Friday, October 5, 2007

रहिया राह निराली..

बतियां बात निराली
बुड़-बुड़ हलबल डूबें
मनवा सूना खाली
डारि डगर लटिकैं झूलैं
कोंचें चिंचियायें हलहल होहो
मनवा माचिस बालें
रह-रह उजियारा देखें
फिर अंधियारा दुलराये
रहिया राह निराली..

का बोलें कापे मुंहवा तोपें
तापै टहिल अचक्‍का होवैं
धक्‍कम-धक्‍का धूम-धड़क्‍का
चोरि उचिक्‍का ऋषि गुन ज्ञानी
काको गावैं कोको लतियायें
कौन राग हरमुनिया सेटें
कौने करवट देह गिरायें
ता ता धिन्‍ना ता ता धिन्‍ना
अकबक-अकबक चमचम-चकमक
हरेराम हरैं हरियाली
रहिया राह निराली.

8 comments:

  1. सचमुच निराली ।

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  2. रहिया राह निराली.
    रहिया राह निराली.
    रहिया राह निराली.

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  3. बात निरालीए बा.

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  4. दिल्ली से मुम्बई की राह पकड़े की नाही, लग रहा है सब निराले चल रहा है,

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  5. तड़पत मनुवा मन ही नाचे
    सटपटाय हिया बांचन लागे
    झूलत,झमकत,झाड़ बनावे
    झोली फिर भी खाली
    रहिया राह निराली
    रहिया राह निराली

    बंबई छोड़ दिल्ली को ध्याये
    मुनिजन सकल बहुत समझाये
    सावन के अंधे को सूझे
    हरियाती हरियाली
    रहिया राह निराली
    रहिया राह निराली

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  6. प्रमोद जी मूल कविता में काकेश की पंक्तियां भी जोड़ी जा सकती हैं.

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  7. वकिय्या!!रहिया राह निराली.

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  8. Guru apke style pe main jaoon balihari,
    is bhang bhasod duniya me masti bani rahe tumhari

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