Sunday, September 2, 2007

बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी..

ऐसी महफ़ि‍ल कब थी? ले गया छीन के कौन आज (कल, परसों, जाने कब से) मेरा सब्र-ओ-क़रार? बेक़रारी मुझे ऐ दिल कभी ऐसी तो न थी? कहां से ये लफड़े आये? ऐसी ढलन ढले कि गुलेल चला रहे हैं? जाने अभी आगे क्‍या चलायेंगे! एक सस्‍ता, देसी तमंचा ही चला लेते? एक चिरकुट तमंचा तक मैनेज नहीं कर सके? ओह, कितना हृदयविदारक हो सकती है ह्यूमन डेस्टिनी.. मेरी तो होती ही रहती है! रुना ना होती तो जाने कहां किस गहरे चला जाता! कहां जाता? यहीं जंगल-गलियों में गुलेल से गोलियां दाग़ता भरम पाले रहता कि यथास्थितिवाद पर परिवर्तनकामी बम फेंक रहा हूं! ओह, मनुष्‍य कितनी गफ़लत में रहता है.. फिर मनुष्‍य रह ही कहां पाता है?

देखिए, रुना की ज़रा-सी संगत और थोड़े से दुलार से कैसे मेरी ज़बान लरबराने लगी है.. कैसा तो जादूभरा गाती है कि सारे मेरे अपने, खुद के जादू कपूर होकर उड़ने लगते हैं.. उड़ते कहां से कहां निकल जाते हैं.. एकदम खाली, फिर निश्‍शब्‍द हो जाता हूं.. स्‍नेह मनुष्‍य को इतना बिगाड़ देती है? रुना का स्‍नेह मुझे इतना उखाड़ देता है? हाऊ इट हैपेंस?..

चलिए, फिर आप भी उखड़ते रहिये.. मेरी तरह कड़वा नहीं, मीठे-मीठे उखड़ि‍येगा!

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ग़ुलों में रंग भरे..

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रंजिश ही सही दिल दुखाने के लिए आ..

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आए कुछ अब्र कुछ शराब आए..

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7 comments:

  1. ये गुलेल चलाई क्या,किस पर चलाई क्यू चलाई कब चलाई,गर नही चलाई तो आप गुलेले का मिस्यूज कर रहे है फोरन भेजिये हम ट्राई करेगे..:)

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  2. प्ले नहीं हो रहा है प्रमोद भाई साब। कुछ ना कुछ गड़बड़ है।
    आप ईस्निप के अलावा lifelogger.com पर भी गाने लगा सकते हैं, वहाँ आसानी से और तेजी से प्ले हो जाते हैं।
    देखिये मैने यहाँ लगाया है, दिलीप कुमार की आवाज में गाना।

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  3. रंजिश ही सही वाली गज़ल में मेहंदी हसन ने ये दो शेर नहीं गाये थे परन्तु रूना लैला ने गाये हैं।
    कुछ तो कुछ तो कुछ तो मेरे पिन्डार-ए- मुहब्ब्त का भरम रख-२
    तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिये आ

    इक उम्र से हूं लज्जत-ए-गिरिया से भी महरूम ए राहत जां मुझको रुलाने के लिये आ

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  4. चारो की चारों सुन डालीं। लेकिन क्या बात है, अजदक को कल गुस्सा आ रहा था और आज अजदक कुछ उदास सा लग रहा है?

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  5. जैसी अब है तेरी महफिल
    वैसी पहले तो न थी.....

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  6. अजदक भैया डुप्ली केट क्योंू चढ़ाया सरकार ।
    नीचे मेंहदी हसन चढ़ा रखे हैं आपने और यहां रूना लैला की वो तमाम चीजें जो उन्होंईने
    दूसरे गायकों की नकल करते हुए गाई हैं । धुन भी वही रखी है ।
    इत्ती पसंद हैं रूना लैला ।
    हम कहते हैं कि मेहदी हसन की ओरीजनल आवाज़ में पूरा खजाना सुनवाओ तो कोई अजदकी बात लगे ।
    जे सब क्यां है ।

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  7. नाहर साहब के लिये.... कि वो दो पैरा रुनाजी ने अलग से गाई है... नही अलग से नही गाई है इसको मेंहदी साहब ने भी गाया है अपने लाईव कंसर्ट मॆ... आप कही भी सुन सकते है.. वैसे यूनुस जी को भी कहना है कि बेशक मेंहदी साहब ने ओरिजनल ही गाया है पर रुना की जो खनकती आवाज़ है उसको भी सुनने का अलग ही मज़ा है.

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