Monday, October 1, 2007

उजास अंधेरे..

मालूम नहीं लोग हैं कि उनके गिर्द पहरा बनाकर चलनेवाला समय है जिसका बुरा मानें. टूटे आईनों में कभी कोई मुस्‍कराहट दिखती है, या सूखी, मटमैली उदासियों के किसी आड़े-तिरछे तिराहे पर कोई पहचानी आवाज़ कहती है बड़ी मुश्किल है, दोस्‍त. चमकती धूप, सजावट में कटे वृक्षों व मज़बूत सड़कों के आत्‍मविश्‍वासी विस्‍तार पर तैरता मैं यकबयक कांप जाता हूं. छीजती रेज़गारी की पाकिट पर हाथ धरकर मानो अचानक याद आया हो हाय, अपरिचय के संसार में कैसा बहका-बहका लहरा रहा था, असमय गा रहा था. एक सज्‍जन पुरुष प्‍लेट की मिठाई चखते हुए कहते हैं सपनों का अनुशासन नहीं समझते तब तो चूतिया ठहरे आप. तंग गली के जगर-मगर में मैं फिर बारी-बारी से गिनता हूं सारे अपने, एक-एक. सपने. क्‍या किया जाये फेंक दिया जाये इन सपनों का मोल किया जाये. उठती सड़क भारी कदमों डोलता भीड़ में बिलगता हूं, ज़रा आगे जाकर दूर से देखता हूं. फिर हैरत होती है अपने को पहचानने में. इस तरह टुकड़े-टुकड़े खुद को जानने में.

2 comments:

  1. यही माया है,………सुंदर……छटपटाहट दिखती है……

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  2. अजब बात है:सपनों का अनुशासन नहीं समझते ?? अभी मिठाई चख रहा हूँ प्लेट में से. :)

    मजाक अलग:

    टुकड़े-टुकड़े में ही सही-जब शुरु हो ही गये हैं तो जान जायेंगे. बहुत सुन्दरता से मनोभाव उकेरे हैं. कम पढ़ने मिलता है कम शब्दों वाला प्रवाहमान गद्य.

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