Saturday, September 22, 2007

अजनबी शहर में..

सुबह पानी के नल के नीचे बाल्‍टी के भरने की राह तकते दिमाग में दूसरी ढेरों टोंटियां खुल जाती हैं.. अलबत्‍ता नल के फ़ंक्‍शन और दिशा की तरह उनमें व्‍यवस्‍था नहीं होती.. जलती कड़ाही में छौंक-सी वह नाटकीय झांस में आती हैं.. ड्रामा को स्थिर व सपरकर जमने में समय लगता है.. छिटके-छिनकते विचार कोई वाजिब तरकारी बनायेंगे.. या ड्रामा महज सजीली पाककला की अदा बनके रह जाएगी, इसका ठीक अंदाज़ भी कुछ बाद में जाकर ही होता है.. बहुत बार लगता ही है कि हम छनौटा, कलछुल घुमाते रहे; अच्‍छी मात्रा में धुआं और कालिख फैलाया, कायदे का पकाया कुछ नहीं.. फिर कहीं किसी कोने से, कभी दबी कभी मुखर भी, आवाज़ आती है कि जाने क्‍या लिखते हैं ससुर, कुछ साफै नहीं होता!.. ढेरो मर्तबा दूसरों की नहीं, खुद मेरी भी- खुद को ठीक से समझ न आने की- शिकायत रहती है.. अब ये है, क्‍या किया जाये.. ब्‍लॉग का एक पहलू यह भी है.. कि सब प्रोसेस्‍ड नहीं रहता.. बहुत सारी चीज़े बीच प्रक्रिया में रहती हैं.. कुछ एक पोस्‍ट से निकलकर सीधे कचड़े में भी जाती हैं.. आपके धीरज व सहभागिता में मुस्‍कराते हुए एक धन्‍यवाद का इशारा करने से ज़्यादा क्‍या कर सकता हूं?..

क्‍योंकि मामला तो कुछ ऐसा है कि दिन के शुरू होते ही दिमाग की मशीन दस या जाने कितनी, किन-किन दिशाओं में भागना चालू हो जाती है.. समय, शब्‍द, साहित्‍य, शहर, सिविक सेंस, सिविलाइज़ेशन, विकास, लोग, गरीबी, जीवन, मूल्‍य.. और कला.. सबकी अलग-अलग स्‍तरों की थरथराहटों का एक अनगढ़ भूगोल बुना जाने लगता है.. और मैं भागने लगता हूं.. उनके साथ, उनके पीछे.. कभी एक संभली, समझदार चाल में तो कभी बस एक बदहवास लपक में..

जगहें पहचानी न हों तो चिंतायें भी कुछ उखड़ी, ऐंडे-बेंडे रूपाकारों में उलझती हैं.. उनका क्‍या किया जा सकता है.. परायी जगहों में अंतरंग विचार भी जैसे ज़रा दूरी बनाकर पराये-पराये से चलते हैं.. छिटककर बार-बार दूर होती हैं, मैं बार-बार करीब लाने की कोशिश करता हूं.. मगर दोस्‍ताना हवाओं से भरे लेकिन एक स्‍तर पर खुद के लिए निहायत पराये शहर में जैसे देह के नीचे साफ़-धुली चादर, पैरों के आसपास थोड़ी खुली जगह और सोचने को ज़रा सुकूनदेह एकांत- सोचता हूं दिन की शुरुआत के लिए इतनी-सी मांग क्‍या ज़्यादा है.. और फिर जल्‍दी तेजी से समझने लगता हूं कि कितनी असंभव सी लालसा है.. तो फिर बेचारे विचारों से कमिटमेंट की क्‍या और क्‍यों भोली आशायें?.. कभी लय और गहराई में साथ रहें तो अच्‍छा.. न रहें तो इकतरफा प्‍यार की तरह हम मन की मरोड़ लिये उन्‍हें ख़ामोश-ख़ामोश तकते रहेंगे.. और क्‍या कर सकते हैं..

2 comments:

  1. परायी जगहों में अंतरंग विचार भी जैसे ज़रा दूरी बनाकर पराये-पराये से चलते हैं...
    अच्छा मंथन और आत्मनिरीक्षण हैं। यह तो सच है कि ब्लॉग में सब कुछ प्रोसेस्ड नहीं होता।

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  2. sensitivity verses specificity....

    नल खोलो और छींटे सूखे पर लिखे लेख पर गिरे तो शायद...

    sensitivity, specificity पर हावी हो रही है...इसमें गलत और सही का तो पता नहीं...पर जब लेखन में दोनो sensitivity और specificity हो तभी शायद उम्दा हो पाता है।

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