Friday, September 7, 2007

‘बाज़ार से गुज़रा हूं खरीदार नहीं हूं’ के करेक्‍शंस..

मैं बहुत शेरो-शायरी वाली मिजाज़ का नहीं.. चचा ग़ालिब तो दूर दुष्‍यंत कुमार भी कभी याद नहीं रहे.. तो ऐसा नहीं है कि ‘बाज़ार से गुज़रा हूं खरीदार नहीं हूं..’ सुनकर मुझे अचानक अक्रबर इलाहाबादी की याद आने लगी.. याद अभय और ज्ञानदत्‍तजी को आई थी.. मैं बस उनके याद आने को उधार लेकर कुछ और बातें सोचने लगा हूं.. खरीदने की कुछ अदायें भले हों, कूवत कभी ज़्यादा नहीं रही.. मगर बाज़ार से गुज़रना तो होता रहता है.. कभी-कभी या रोज़ नहीं, सोचने लग रहा हूं तो लगता है हर वक़्त बाज़ार से ही तो गुज़र रहा हूं! ज्ञानदत्‍त सही कहते हैं ‘स्‍पेस’ तो (या जो भी देखा जाना हो) अंतर्मन में होता है, जो नहीं देख पा रहे उनके लिए रेलवे लाइन के दोनों बाजू पर्याप्‍त जगह है, वह उससे आत्‍मा जुड़ायें. यह ज्ञानदत्‍तजी की समझ है, क्‍योंकि मेरे मानस-पटल में तो रेलवे लाइन के आसपास भी धकापेल और कोहराम की दुनिया ही है.. इलाहाबाद में शायद सुकूनी शांति रहती हो, मेरे शहर में नहीं रहती!.. जबकि बेजी दूसरे एक्‍स्‍ट्रीम पर जाती हैं.. कहती हैं ‘खुले मैदान में अकेले बैठे हों तो कभी इतना शोर हो जाता है कि म्यूट का स्विच ढूँढने का मन करता है.’ अब इसका क्‍या कहें? कि वास्‍तविकता बस झाईं मात्र है? और वर्चुअल के इस दौर में बाहर का दीखना महज़ हमारी रीलेटिव आंतरिक मन:स्थिति? देखने का एक सर्टेन पर्सनल एंगल?..

स्‍पेस सचमुच है? अंतमुर्खी अंतर्मन की शुद्धता मात्र से मुहैय्या हो जाएगा? किसी दूसरी परिस्थिति में श्रीश्री रविशंकरजी या किन्‍हीं अन्‍य पहुंचे हुए प्रभु की ममतामयी हस्‍त-कमलों के नीचे मैं कोई दूसरा व्‍यक्ति होकर ‘स्‍पेस है, स्‍पेस है!’ का भजन गाने लगता? ज्ञानदत्‍तजी को लोगों की असहजता दिखती है, मगर मैं समझने की कोशिश कर रहा हूं स्‍पेस के अभाव की मुश्किल उससे अलग चीज़ है? वह सबकी नींद और जागे में का बाज़ार नहीं है? जो हर वक़्त और हर कहीं इन दिनों सबके माथे चढ़ा एक ख़ास किस्‍म का राग बजाता रहता है.. जिसके नशे में बाकी का सबकुछ धुंधला व मलिन हुआ जाता है?..

अभी कुछ देर पहले किसी से बात हो रही थी.. वही सामाजिक झमेलों के किस्‍से.. मेरे उचटे मन में लगातार घूम-घूमकर यही बात आती रही कि सन् नब्‍बे के बाद के इस बदले समय में किसको किसकी चिन्‍ता है? और कितनी है?.. गरदन पर एक लात लगती है तो जैसे खोए-खोए-से नशे में ऊंघते हमारे मन में चिन्‍ता की एक महीन लकीर बनती है.. कभी-कभी हम गुस्‍से में उबलने लगते हैं.. मगर फिर जल्‍दी ही हमारी ऊंघ हमें वापस दबोच लेती है.. उस नशीली ऊंघ में हम और हमारे घर के सुख से परे और कोई भी बात मायने नहीं रखती.. कोई भी बात!.. मतलब रखती भी है तो उतना ही जितना शाहरुख ख़ान का परदे के पीछे पेप्‍सी बेचते हुए परदे पर देश के लिए चिन्‍ता करना..

2 comments:

  1. पहले लोगों को बहुत चिंतायें रहती थी...राशन की लाइन, केरोसीन का पीपा,ओवरटाइम...स्कूल की किताब भी सोचकर खरीदो...हाँ अब भी कई लोग हैं जो यह सब चिंतायें पाल रहे हैं। पर मैं इन सब चिंताओं से आज़ाद हूँ। न मुझे उधार लेने की जरूरत है न उधार देने का शौक।
    अजीब सी जिम्मेदारी है..अपना जीवन अर्थपूर्ण जियो। भई कैसे। कभी कभी लगता है कुछ मुसीबतें होती जो दिमाग को सुन्न कर सके तो अच्छा था। इस जिम्मेदारी से तो छूटती।
    मुझे ऐसा क्यों लगता है आप भी इससे पीछा छुड़ाने के बहाने तलाश रहे हैं?

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  2. एक नशीली ऊँघ.. ह्म्म..

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