राजधानी में अज्ञानीजन नौकरियां करते सुखी है. बेकाम, व कोमलांगी कामातुर कंधे के अभाव में महापुरुष दुखी है. अज्ञानी स्‍कूटर से उतरकर कार पर चढ़ रहे हैं. या कार से उतरकर कार में ही चढ़ रहे हैं.. महापुरुष के अनफ़ैशनेबल धज से नज़रें बचाते सवाल करते हैं- बस-यात्रा अच्‍छी तो हुई होगी? आप अच्‍छे से तो रहते रहे होंगे! ओह, अज्ञानीजन.. ठिठोली करते हंसते हुए बंगाली मार्केट जा रहे हैं. गाल बजाते कह रहे हैं हमने ये किया वो किया, उसको करने में इतनी मुश्किल थी; आप क्‍या जानो, उसको करना घंटा कितना असंभव था! भीड़ में अकेला महापुरुष सन्‍न है. इतने आत्‍ममुग्‍ध, आत्‍मकेंद्रित सहचरों(?) की संगत का सफ़र कैसा होगा.. कितनी दूर तक का होगा? तप व्‍यर्थ जाएगा? तपोवन का सपना?.. वह भी? व्‍यर्थ?.. ओह, मन कैसा क्‍लांत और सदाहारा है. जबकि बंगाली मार्केट अपनी जगह ही प्रकट हुआ है. बंगाली मिठाइयां भी. अलबत्‍ता बंगाली लड़कियां नहीं हैं. कामातुर क्‍या कोमलांगी भी नहीं. बंगालीपने से लदबद बस बातें हैं. निरुदे्श्‍य, दिशाहारा जिरहें. आंखें मूंदे महापुरुष गाल में उंगलियां धंसाये चिंतन करता है राजधानी महज माया है, कदम-कदम पर फ़रेबी साया है..

महापुरुष को प्रभावित करने के लिए अज्ञानीजन भाग-भागकर किताब की दुकान की ओर लपक रहे हैं. एक, दो.. और तीन तक की संख्‍या में किताबें खरीद रहे हैं. और फिर यह सोचकर घबराते हुए कि भला इसे पढ़ना कैसे संभव होगा, अकबकाकर, वहीं दुकान में, खरीदी किताब महापुरुष के जिम्‍मे कर बौद्धिकता से उऋण हो ले रहे हैं. बौद्धिक अभिजात्‍य के इस सहज तिरस्‍कार से महापुरुष की आंखें तरल हुई जाती हैं.. हृदय नहीं.. वह शनै: शनै: कठोर हुआ चलता है.

अज्ञानीजनों के जीवन में कहीं सौंदर्य की उपस्थिति नहीं. न सौंदर्य है न उसका कोई सहज, सरल बोध. पोलि‍थीन में तहाकर रखी दवाईयां, गंदे मोजे और हेल्‍मेट को जीवन में स्‍थान व आदर है, सौंदर्य को नहीं. किताबों को तो नहीं है ही. मगर अज्ञानीजन सुखी हैं. महापुरुष नहीं है. अकेला है. ओह, कितना..

 
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Gyandutt Pandey - September 27, 2007 7:08 AM

स्प्लिट पर्सनालिटी के मामले बहुत हैं एक ही व्यक्ति में महापुरुष भी हैं और अज्ञानी जन भी! बहुत देखे है ऐसे महा-अज्ञानी जन!

अनिल रघुराज - September 27, 2007 7:56 AM

राजधानी महज माया है, कदम-कदम पर फ़रेबी साया है...
महापुरुष का चिंतन सही जा रहा है।

Beji - September 27, 2007 10:24 AM

महापुरुष ज्ञानियों के बीच हो या अज्ञानियों के बीच अकेला ही होता है।

हाँ पर खुश होने और रहने का ताल्लुक ज्ञान से है मैं नहीं मानती। (यकीन नहीं हो तो मुझे ही देख लें :)))

notepad - September 28, 2007 11:32 AM

बेजी , आपने बिल्कुल सही कहा ।खुशी का ग्यान से तल्लुक नही इसलिए महापुरुष उदास है । दर असल ग्यान का ताल्लुक तो दुख असे ह्यै। जो जितना जानता है उतना ही दुखी है । जो बेखबर है वही सुखी है । कबीर याद आते हैं
सुखिया सब सन्सार है खावे अरु सोवे
दुखिया दास कबीर है जागे अरु रोवे ।
सुख तो भ्रम है शाश्वत है दुख और करुणा ।अग्यान बहुत है । जिसे समझ आ जाये वोह फ़िर कभी चैन से नही सो सकता ।

प्रियंकर - September 28, 2007 5:09 PM

अरे! पतनशील साहित्य के अड्डे पर महापुरुष जी ने धूनी रमा ली और ज्ञान का सदावर्त चालू है . जो आ रहा है सो ज्ञान की गठरी खोल रहा है .

लगे हाथों यह भी गा लिया जाए : 'तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफ़िर जाग जरा '.

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