Friday, September 21, 2007

महानगर में साइकिल..

कहीं आंतरिक कोई मैनुफैक्‍चरिंग डे‍फिशियेंसी होगी.. या यथार्थ की निर्ममता से मुंह फेरे रहने का भोला पलायनवाद.. कि मन की उड़ानों का भौतिक बिंब रूपांतरण खुद को अब भी निर्दोष तरीके से साइकिलचारी की शक्‍ल में देखता चलता है.. जबकि शहरों के बदले-लगातार नाटकीय तेजी में बदलते- जटिल कॉरपोरेट-विधान में साइकिल की सुस्‍त चाल को जगह कहां है.. उस किसी भी जीवनशैली की कहां और कितनी जगह है जो तत्‍काल और तेजी से पैसे न जेनरेट कर रही हो?.. एक पैर पैडल पर जमाये दूसरी ज़मीन पर टिकाये आसपास के संसार को जिज्ञासु नज़रों से देखने का मौका निकाले, इसका अब अवकाश ही कहां है.. उस जीवन-दृष्टि के पास तो नहीं ही है जिसने पिछले दस वर्षों में अपने को ही नहीं, देश को भी एक नई पहचान दी है.. अपने ‘वर्किंग आवर्स’ और ‘फ़न’ का एक रिगरस अनुशासन खड़ा कर लिया है..

ऐसा नहीं है कि अनुशासन-पर्व में अपना यज्ञ चला रहे इन जांबाज़ सिपाहियों से बाहर संसार नहीं, या उस संसार में साइकिलें नहीं.. हैं.. महानगरों से बाहर के बेतरतीब, ‘अनक्‍लेम्‍ड’ संसार में अभी भी बहुतेरी होंगी.. मगर वह चकमक-जगमग विकास-यात्रा की चहेती, पसंदीदा सवारी नहीं.. छूटे, पिछड़े, उजबक समय की प्रेत-छायायें हैं जिनका आंखों के आगे से गुजर जाने पर एकनॉलेज न करना ही बेहतर!

विकासी बरगद की घनेरी छांह से बाहर का जो भी अप्रीतिकर रूप है उसे भूले व भुलाये रहना ही अच्‍छा.. क्‍या करना हमें उस समूचे असभ्‍यलोक का जहां दिल, दिमाग और जेब सब तरफ बस गड्ढे ही गड्ढे.. निजीकरण व वैश्‍वीकरण के रंगोत्‍सव में इन फटों में क्‍या फंसना.. कौन इनका जिम्‍मा ले? और क्‍यों ले?..

दिल्‍ली की दीवाली के पीछे हम पीछे छुटी हुई दुनिया के किन-किन प्रतीकों की होली जलायेंगे.. वह लिस्‍ट कितनी बड़ी होगी जिसे बिना एकनॉलेज किये आंखें मूंदे हम आगे देखते रहेंगे (या कन्‍फ्रंट करने की मजबूरी हुई ही तो कुहनिया-धकेलकर फर्र से आगे बढ़ जाना चाहेंगे).. यह किस तरह का, कैसा भविष्‍य होगा.. साइकिल और मेरी इस भ‍विष्‍य में जगह नहीं होगी यह मैं ढंग से समझ रहा हूं.. पता नहीं आपकी कितनी जगह होगी यह आप कितना समझ रहे हैं..

2 comments:

  1. विकास के एक दौर के बाद साइकिलें भी लौटकर आती हैं जैसा विकसित देशों के साथ ही चीन में भी देखा जा सकता है। जैसे अभी ही भारत में जमीन से पानी निकालने के लिए रहट और दो-गला की वापसी जो रही है जिसमें दो लोग किनारे कड़े होकर टोकरी जैसी चीज से पानी उलीचते हैं। इसी तरह ऑरगेनिक खाद की भी वापसी हो रही है।

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  2. जिन राइट बंधुओं ने साइकिल का आधुनिक ढांचा बनाया, उन्होंने ही बाद में दुनिया का पहला हवाई जहाज भी बनाया था। अब से दो साल पहले इन्सानी उड़ान की जन्मशती पर लिखे एक लेख में मैंने टेक्नोलॉजी के स्वप्नदर्शियों से अपील की थी कि राइट बंधुओं को सच्ची श्रद्धांजलि देने के लिए वे हाथ-पैरों के अलावा न्यूनतम बाहरी इनर्जी इनटेक वाली एक-डेढ़ लाख रुपये तक की हवाई साइकिल बनाकर दिखाएं। यानी नियंत्रित एयर-फ्लो वाला एक ऐसा हाइब्रिड ग्लाइडर, जिसपर सवार दो लोग इसे अपने मकान की छत से उड़ा सकें और जिसे मध्यम-तेज हवा में भी पर्याप्त सुरक्षा के साथ निर्देशित किया जा सके। क्या इस चुनौती को ब्लॉग के जरिए ज्यादा बड़े पैमाने पर पेश किया जा सकता है?

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