Wednesday, September 5, 2007

सूअरों के बाड़े में..

मालूम नहीं आप दिन में कितनी दफा सहमते हैं, मैं अक्‍सर डरा हुआ आंखें खोलता हूं. फिर अनायास सहमा-सहमा-सा दिन बन जाता है ख़ास कोशिश नहीं करनी पड़ती. यह सच है बहक आती है (किसके नहीं आती?), मगर सामने बैठा व्‍यक्ति ज़्यादा हंसने लगे, समाज का ज़ि‍क्र आते ही दांत निपोरे और फिर चौककर कहे, अच्‍छा, आप उसकी बात कर रहे हैं! तब एकदम चौकन्‍ना होकर गाल पर चपत लगाता खुद को याद दिलाता हूं सूअरों के बाड़े में निश्चिंत होकर गुनगुनाना अच्‍छी शिक्षा नहीं. अभी पूरा दिन पड़ा है, आगे कदम-कदम पर सूअरों के बाड़े आएंगे; और बेहया मैं जितना होऊं, कंधे पर गंदे दांतों से मितली अब भी आती है, समय और समाज को सलीका से बरतने का शिकार हूं, दूसरे मानें इसलिए नहीं, खुद के लिए कलाकार हूं. तो संगत बनी रहती है, चादर तानने के साथ भय की वाजिब खुराक होती है जभी नींद सोती है.

1 comment:

  1. सोकर फ्रेश उठिये फिर सहम जाईयेगा. सिलसिला ही तो है.

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