Friday, September 28, 2007

फ़ुरसत में सावन का अंधा मैं..

बैठे, उठंगे, लेटे, ज़रा सा इधर-उधर टहलते दिल्‍ली में लगभग दो हफ्ते निकल गए.. चार दिन कंजंक्टिवाईटिस की आंख की छूत के नाम छोड़ भी दें तब भी कुल दस दिन का हिसाब निकलता है. लेकिन महसूस यही हो रहा है जैसे शहर में कल ही दाखिल हुए हों. पैरों में हवाई चप्‍पल है मगर सब तरफ हरा-हरा ही दीख रहा है. ऐसी अनोखी चीज़ हो क्‍यों रही है? ऐसा तो है नहीं कि राजधानी में सब हरा-हरा ही हो. हारी हुई दुनिया का अच्‍छा-खासा भूगोल होगा. होगा क्‍या है ही. लेकिन अपने को अभी ठीक-ठीक नज़र आना शुरू नहीं हुआ हैं. अपन फ़ि‍लहाल बाहरगांव से आए 'मेहमान' वाली मेहमाननवाज़ि‍यों में इतरा रहे हैं. वह ख़ुमार उतरेगा तो दुनिया फिर ज्‍़यादा ढंग से नज़र आएगी. अभी तो नक़्शा ही नहीं है. उत्‍तर-दक्खिन का ठीक-ठीक बोध भी नहीं है. खुली-चौड़ी सड़कों का व्‍य‍वस्थित इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर दिख रहा है और हरियाली दिख रही है. खूब सारे पेड़ दिख रहे हैं और फिर यह दिख रहा है कि हम पांच पेड़ों से ज़्यादा न पेड़ों की पहचान रखते हैं, न ही उनका नाम हमें मालूम है. मन अंदर ही अंदर लगातार मुंबई को गालियां देता रहता है, कि आधुनिकता के हो-हल्‍ले के बावजूद इस तरह का इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर वहां क्‍यों नहीं है, वहां बड़े ट्रैफिक जंक्‍शन पर गाड़ि‍यों के बीच फंसे ऐसी अनुभूति क्‍यों होती है मानो किसी देहाती जगर-मगर में फंस गए?..

दिल्‍ली को लेकर मैं ज़्यादा लड़ि‍या रहा हूं? ठीक है, घबराइए नहीं, जल्‍दी पटरी पर आ जाऊंगा. थोड़ा वक़्त आंखों को, आत्‍मा को हरियाली पी लेने दीजिए. साऊथ दिल्‍ली से जल्‍दी ही बाहर निकलकर कड़वाहट का विषपान करना ही होगा. अविनाश के घर पहुंचना तो क्‍या मैथिलीजी के ब्‍लॉगवाणी के दफ़्तर की गली भी कोई रोमानी दुनिया नहीं है. जेएनयू की बाहरी हरियाली और बनावट के निखरेपन के ज़रा भीतर तेल, शैंपू, सिगरेट खरीदने अगर केतकी शॉपिंग सेंटर की ओर जायें तो चायनीज़ खाने के ढाबे और बाजू में बासी सब्जियों की बसावट जैसे तत्‍काल मन उदास कर देती है, कुछ वैसा ही हाल मैथिलीजी के दफ़्तर के बाहर की गली का भी है. कचर-मचर के मात्रात्‍मक फर्कों वाली ऐसी ही गलियां तो हमारी राष्‍ट्रीय पहचान हैं (राष्‍ट्रीय न सही, उत्‍तर भारतीय तो हैं ही), फिर भला दिल्‍ली उनसे कहां, कैसे अछूता रहेगा. फर्क मेरी मस्‍ती की है. चढ़ी हुई है जो सपरकर कुछ वक़्त की आवारागर्दी कर रहा हूं, जल्‍दी उतर जाएगी, फिर दिल्‍ली का नक़्शा भी हरा-हरा नहीं, लाल ही दीखेगा. आप, बंधुवर, मुझे दिव्‍यदृष्टि मिले, इस दिशा में कोई मदद कर नहीं रहे हैं?..

6 comments:

  1. बीयर की कुछ घूंट लगाकर गला तर कीजिए. किसी पुराने कॉमरेड को पकड़िये और पूर्वी दिल्ली की किसी बस्ती की तरफ निकल जाइए. आपको दिल्ली का सड़ा-सड़ा भी नज़र आ जाएगा.

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  2. लगता है आप दिल्ली को एक टूरिस्ट की तरह ही देख रहे हैं.थोड़ा हम जैसे आम आदमी की तरह भी देखिये.हो सके तो पुरानी दिल्ली घूम आइये.

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  3. बम्बई में पटखनी खाये पड़े थे; वहां से वाया चीन तम्बू दिल्ली गाड़ लिया क्या?
    अगला "ब्लॉग-ब्लड" कब छप रहा है!

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  4. बुरा क्या है । हरा हरा ही देखिये । लाल पीली तो हैं ही , जब तक टलता है टालिये , हरा हरा देखिये ।

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  5. कहते है सुन्दरता देखने वाली की आँखों में होती है.

    आपको हरा हरा दिख रहा है और मुझे चिन्ता खाये जा रही है आपकी तबियत को लेकर. कहीं कन्जेक्टीवाटिस के बाद.....हरिया!!! अरे नहीं!! ईश्वर न करे.

    हाँ, एक बार सावन के महिने में हमारे गाँव में यही फैला था. कईयों की आँख जाती रही इसमें. फिर उनको हमेशा हरा हरा दिखता रहा. इसी से इस नेत्रमहामारी का नाम हरिया पड़ा. (शब्द-यात्रा टाईप ज्ञान)


    पुन्श्चः: यह एक काल्पनिक कथा है. आप तो वही देखेंगे जो दिखेगा. एक तो आप महाज्ञानी हैं और महापुरुष तो हैं ही!! अपने खुद ही न घोषित किया है.

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  6. दिल्ली ने अपने दिल में क्या क्या छिपा रखा है ये तो यहाँ आकर ही जान सकता है कोई। यहाँ पर सबके लिये सब कुछ है सिवाय एक चीज के। मेरे एक दक्षिण भारतीय मित्र पहली बार दिल्ली आये थे तो उनका पहला ओब्ज़र्वेशन यही था कि क्या सारे दिल्लीवाले सुबह उठ कर छोला भटूरा ही खाते हैं? हर दुकान हर नुक्कड़ पर एक ही चीज मिलती है सुबह।
    दिल्ली को हरा और लाल तो देख लिया आपने। कभी पीला(विशुद्ध तेलीय व्यंजन) भी देखने का दिल करे तो सबसे पहले चाँदनी चौक जरूर जाइयेगा।

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