चेहरा पर चढ़ाने की जगह, दीवार पर कील ठोकने या मंदिर के बाहर चप्‍पल उतारने की स्‍वाभाविकता के साथ सेक्‍स का वरण करता है. आदमी जिस चीज़ की इतनी गहरे कामना करता है, ‘ओरल जॉब’ की महंगी सेवायें लेता है.. कुत्‍ते को देखिये, उस जॉब पर बिना किसी महंगाई या चतुराई का रबर चढ़ाये बड़े ही सहज (योग) भाव से दिन में चार मर्तबा निपटाता चलता है!.. और चेहरे से रत्‍ती भर यह भाव ज़ाहिर करने नहीं देता कि देखो, गुरू, कितना बड़ा जॉब निपटा लिये!.. बावजूद ऐसी गरिमामय प्रतिभा व सुलझी हुई दार्शनिकता के कुत्‍ते का इस्‍तेमाल लोग (निर्मल-आनन्‍द) ‘आप पर कुत्‍ता छोड़ देंगे तब जानियेगा!’ जैसी गालियों में करते हैं! क्‍या यह किसी भी तरह से उचित है? एक पतित आनन्‍द का इसमें आभास भले मिले, निर्मल तो यह किसी भी दृष्टि से नहीं..

कुत्‍ता गुणों की जितनी भी चर्चा की जाये, कम है.. कुत्‍तागान की सांगितिका का कोई अन्‍त नहीं.. मैं दस किताबें लिख डालूं तब भी मेरे श्रद्धापुष्‍पों का पूर्ण विसर्जन न हो सकेगा. ओह! कुत्‍ते!..

अपनी गली में किसी नये अजनबी को घुसता देख आदमी क्‍या करता है? आगे बढ़कर उसे गली के आख़ि‍री मकान के पते का डायरेक्‍शन देने लगता है. या अजनबी के किंचित संकोच का आंखों ही आंखों एक अटपटे मुस्‍कान में जवाब देता है.. भई, मैं पूछता हूं क्‍यों इतने सारे ढकोसले? ये सरासर की मूढ़ता? अजनबी आततायी, आतंकवादी हुआ तो? मुसलमान हुआ तब? फिर गली के बमकांड का असल दोषी कौन साबित होगा- आदमी या अजनबी? अब इसी एक्‍ज़ांपल में ज़रा कुत्‍ते को ठेलकर देखिए.. पहला काम तो कुत्‍ता करेगा, नथुने ऊपर और आंखें फ़ोकस्‍ड करके ‘गुर्र-गुर्र’ करके अजनबी को ताड़ेगा, तोड़ेगा.. फिर मौक़ा लगते ही ‘एंटी बांब स्‍क्‍वॉड’ की टेकनीक फ़ॉलो करता शत्रु कुत्‍ते का अगड़ा-पिछाड़ा सब सूंघकर उसकी असलियत बाहर कर देगा.. क्‍यों करेगा ऐसा? क्‍योंकि आदमी नहीं है, कुत्‍ता है. समझदार!

समाज को फांक-फांक करके उसे दो कौड़ी का बना डालने की आदमी की नासमझी की ही एक झलक लीजिए.. हर किसी को वह कैटगराइज़ करता चलता है.. फलाने ‘गुप्‍ता’ हैं तो ढेकाने ‘बाभन’ हैं.. बिहारी, चिरकुट, नक्‍सल, कांग्रेसी, भ्रष्‍ट, दुकानदार, पत्रकार, फिरंगी, चोर, लुच्‍चा.. जैसे इन विशेषणों से स्‍वतंत्र हम आदमियत पहचान ही नहीं सकते?.. अविनाश तो नहीं ही पहचान सकता.. जबकि कुत्‍तों की पहचान बड़ी साफ़ होती है.. उनकी चर्चा और संज्ञा में हम क्‍या कहते हैं? सिर्फ़ कुत्‍ता कहते हैं!

आदमी का कोई भविष्‍य नहीं.. जबकि कुत्‍तों का भविष्‍य एकदम सुरक्षित है.. कुत्‍तों पर आसन्‍न मेरी सनसनीखेज़ पुस्तिका की सनसनीखेज़ प्रतिक्षा करें तो शायद आपका भविष्‍य भी कुछ सुरक्षित हो जाये.. (गारंटी मैं नहीं लेता. गारंटी मैं किसी चीज़ की नहीं लेता)!

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5 comments:

  1. उठाने ही होगे अभिव्यक्ति के खतरे.. तोड़ने ही होंगे गढ़ और मठ सब.. पहुँचना ही होगा दुर्गम पहाड़ियों के उस पार..
    कहते-कहते चले ही गए उधर.. तो अब उधर जा के कैसी लगती है दुनिया.. इस पर छापिए अगली पोस्ट..

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  2. भौं भौं भौं भू भू भू भूउउ

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  3. लिखते ही मुफ्त मे प्रथम से प्रथम आलोचना कराने के लिये भेजे..मुंबई पुणे राजमार्ग पर मिल जाने की पूरी उम्मीद् .काटने का पता नही भौकने कई 100% गारंटी है..

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  4. अरे आप कुत्‍ते से भी सीख सकते हे वफ़ादारी.

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  5. स्टाइनबेक तब लगभग साठ के हो चुके थे , बाइपास सर्ज़री भी हो चुकी थी और एक बड़े लेखक के रूप में उनकी ख्याति भी चतुर्दिक फैल-फूल चुकी थी,वे एक दिन अमेरिका की खोज में अकेले -- किसी अनाम-गुमनाम की तरह निकल पड़े. एक ट्रक को घर की शक्ल में रूपांतरित करके . लगभग चालीस राज्यों को मंझाते हुए वे अमेरिका के एक कोने से दूसरे कोने तक गए और अमरीकी लोकाचार का अनूठा विश्लेषण प्रस्तुत किया .

    नहीं वे अकेले नहीं निकले थे . साथ में था उनका सखा -- उनका फ़्रेंच पूडल कुत्ता 'चार्ली'. तभी तो इस अनूठे यात्रा संस्मरण का नाम हुआ 'ट्रैवल्स विद चार्ली' या 'ट्रैवल्स विद चार्ली : इन सर्च ऑव अमेरिका' .

    इधर आप आदमी और कुत्तों पर बार-बार लौट और लिख रहे हैं . जल्दी ही इस पुस्तक में से स्टाइनबेक और चार्ली पर -- उनकी इस अनूठी यात्रा पर कुछ लिखूंगा . इसमें चार्ली के बहाने आदमी और कुत्तों पर कुछ जबर्दस्त टिप्पणियां भी हैं .

    स्टाइनबेक मेरे सर्वाधिक प्रिय लेखकों में से हैं . उनके सभी उपन्यास 'ऑफ़ माइस एण्ड मैन'से लेकर 'द ग्रेप्स ऑव राथ','कैनरी रो','टॉर्टिया फ़्लैट','द पर्ल','ईस्ट ऑव ईडन' तक मन को मोह लेने वाले उपन्यास हैं .

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