Sunday, September 30, 2007

जीवन की फ्रीलांसिंग के खतरे..

दक्षिणी दिल्‍ली की हरियाली देखकर मेरे हरियाये रहने पर न केवल पूर्वी दिल्‍ली के काकेश को एतराज़ था, कनैडियन छांह में वजन चढ़ा रहे समीर भइय्या भी चौकन्‍ना हो रहे थे. उन्‍हें दोष नहीं दे रहा. चौकन्‍ना तो स्‍वयं मैं भी हो रहा था. ऐन हरियाहट से सुखी होने के क्षणों में. सुख में दुख और दुख में सुख के इस विरोधीभाव से तो अपनी पुरानी यारी है. ख़ून का हिस्‍सा है्. सो उससे मुक्‍त कहां से होते, होंगे? हरियाली की टहलाहटों के बाद चौकन्‍ना होना स्‍वाभाविक है. तो हरियालियों से निकलकर कुछ मॉल के वेताल से गुजरकर मन में दूसरे भाव बन रहे हैं. सारंगी की एक नई धुन बन रही है. तो वह भी जरा सुन लीजिए. नौकरी से खलियाये आरामी संडे की ऐसी की तैसी करवाइए. थोड़ा फेंस के उस पार जाकर सोचिए, सोचवाने में मैं मदद करूंगा. कल पहलू में चंद्रभूषण ने ‘एक प्रस्‍ताव’ लिखा था, इस सोचवाहट में उसकी भी भूमिका है.. सो हमारी बात सुनकर मन खिन्‍ना जाये, आप जूता-चप्‍पल फेंकना चाहें, तो कृपया थोड़ा चंदू की दिशा में भी फेंकें.. अजनबी शहर में मैं अकेला हूं, लोगों के लात-जूते भी लगेंगे, मगर कुछ वक्‍त तो शांति से गुजर जाने दीजिए. आइए, चलिए, असल बात पर चलते हैं. उदासियों में..

पहले जीवन में इतना पैसा नहीं था. खरीदने को इतनी चीज़ें भी नहीं थीं. आवारागर्दी को स्‍पेस था. मुझसे ज्‍यादा प्रतिभावान लोग आवारा हो सकते थे. अब सबने नौकरी पकड़ ली है. ज्‍यादा लोग ज्‍यादा कमा रहे हैं. जो नहीं कमा रहे हैं उसकी कोशिश कर रहे हैं. घर और अपने ऊपर पैसा खरचने के तकाजे बढ़ गए हैं. जो नहीं खरच पा रहे वो घबरा रहे हैं, टेंस हो रहे हैं. आवारागर्दी एज़ अ वैल्‍यू घुस गई है, हास्‍यास्‍पद हो गई है. मैं, जिसने जीवन के डेढ़ साल से ज़्यादा कभी नौकरी नहीं की, लगातार हास्‍यास्‍पद होता रहता हूं. उंगलियों पर गिने जाने लायक जो मित्र-सित्र टाइप चंद हितैषी हैं, हतप्रभ होते रहते हैं- कि बिना नौकरी चलता कैसे है? सुबह उठकर कहीं काम पर जाते नहीं, फिर दिनभर करते क्‍या हैं? जवाब देना मुझे अटपटा नहीं लगता, गाली देने की तबियत होती है, क्‍योंकि यह कुछ उसी तरह का सवाल है कि किसी कलाकार-लिखनेवाले से पूछा जाये कि लेखन-फेखन तो ठीक, मगर, गुरु, काम क्‍या करते हो?..

गुस्‍सा ज़ाहिर करना तो मेरी झुंझलाहट हुई.. उससे अलग क्‍या जवाब दिया जाये? कि फुरसत में फ्रीलांसिंग करता हूं? ऐसे ही आड़े-तिरछे पैंतरों से गुजारा चलता है? मगर फिर पूछनेवाले यह भी पूछने लगते हैं कि गुजारा चल जाता है? दिन में हजार रुपये टाइप एक लेख भी लिखे तो सारे महीने भागदौड़, जी-तोड़ लिखाई के बाद कमाई हुई कितनी.. कुल तीस हजार.. इत्‍ते में महानगर में गुजर हो जाती है? सवाल दस बार सुनकर मैं भी सोचने लगता हूं कहां से हो जाएगी? नहीं ही हो सकेगी. आदमी भाग-भागकर इस तरह हजार रुपये वाले काम जुगाड़ता रहा भी, हाड़तोड़ू परिश्रम से महीने-महीने भर मशीन बना विचार उगलता रहा भी तो इस तरह की गदहगिरी कितनी देर, कितनी दूर तक खिंचेगा? ज्‍यादा से ज्‍यादा चार महीने? उसके बाद फ्रीलांसिंग नहीं करेगा, अस्‍पताल में लॉंच होगा. और ऐसा नहीं है कि जीवन के खर्चे कम होंगे, या आदमी महानगरीय भागमभाग हवाई चप्‍पल में डील करेगा. क्‍यों करेगा? हास्‍यास्‍पद लगेगा!

फिर? समाधान क्‍या है? स्‍वतंत्रचेता, स्‍वतंत्र‍जीवियों की कोई जगह नहीं, जैसे बड़े शहरों में मॉल व मैकडॉनल्‍ड मानिया का अब विकल्‍प नहीं? कहीं नौकरी पकड़कर रोज़ एक पागलपने में भागते रहना और नशे में रमे रहना ही समाधान है? यह सच्‍चाई तो है ही कि फ्रीलांसिंग की ये तीस हजारी अदायें पोली हैं, सब सुधीश पचौरी होकर विचार उगलने की दनदन मशीन नहीं हो सकते. मैं तो नहीं ही हो सकता. बहुत बार सिर्फ दनदन ही होगा, विचार दो कौड़ी न होगी. गलत बोल रहा हूं? आप भी कुछ बोलिये.

3 comments:

  1. खतरे तो है. कल रात एक कवि सम्मेलन से लौटते हुए मैने एक पुराने कवि से पूछ लिया कि लिफ़ाफ़े मे कितने है. तो नाराज हो गये.बोले व्यक्तिगत सवाल क्यो पूछ रहे हो.मैने कहा ये तो व्यावसायिक सवाल है. मै जानना चाहता हूं कि पैतीस साल घिसने के बाद कितना मिलता है. दरसल लिफ़ाफ़े मे ज्यादा रकम नही थी इसलिए वे नाराज हो गये थे.

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  2. एक आदमी जो नौकरी करता हो, अच्छा कमा लेता हो...सुबह उठकर शेव करवे,सूट बूट में दफ्तर पहुँच जाता हो...फिर काम,पैसे और काम....शाम को अपनी ही लाश ढो कर घर लाकर....रात को घबरा कर कि कहीं खुद से सामना न हो जाये आँख मूँद लेता हो....

    एक और आदमी,मज़दूर...सुबह उठ कर मुँह धोकर, बाँसी रोटी खाता हो...बीवी नीम के दाँतून से दाँत साफ करती हुई,बेटा नंगा पर हँसता हुआ पास बाँधी झोली से हँसता हुआ....

    खुश और तृप्त इन दोनो में कौन है जानने के लिये दिमाग दौड़ाने की जरूरत नहीं।

    यही दो आदमी एक दूसरे की मानसिक स्थिति में भी हो सकते हैं....

    पैसा , ज्ञान और विचार कोई भी खुश रहने का गुरुमंत्र नहीं हो सकता। इन सभी के पूर्ण अभाव में भी इंसान खुश रह सकता है....

    फिर...

    नारियल के पेड़ की खुशी नदि किनारे नारियल के पेड़ बनने में है....बबूल की खुशी काँटों के साथ बंजर भूमि में खड़े रहने में....

    जो हैं....वह बन कर रह सके तो इससे ज्यादा खुशी और क्या...उससे ज्यादा सहज भी क्या...और उसमें खतरा भी क्या....

    गुरुजी अंतर्दृष्टि बहुत हुई...अब कुछ ज्ञान बाँटिये....मैं इंतज़ार कर रही हूँ...।

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  3. अब हम क्या बतायें. बेजी तो पूरा प्रवचन कर ही गई हैं.

    हम तो जीवन में दोनों दौर से गुजरे हैं. कभी अपनी खुद की प्रेक्टिस करते थे सीए की-फ्री लाँसिंग और फिर नौकरी..आजकल पुनः फ्री लॉसिंगनुमा नौकरी....हर एक के अपने अपने आयाम है.

    सब रास्ते हैं मात्र-हर रास्तों पर चलना अपने ही तरीके से होगा-चाहो तो गुनगुना लो या रो लो. रास्तों को उनसे कोई फर्क नहीं पड़ता.

    मंजिल वही मिलेगी जिसके लिये आप परिश्रम कर रहे हैं.

    अब दौड़ना शुरु करिये..!!!!! :)

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