9/6/07

मेरी चीन यात्रा: सोलहवां भाग

अच्‍छा सिला दिया मेरे प्‍यार का!..

गाओपिंग की पीठ हिलने लगी तो पहले यही लगा इसे भी मस्‍ती चढ़ रही है.. जवाब में मैंने उसकी पीठ पर गाल और गहरे धंसा दिए. साइकिल डोलाती हुई थोड़ा आगे जाकर वह सड़क के एक किनारे खड़ी हो गई.. उसकी कमर में चिकोटी काटता मैं कैरियर से नीचे कूदकर बोला- मज़ा आया ना?.. तब जाकर नज़र पड़ी कि बदमाश प्रसन्‍न कहां थी, महारानी बुलके चुआ रही थी!

स्‍वाभाविक है देखते ही मैं पक गया. ढलान की सड़क पर हम इतनी मस्‍ती-मस्‍ती में जा रहे थे और अचानक यह बीच राह नाटक खोलकर खड़ी हो गई! भूला-भटका कोई पुलिसवाला गुजरा तो यही समझेगा मैं औरत को रुला रहा हूं! कहा- अब क्‍या हुआ? बोला था नानान को मेरे हवाले कर दो? इतना भारी बच्‍चा है तुम्‍हारा, मैं भी ऐसा गेंदे का फूल नहीं, कहां तक बोझा ढोके चलतीं.. आंसू आयेगा ही!

गाओपिंग ने नानान की गठरी खोलकर मेरे हवाले की, ना कोई और जवाब दिया, बस चुपचाप सुबुकयाती रही. मैं गंभीर चिन्‍ता में- यार, ये किस बात का इतना दुखड़ा फैला रही है? मैंने तो कोई कुकर्म किया भी नहीं, ज़रा-सी चिकोटी काटी? पीठ पर मेरे गाल सटाने का बुरा मान रही है?

- मैंने पीठ पर गाल सटाया उसका बुरा मानी हो?- उसके चेहरे के नज़दीक चेहरा ले जाके ज़ोर से डांटा मैंने. इस पर भी मां कुछ नहीं बोली, अलबत्‍ता बेटी अब ‘भां-भां’ करके रोने लगी. तब नानान को मैंने जमके एक पिलाया- अबे ऐ, तू क्‍यों रो रही है? अभी लगाऊंगा एक सारा बां-बां भूल जाएगी! बच्‍ची की मां ने मुझे ऐसे देखा मानो थ्‍याननमैन के बाद चीनी धरती पर जल्‍लाद मेरी ही शक्‍ल में अवतरित हुआ है, और ख़ामोशी से आंख के लोर पोंछने लगी. दूसरी दिशा से धीमी चाल साइकिल चलाते दो बूढ़े आ रहे थे. हमारी ओर सशंकित नज़रों से देख रहे थे जैसे सड़क के किनारे साइकिल रोककर मैं अपनी घरवाली और बच्‍चे की पिटाई कर रहा होऊं! मैंने हवा में हाथ नचाते हुए कहा- जाओ, जाओ ताऊ, इधर नाटक नहीं हो रहा! ये बेहया जबरजस्‍ती कान की बाली के लिए खुलेआम सीन कर रही है, अभी दो लप्‍पड़ खाके लाइन पे आ जाएगी?..

वैसे भी बुड्ढों में दम नहीं था कि आकर मुझसे भिड़ते.. चुपचाप अपनी राह चले.. उनके निकलने के बाद मैं गाओपिंग पर लपका- आखिर किस बात का तुम इतना नखड़ा कर रही हो? मैंने तुम्‍हारी चुन्‍नी खींची है, क्‍या किया है? (वामपंथ के नाम पर पूरे चीन में ऐसी बेशर्मी है कि लड़कियां, औरतें सब बिना चुनरी के घूमती हैं! हद है).. कि मेरे बोझ से तुम्‍हारी आंखें भर आ रही हैं? वो पीछे ट्रैक्‍टर आ रहा है, क्‍या चाहती हो उस पर लदके निकल जाऊं? तब सुखी रहोगी?..

गाओपिंग बिना कुछ कहे चुपके आगे बढ़ गई.. मानो मौन रहकर मेरे सुझाव का ‘हां’ में उसने अपना जवाब दे दिया हो.. भां-भां रोती नानान मुझे गुस्‍से से देख रही थी जैसे उसके डेढ़ साला जीवन के दुखों का भी मैं ही जिम्‍मेदार होऊं! मैंने बुदबुदाकर कहा- दोनों मां-बेटी चूल्‍हे में जाओ तुमलोग!

चूल्‍हे की जगह वापस साइकिल सड़क पर लाकर गाओपिंग नानान को संभाले साइकिल पर बैठी और आराम से निकल गई!.. बाय-बाय, दसविदानिया, सायॉनारा- कुछ नहीं! गुस्‍से में तिलमिलाकर मैंने वहीं से आवाज़ का भारी ढेला फेंका- इसी तरह मेहमान को विदा करते हें तुम्‍हारे चीन में? यही सीखा स्‍कूल में, आं?..

मगर बेहया ने एक मर्तबा भी पलटकर नहीं देखा.. जैसे मैं सचमुच जल्‍लाद ही था.. जल्‍लाद से पिंड छुड़ाके जल्‍द से जल्‍द दूर निकल जाना चाहती हो? वाह रे औरत! अच्‍छा सिला दिया मेरे प्‍यार का?.. जाओ, हमें क्‍या? मज़े में ट्रैक्‍टर में लदके जायेंगे, तुम्‍हारी साइकिल की कैरियर पर बैठे-बैठे वैसे भी जाने हम कितना ज़ख़्म लेकर शहर पहुंचते..

लेकिन ट्रैक्‍टर की स्‍टीयरिंग पर बैठा नौजवान कोई चरसी लग रहा था.. मकई से लदी अपनी ट्रॉली पर मुझे लादने को लेकर बहुत उत्‍साहित नहीं लग रहा था. मैंने बिना उसकी प्रतिक्रिया की परवाह किये खुद को मकई पर लादते हुए कहा- हद करते हो, यार? तुम्‍हारे यहां पड़ोस के मेहमान से सब इसी तरह पेश आते हैं क्‍या?

चरसी ने मेरी बात का जवाब नहीं दिया. चुपचाप होंठों में दबे सिगरेट के कश लेता रहा, मोटर की फट्ट-फट्ट की एकरसता में मुर्दा आंखों सामने देखता रहा. मकई की भीड़ को इधर-उधर करके मैंने अपने लिए ठीक से जगह बनाई, फैलकर लेट गया. पंजों के नीचे सिर किये धुले, नीले आसमान को तककर उदास होने लगा.. अंदाज़ ही न हुआ कब मुंह से बात निकली- बड़ा दुखी हूं, भाई.. बीवी बच्‍ची के साथ मुझे छोड़कर चली गई है.. ज़िंदगी में सिर्फ़ अंधेरा ही अंधेरा दिख रहा है! ओह, गॉड, हाऊ विल आई कोप विद् ऑल दिज़?

अबकी चरसी ने सिर घुमाकर मुझे गौर से देखा. मैंने मधुमती वाले दिलीप कुमार की फीक़ी मुस्‍कान भरी, सर्द आह लेकर कहा- अभी नहीं समझोगे.. शादी-वादी कर लो, मेरी उम्र में जाके पता चलेगा बीवी और बच्‍ची के छोड़के जाने का क्‍या मतलब होता है! साले, चिरकुट कहींके!

- मालूम है.. मतलब- चरसी ने आराम से कहा- मेरी भी छोड़के गई है! एक नहीं दो बच्‍चे थे.. बेटे.. दोनों अपने साथ लेके गई! अच्‍छा है झंझट खत्‍म हुआ..

चरसी का जवाब सुनकर झटके से ज्यादा मन को तक़लीफ़ पहुंची, बोला- बड़े निर्दयी हो, यार! अपनी बीवी और बच्‍चे के लिए कहीं ऐसा कहते हैं? मैं तो सारी उम्र गाओपिंग और नानान को नहीं भूल सकता! मेरे दिल में सूराख छोड़के गई है वो औरत.. इट कैन नेवर बी हील्‍ड. नेवर! इफ़ यू डोंट माइंड आई वुड लाइक टू टेक अ नैप एंड थिंक अबाऊट माई डियर वाइफ एंड बेबी?

चरसी अपने को ही माइंड करने की हालत में नहीं था, मुझे क्‍यों माइंड करता.. आंखें मूंदकर मैं एकदम नींद में उतर गया.. सपने में मकई पर नहीं, बिहार स्‍टेट ट्रांसपोर्ट की बस की छत पर लेटा था.. बस की छत पर भी वही बिहारी कचर-मचर.. एक औरत स्‍टोव निकालकर अपने बच्‍चे के लिए दूध गर्म करना चाह रही थी.. मैंने लेटे-लेटे आंखें तरेरी- क्‍या हो रहा है, हो क्‍या रहा है? जहां पहुंचो बाप का घर बना लो? ताजमहल जाके अपना लुगा सुखाने लगियेगा? कोई शिक्षा-दीक्षा है कि नै बिहार में? ज़ाहिल औरत एक हाथ में स्‍टोव और दूसरे में रोता बच्‍चा लिए मुझे गाली देने को फड़फड़ाती रही.. मैं झुंझलाके बोला- ऐसे बच्‍चे पैदा कर देते हैं, साले कि जहां देखो इनको दूधे चाहिए! एक हमारा भी तो है, ये काहे नै दूध ला रो रही है? मेरी छाती पर हुमसती नानान दांत चियारे मस्‍त थी, उसकी मस्‍ती देखकर औरत का कलेजा ईर्ष्‍या से जल गया. मैंने गाओपिंग को मुस्‍कराकर नज़दीक खींच लिया.. मगर कंधे पर सिर गिराते ही वह शिकायतियाने लगी- कह रही थी साइकिल लेके चलो? तुम्‍हारी ही ज़ि‍द पर इस रेलम-पेल में चढ़े, पता नहीं अभी और कितनी देर गजन होगी?

मैंने चिढ़कर कहा- अरे, हर चीज़ में प्राबलम है तेरे को.. हर जगह तोको साइकिल वाला अय्याशी मिलेगा, जी? हिंया बस का छत पे बलम से हिलग के बइठी है तो एमें सुख नहीं भेंटा रहा? नाननिया को देखो बाकी पसिंजर का साथ केतना चहक-चहक के खिखिया रही है?.. एगो तुम्‍हीं हो, हर्र चीज़ का शिकायत!..

पता नहीं नीचे बस के भीतर झगड़ा हुआ कि कहां, कुछ शोर-शराबा हो रहा था.. उसी से आंख खुल गई.. मकई के बाल कान गुदगुदा रहे थे.. धड़ से समझ में आ गया बिहार नहीं अभी चीन में ही हूं.. और गाओपिंग के स्‍नेह नहीं अभी भी चरसी और उसके ट्रैक्‍टर की ट्रॉली में ही उलझा हूं.. रेल फाटक पर इकट्ठा गाड़ि‍यों के कचर-मचर के बीच, सिगनल के हरा होने का इंतज़ार करता.. गाओपिंग बिना आवाज़ वाला तमाचा मारकर जा चुकी है.. और अब शायद जीवन में फिर कभी दिखाई न दे!..

न गाओपिंग, न मेरी दुलरुई नानान! सोचकर कलेजे में फिर एक नया सूराख हो गया. आंखें भर आईं.. मैं उठकर भल्‍ल-भल्‍ल रोने लगा. चरसी के साथ-साथ आसपास इकट्ठा दूसरी पब्लिक भी मुझे हैरान होकर देखने लगी. मुझे किसी की परवाह नहीं थी, न शर्म महसूस हो रही थी. गाओपिंग के चले जाने के बाद छाती में एक बड़ा सूराख जो पैदा हो गया था, उसे किसी से छिपाने की ज़रूरत नहीं थी. क्‍यों ज़रूरत थी? सिगनल बत्‍ती पर खड़ी गांव-देहात की औरतें देख लें उनके सताने पर एक आदमी का दुख और दर्द क्‍या होता है! देखो, देख लो बदकार ग़ैरजिम्‍मेदार औरतो!..

अपने भल्‍ल-भल्‍ल के बीच पता नहीं कहां से बें-बें, ठें-ठें की आवाज़ ने ध्‍यान आकर्षित किया.. नज़र उठी तो देखा किसी के सहारे से ट्रैक्‍टर का किनारा पकड़े एक बच्‍ची गरदन उचका-उचकाकर हंस रही है! हंसने से ज़्यादा शायद मुझे मुंह बिरा रही थी.. मेरे साथ ऐसी धृष्‍टता का दुस्‍साहस करनेवाली बच्‍ची और कौन हो सकती थी! हां, वह नानान ही थी.. मैंने झट लपककर उसे खींच लिया- अरे, लोहे पर मुंह फोड़ेगी, बदमाश?..

मेरे गोद में आते ही हरामी की नौटंकी शुरू हो गई.. गाल बकोटना, नाक नोंचना.. मगर बदमाश को छाती से लगाकर आत्‍मा शीतल हो गई.. ट्रैक्‍टर के छोर से देखा गाओपिंग एक घोड़े के बाजू में साइकिल लिए मुझसे नज़रें चुराती चुप खड़ी है.. मैंने तिलमिलाकर कहा- खूब मधुबालाजी, किसी दिन तो ज़रूरे भेंटायेंगी चाची? आपकी सारी करतूत बताता हूं, उनको भी पता चले कैसी गिरहकट भतीजी पोसी हैं? अकेले आदमी को बीच सड़क छोड़कर निकल गईं.. वाह रे जनाना?..

- ट्रैक्‍टर में बैठे आराम से जा तो रहे हैं!.. आपही ने कहा था मज़े में लदके जायेंगे- सिर झुकाये-झुकाये गाओपिंग ने कहा. फाटक वाली बत्‍ती हरी हो गई थी, लोग धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे..

- उतरकर चार लप्‍पड़ दूंगा सब होश ठिकाना आ जाएगा, हां! मर्दाना से बहस करती है, बदमाश!- मैंने गुस्‍से में कांपते हुए कहा.

- नीचे उतरके फिर ट्राई क्‍यों नहीं करते? देखें कौन किसको लप्‍पड़ में जीतता है.. गाओपिंन इतमिनान से बोली और बिना मेरे जवाब का इंतज़ार किये साइकिल लेकर भीड़ में आगे चल दी.. मचलती नानान को गोद में लिये मैं उचककर ट्रैक्‍टर से उतरा और भीड़ में उस पागल औरत के पीछे भागा. - देहातन भुच्‍च मां का कोई भरोसा नहीं.. एक बार फिर छोड़कर गायब हो गई तो?- मैंने ठिलठिल करती नानान की नाक से नाक लड़ाकर कहा और दूसरी ओर निकलती भीड़ की जगर-मगर का हिस्‍सा हो गया.

(बाकी..)

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3 कमेंट:

Udan Tashtari ने कहा...

वैसे इतना पढ़कर अब लगने लगा है कि किस टाईप के हो..अहसान मानना तो खैर बहुत दूर की बात है..

कभी गाल टिका दोगे, चिकोटी काट लोगे..फिर भी बहेया वो, मेहमान की बेईज्जित खाऎ ऒ...//आप बस अच्छे बने रहो..

छोटी सी नानान को डांटते खराब नहीं लगा..??

हद है भाई...किसी का तो आभार करो..कि सब ही चिरकुट हैं और आप भर होशियार. :)

बेचारा ट्रेक्टर में लाद कर ले जा रहा है वाना पैदल ढूलकते नजर आते अनजान धरती पर...कम निकालने के लिये भर अनजान देश के बन जाते हो..पडोसी मेहमान...

वाह!! ऐसे मेहमान की जगह तो दुश्मन हमला कर देता तो ठीक!!

अभय तिवारी ने कहा...

ई होच्छे की..who is she after all?

Pratyaksha ने कहा...

तो आखिर गाओपिंग ने अजांग को डम्प कर दिया ? सही किया लेकिन ये समझ नहीं आया कि नानान को क्यों छोड दिया उसके पास ।