Friday, September 7, 2007

खड़ा आदमी कितने खुले में खड़ा है?..

पता नहीं आपने हिंदी फ़ि‍ल्‍में देखते हुए लोग जिस तरह मकानों के भीतर रहते हैं उस पर कभी गौर किया है या नहीं.. हीरो ईमानदार सब-इंस्‍पेक्‍टर हो या शहर में ‘अच्‍छी’ ज़िंदगी और प्रेम कमाने पहुंचा नया-नया स्‍ट्रगलर.. वह पहले से ही काफ़ी अच्‍छी ज़िंदगी जीता दिखता है.. पानी की किल्‍लत नहीं होती, गैस के कनेक्‍शन का सोचकर वह उदास नहीं होता.. और सबसे ऊपर भंसाली, संतोषी, मणि रत्‍नम से लेकर इल्‍लु-बिल्‍लु-टिल्‍लु किसी की भी फ़ि‍ल्‍म में अपने बेचारे-किस्‍मत के मारे कैरेक्‍टर को ‘स्‍पेस’ की दिक्‍कत तो नहीं ही होती! भला आदमी गांव में ठौर जमाये हो चाहे बीच मुंबई में, जवान पसरकर रहता है.. कभी सोलह बाई बाईस के हॉल में लेटा हुआ चिंतित हो रहा है तो कभी अट्ठारहवीं मंज़ि‍ल की बालकनी से शहर का नज़ारा लेता उदास हो रहा है कि कब लाइफ पटरी पर आएगी!..

हिंदी फ़ि‍ल्‍मों में स्‍पेस की हैंडलिंग इतनी फूहड़ और हवाई होती है कि तथाकथित गंभीर फ़ि‍ल्‍मों में भी एक पॉयंट के बाद नहीं, शुरू से ही हम उसे गंभीरता से लेना बंद कर देते हैं.. बड़े शहरों में रहते हुए, अंदर ही अंदर इस सच्‍चाई को हम भी जानते हैं कि बी ग्रेड के हीरो तक ने- जिसने अपनी पिछली फ़ि‍ल्‍म में फलाने प्रिंस का रोल किया था- हो सकता है असल जीवन में अपने तीन कमरों वाले औसत मकान और गाड़ी की अभी तक किश्‍तें पटा रहा हो!..

हिंदी फ़ि‍ल्‍मों में स्‍पेस (सटेल्‍टी, कहानी, अभिनय के पैनेपन की ही तरह) दया जगाता है.. हतप्रभ और चकित नहीं करता.. उस तरह की जुगुप्‍सा व हतप्रभता समूची दुनिया में जगाने का काम सहजता से हॉलीवुड की फ़ि‍ल्‍में ही करती हैं.. मैं कभी अमरीका गया नहीं, जो गए हैं उन्‍हें इसका सही अन्‍दाज़ा होगा कि मकानों के भीतर आदमी कभी सांसत महसूस करता है या नहीं.. औसत मकानों के भीतर टहलते हुए लोग अभिषेकों और विवेकों और सलमानों के बंगलॉज़ से ज़्यादा सुखी जीवन जीते दिखते हैं.. जी रहे हैं? सचमुच?..

यहां तो ज्ञानदत्‍तजी के पोस्‍ट से बीच-बीच में याद आ जाता है वर्ना बंगलॉ तो हम भूल-सा गए थे.. घर के अंदर क्‍या, बाहर भी हाथ-पैर संभाल-संभालकर चलाना पड़ता है.. कि मालूम नहीं कब किसी पर पड़ जाए (हाथ और पैर दोनों)! मेरी बिल्डिंग में बच्‍चे एक तंग संकरी पट्टी में क्रिकेट खेलने की अदायें प्‍ले करते रहते हैं.. खुला मैदान वास्‍तविक जीवन में नहीं, सपने में भी देखे अर्सा हो गया.. शायद मैं स्‍पेस की किल्‍लत की कुछ ज़्यादा ही उदास तस्‍वीर बुन रहा हूं.. पता नहीं.. लेकिन ज़रा आपही सोचिए.. ठीक से याद करने की कोशिश कीजिएगा.. आखिरी मर्तबा कब ऐसा मौका आया था कि आपने खुद को खुले, बड़े मैदान में खड़ा पाया था.. और चारों ओर बीस हाथ की दूरी तक सिर्फ़ आप ही थे.. कोई दूसरा शरीर आपसे टकरा नहीं रहा था?..

कुछ याद आ रहा है? कि स्‍पेस का सोचकर आप भी मेरी ही तरह हिंदी फ़ि‍ल्‍मों के दिमागी दिवालियेपने पर हंस रहे हैं, और अपने ‘वास्‍तविक’ पर रो रहे हैं?..

7 comments:

  1. रो रहे हैं?? भारत की सोच कर....यहाँ तो खुला ही खुला है. :)

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  2. आप सपने बहुत देखते हैं..
    बान्द्रा से लेकर बोरीवली तक एक भी पार्क नहीं है.. स्पेस.. मेरा खयाल है कि मुम्बई के ऊपर के आकाश वाले स्पेस में भी स्पेस नहीं होगी..

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  3. स्पेस तो अंतर्मन में होता है जो अंतर्मुखी को दीखता है.
    अन्यथा रेलवे लाइन के दोनो तरफ स्पेस है जहां दिन में दो बखत लोग लोटा ले बैठे दीखते हैं.

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  4. भइये !

    स्पेस क्रंच तो है . मनोवैज्ञानिक शायद इसे 'रैट सिंड्रोम' कह कर आदमी के हिंसक और उन्मादी व्यवहार का कारक बताएंगे . आदमी को जितनी न्यूनतम जगह चाहिए वह उपलब्ध नहीं है . आस-पास जितनी हरियाली,गाछ-पाला ,आकाश-बातास चाहिए उपलब्ध नहीं है . ये मेगासिटी के मेगादुख हैं . कुछ के लिए चुने हुए दुख,कुछ के लिए मजबूरी के दुख .

    ज्ञान जी इलाहाबाद में बंगले में रहते हैं और मैं कोलकाता में फ़्लैट में . इलाहाबाद के बंगले में तो हरियाली होगी ही पर मैं तो यहां कोलकाता के सीएसआईआर आवासीय परिसर की हरियाली पर ही मुग्ध हूं . इतनी खुली जगह,इतने पेड़,इतने पक्षी और बाहर निकलते ही इतनी बड़ी झील -- मैं तो ऐसी जगह रहने की कल्पना ही नहीं कर सकता था . सुबह-सुबह जो जोरदार कलरव होता है उसके तो क्या कहने . बीच-बीच में पास से गुज़रती ज्ञान जी के विभाग की लोकल-ट्रेन की सीटी की तीखी-कंटीली आवाज़ न हो तो किसी महानगर में इससे बेहतर जगह की मैं अपने लिए कल्पना नहीं कर सकता .

    अब अपने फ़्लैट में जाऊंगा तो मैं भी 'स्पेस'की कमी पर ऐसे ही दुखी होऊंगा और ऐसे ही हाथ-पैर टकराएंगे . क्या करें ? या फिर गांव-कस्बे में लौट जाना होगा . पता नहीं क्या होगा और हो पाएगा .

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  5. पता नहीं क्यों पर स्पेस का कनेक्शन कभी आसपास कितनी जगह है इससे नहीं रहा।

    भरी स्टेट ट्राँसपोर्ट की बस में खिड़की के बाहर देखती तो लगता स्पेस ही स्पेस है....

    खुले मैदान में अकेले बैठे हों तो कभी इतना शोर हो जाता है कि म्यूट का स्विच ढूँढने का मन करता है।

    आप हिंदी फिल्म बड़ी ध्यान से देखते हैं...भला क्यों...कास्ट्यूम,कोरियोग्राफी,ऐक्शन सब पर तो ध्यान देते हैं यह लोग। आप भी इन्डिया में चीन देखने लगे।

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  6. @बेजीजी,
    समीर भइया की बात तो हमने सीरियसली लेनी बंद कर दी है.. वह तो चाहते ही हैं कि हम चीन में भी दर-दर की ठोकर ही खायें.. रहे अभय और प्रियंकर तो ये नाम जितनी भी सजीली रख लें, हैं दुखी आत्‍मायें ही.. मैं ज़रा कल्‍पनाशील हूं, ज्ञानदत्‍तजी भी बीच-बीच में ट्राई मारते रहते हैं.. मगर असली जंप तो आप लेती रहती हैं.. आपकी कैज़ुअल, इन्‍नोसेंट स्‍टाइल वाली कल्‍पनाशीलता से कभी-कभी मेरे जैसा अधम भी दंग होता रहता है!

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  7. आप भूले तो नहीं ना कि मुझे शिष्य बनाया था??
    यह सब उसीका नतीजा है।
    वैसे मुझे तारीफ बहुत पसंद है।

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