Friday, September 7, 2007

नशे में डूबे तार और कायतानो वेलोज़ो की नशीली आवाज़..

राइ कूडर गिटार बजाते हैं. गुरू गिटारिस्‍ट हैं. स्‍लाइड गिटार की कलाकारियों ने उन्‍हें ख़ास पहचान दी (अब कृपया मुझसे स्‍लाइड गिटार एक्‍सप्‍लेन करने को न कहिए, इसे कोई गिटार में दखल रखता हो तो वही साफ़ करे). अस्‍सी के आखिर में पहली दफा मैंने राइ का जादू विम वेंडर्स की फ़ि‍ल्‍म ‘पेरिस, टैक्‍सास’ के बैकग्राउंड स्‍कोर के बतौर सुना था.. फिर उसमें रमा बहुत दिनों तक सुनता रहा था.. राइ साहब की गिटार-बजाई की एक विशेष खूबी है कि वह तारों पर उंगलियां फेरते-फेरते अचानक कहीं कोई तार खींचकर छोड़ देते हैं.. और फिर देर तक हवा में एक अकेला स्‍वर, दूसरे स्‍वरों के बीच, अपने अकेलेपन में गूंजता रहता है!.. वेस्‍टर्न फ़ि‍ल्‍मों के अकेलेपन, उजाड़पने की एक काटती, कचोटती-सी कशिश बन जाती है.. राइ को चाहनेवाले बाज मर्तबा उन्‍हें सुनते हुए अनजाने जैसे उस अकेले तार के बजने के इंतज़ार में बंधे रहते हैं!..

बाद के वर्षों में दुनिया में घूम-घमकर अलग-अलग मुल्‍कों के संगीतकारों के संग उन्‍होंने ढेरों जुगलबंदियां रेकर्ड कीं(भारतीय सितारवादक विश्‍व मोहन भट्ट ने जो ग्रैमी अवार्ड पाया था वह राइ के साथ तैयार किये उन दोनों की संगतकारी वाले एलबम: ए मीटिंग बाइ द रिवर का ही नतीजा थी).. राइ के कॉलाबरेशंस में अली फरका तूरे के साथ तैयार एलबम ‘टॉकिंग टिम्‍बकटू’, क्‍यूबा के पारम्‍परिक संगीतकारों के साथ तैयार ‘ब्‍युने विस्‍ता सोशल क्‍लब’ काफ़ी मशहूर रहे. ‘ब्‍युने विस्‍ता सोशल क्‍लब’ पर राइ ने एक डॉक्‍यूमेंट्री भी प्रोड्यूस की (निर्देशक विम वेंडर्स थे.. फ़ि‍ल्‍म और फ़ि‍ल्‍म का संगीत दोनों को ही सांस्‍कृतिक जगत में काफ़ी स्‍नेह और सम्‍मान मिला).

नीचे मैंने जो टुकड़ा आपके सुनने को रखा है, वह राइ साहब की पहचानी हुई सिग्‍नेचर शैली का नमूना नहीं है (हाथ आई नहीं, आगे कभी आएगी तो उसे सुनवाऊंगा).. यह बाद के वर्षों की घुमाई और कॉलाबरेशंस वाले दौर से हैं. राइ के साथ संगतकार हैं मानुएल गालबान.. टुकड़े का शीर्षक है: Echale Salsita..



दूसरे का शीर्षक है: सिक्रेट लव..



अफ़्रीका का माली.. माली के तूमानी दयाबते.. पता नहीं उस निहायत छोटे से मुल्‍क माली में ऐसी क्‍या बात है.. एक से एक धुरंधर फ़नकार निकलते रहते हैं.. किसी की आवाज़ मिश्री में सराबोर है तो किसी का संगीत ऐसा कि सीधे आत्‍मा में सेंघ लगाकर उतर जाए!.. बहुत सारे नाम हैं, यहां नाम नहीं गिनाऊंगा.. इन्‍हीं बहुतों के बीच एक पहुंची हुई हस्‍ती जनाब तूमानी भी हैं.. और बहुत पहुंचे हुए हैं. जो वाद्य बजाते हैं उसका नाम है तोरा.. क्‍या और कैसा वाद्य है और तूमानी की उंगलियां उसपर कैसे चलती हैं, इसे आप नीचे के वीडियो में खुद देख लीजिए..



मेट्रोटेक ब्रुकलिन में तूमानी का तोरा..



अफ़्रीका से वापस अमरीका आइए.. चार्ली हेडेन के सपनीले तारलोक में.. नीचे जो टुकड़ा वह बजा रहे हैं उसमें पैट मेथनी की संगत है..



अहाहा, आवाज़ की मिठास हो तो रफ़ी और मेंहदी साहब वाली हो.. या फिर कायतानो वेलोज़ो की.. सुनकर लगता है जैसे सीधे शहद की बरसात हो रही है!.. नीचे जो टुकड़ा कायतानो गा रहे हैं- कुकुर्रूकु पलोमा- एक स्‍पानी पारंपरिक रचना है.. पांच वर्ज़न तो खुद मैंने सुने हैं.. यहां कायतानो की मिठास है...



अंत में यह एक जुगलबंदी है.. याओ गिलबेर्तो और कायतानो वेलोज़ो.. बोल हैं.. Acontece que eu sou baiano..



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2 comments:

  1. प्रमोदभाई को नमस्कार
    आज आपके ब्लाग पर बेहद सुरीले अनुभव से गुज़रा। राई कूडर तो अद्बुत हैं पर नए नहीं थे। पर तूमानी का तोरा ने तो कमाल कर दिया। क्या रिद्म है, क्या तसल्ली है। कलाकारी दिखाने की जल्दबाजी नहीं। बजाने का अंदाज ही इस वाद्य को कुछ रहस्यमय बनाता है। सितार, गिटार, सरोद की तरह उंगलियों को फासला तय नहीं करना पड़ रहा, सब कुछ वहीं । इसके बावजूद कम से कम डेढ़ सप्तक में आमदरफ्त होती ही रही। कैसे ? मजा़ आ गया। वोकल भी सुनने की इच्छा थी पर ट्यूब शायद जाम हो गई। अब कल सुनूंगा।
    और हां, आपका यात्रा वृत्तांत एक तरफ रखा है। यूं न समझिये कि पता नहीं। एक साथ पढ़ूंगा। प्रिंट निकालकर। धारावाहिक वाला धैर्य नहीं। तभी बताऊंगा कि शानदार था।

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  2. वाकई, नशीला है.

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