Wednesday, September 12, 2007

क्‍या करूं कहां जाऊं?..

मन उद्वि‍ग्‍न हो गया है. आदमी किस पर भरोसा करे? इतनों पर किया.. देखता रहा भरोसा ज़मीन पर कितने गहरे और गंदा लोट सकता है.. जिन पर किया वो किसी शर्म में नहीं लोटते, महज खुद में लहालोट रहते हैं? अविनाश का ही उदाहरण ले लीजिए. ‘क्‍या पत्‍नी, क्‍या घर, क्‍या करियर, जी? सब फालतू है, महाराज!’ वाली अदायें लिये रहता है, और देखिए, जवान सारे मोर्चों पर चकाचक सेट है! सिगरेट मैं छोड़ना चाहता था, सुअर की तरह खों-खों करके दोहरा मैं हो रहा था, और छोड़ दी अभय आनन्‍द ने! छोड़ी ही नहीं, मेरे सिगरेटों को अपने यहां छोड़वाने का कौशल भी अर्जित कर लिया. और अब उसे अपने प्रताप-गान की तरह गाकर ताली भी बजवाना चाहते हैं? अभय से भरोसा उठ गया है. यशलिप्‍सा में आदमी कितना नीचे गिर जाता है. अविनाश का उदाहरण मैंने पहले दिया ही. खुद पीते रहकर अभय मियां मेरी सिगरेट छुड़वाने का लोकोपचार नहीं कर सकते थे? वह वस्‍तुत: असल मित्रोपचार होता. मानवीय होता. मगर अभय की तो मुझसे पुरानी ईर्ष्‍या है! अब भई, लड़कियां आप पर नहीं गिरतीं, मुझ पर गिरती हैं तो इसके लिए मैं दोषी थोड़े हूं? निमग्‍न होइए निर्मल-ब्रह्माचार में.. आपही ने तय किया आनन्‍दमग्‍न होंगे.. तो दाय भरिये उसका! हमें दोष न दीजिए.. ओह, प्‍लीज़?

तो मैं भरोसे के उठने की कह रहा था. तो फिर करूं क्‍या? यशलिप्‍सा की चाहना तो है मुझमें. बहुत ज़्यादा है. पैसों की भी है. और बहुत ज़्यादा पैसों की है. हिंदी के रेगुलर लिखवैया तीस ब्‍लॉगरों पर एकक्षत्र शासन की भी है. इसका अंतत: इलाज क्‍या है? शहर छोड़ दूं? अरुण पंगेबाज के आश्रम चले जाऊं? या कोई और वाजिब, कंफ़र्टेबल डेस्टिनेशन आपके ध्‍यान में है? कृपया मेरी मदद करें, मित्र! आप पर भरोसा कर सकता हूं या नहीं? कैन आई?..

14 comments:

  1. पोस्ट शुरु ही गलत तरीके से हुई।

    मन उद्वि‍ग्‍न हो गया है.

    आपका अब हुआ है....हम तो पैदा हुए तब से ऐसा ही है।

    शहर छोड़ दूं?
    फिर चीन जायेंगे...बेटी को तक तो ला ना सके...

    आप पर भरोसा कर सकता हूं या नहीं? कैन आई?..
    You cannot!! How could you ask such a question??

    क्या करूं कहां जाऊँ....इतना जटिल मुद्दा और ऐसी बेकार पोस्ट...

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  2. ओह, बेजी, इवन यू!

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  3. हमने सिगरेट को आदेश दे दिया है..वो आप तक पहुँचने के लिए यहाँ से रवाना हो गई है.. दो चार रोज़ में पहुँच जाएगी..जलने का देता तो दो चार घंटे में ही पहुँच जाती आकाश मार्ग से धुआँ बनकर.. मगर आप के लिए बेकार हो जाती..
    सबर रखिए.. भरोसा रखिए..!

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  4. तस्वीर में तो सही जगह पहुँचे हुये लग रहे हैं ।

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  5. ओ मेरे पोस्ट-मॉडर्न कबीर,

    काहे इतना दुखी च उद्विग्न रहता है . देखता नहीं गम गलत करने का कितना सारा साधन उपलब्ध हैं . शायरी नहीं पढने को आता तुमकूं . शायर बोलता है;बोलता क्या है,बोलता ही रहता है :

    "अपना गम लेके कहीं और न जाया जाए
    घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाए।"


    बहुत हुआ . अब नया बानक धारो यार!
    काहे दुखी को और दुखी करते हो . मुंबई में हो, कुछ दिन के लिए मस्त मुंबइया फ़िल्म हो जाओ . सब कुछ के बाद हंसी-खुशी की भेलपुरी .

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  6. अजी हम पर तो भूल कर ना करिये भरोसा, हम खुद नहीं रहते अपने भरोसे।

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  7. संजय बेंगाणीSeptember 12, 2007 at 6:10 PM

    आप भरोसे लायक है ही नहीं, सिगरेट जैसी फालतू चीज के लिए मित्र से विश्वास उठ गया!

    जाईये हमे आप पर भरोसा नहीं. हम पर भरोसा ना करें.

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  8. मैं अगर कह भी दूँ कि मुझ पर भरोसा कर लो, तो भी आप मानोगे तो है नहीं. सोचोगे कि मैं कहीं Guantanamo Bay का पता न दे दूँ सबसे सिक्यूर्ड डिटेन्शन के लिये.

    ये लैपटॉप लिये कहाँ फोटू खिंचवा रहे थे आप? बताईये बताईये!!

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  9. दोस्त होते हैं क्या। अगर होते हैं तो सिंगरेट की तरह होते होंगे जिन्हें छोड़ना मुश्किल होता होगा। लगता है तमाम दोस्तों की याद आ रही है। बात इतनी है तो ईमानदारी से कही जानी चाहिए कि तुम सब याद आ रहे

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  10. भाई, भड़ास (http://www.bhadas.blogspot.com)ज्वाइन कर लीजिए। टेंशन तब होती है जब मन में कोई इच्छा होती है। मन में इच्छा न पालो। जो मन करे, खुल कर करो। बस, संकट खत्म। मरन तो तब भी है जब सिगरेट छोड़े दोगे, जब खूब नोट कमा लोगे.....फिर? ऐसे में जो इच्छा हो करो। मस्त रहो। टेंशन फ्री..बिलकुल बिंदास। टेंशन लेने का नहीं, और देने का भी नहीं। जो है सो है......है न बढ़िया मंत्र। लेकिन बंबइया बाबू लोगों को समझ में नहीं आएगी। जड़ें इतनी उखड़ चुकी हैं कि अब क्लोनिंग भी नहीं हो सकती.....मैं तो बस यही कह सकता हूं...अपना बेच्च्चाचाचारारारारा प्रमोद भइययययययायायाया....या खुदा, अगली बार भाई को गांव से बाहर न निकलने देना...कम से कम खापीकर टाइट होकर सोता तो.....जय हिंद

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  11. चुपचाप सारा माल पानी बांध कर यहा चले आईये ..आश्रम का खास कमरा साफ़ करा दिया है ,खास आपके लिये..वैसे तो आपको पहले ही आ जाना चाहिये था..पता नही कितना माल उडा दिया चीनी कितने है कम या ज्यादा देखने मे..? पर अभी भी कोई देर नही हुई है..हमे आपका इंतजार है..और हा चिंता ना करे यहा हम सारा पैसा इसी खास कमरे मे रखते है..बाबा फ़रीदी

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  13. ई अब बेसी त्रिंग-बिड्रिंग मत कीजिये... येने-ओने कहां बउआ रहे हैं जी? चलिये चुपचाप मुम्बई लौटिये तो पहिले...

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