Sunday, October 7, 2007

हिंदी की चिरगिल्‍ली दुकान..

मैं कोई ऑरिजनल बात नहीं कह रहा. रघुवीर सहाय ने इस विषय पर ढेरों बिम्‍ब पहले ही रच रखे हैं. ज़्यादा पैने, ज़्यादा मार्मिक- साहित्यिक; पच्‍चीस और तीस वर्ष पहले. तो मैं क्‍या कहूंगा? मुझे तो अभी भी हिंदी में साहित्यिक होना क्‍या है उसकी तमीज हासिल करनी है. साहित्‍य की जितनी तमीज है, उस नज़र से जगह बदल-बदलकर शहर को देखते हुए अलबत्‍ता बीच-बीच में सन्‍न ज़रूर होता रहता हूं. हिंदी का साहित्यिक नहीं होता. वह अपनी मंडी में मेज़ पर उंगलियां बजाता मस्‍त रहता है. मुस्‍कराता है. मेरे सन्‍नभाव को कुछ खिन्‍नमन देखकर जल्‍दी ही ऊबने लगता है. विषय बदलकर वापस अपनी आत्‍ममुग्‍धता के भूगोल में लौटना चाहता है. आराम से लौट आता है. वापस चहचहाचट शुरू हो जाती है. अहा हिंदी, ओहो हिंदी. मैं थका हुआ देरतक गिलास का पानी पीता रहता हूं, या चिढ़कर पतनशील बिम्‍ब बनाने लगता हूं.

हिंदी के आत्‍मतुष्‍ट समाज में यह भी मज़ेदार अदा है. लोग आपको सुनने से पहले देखते हैं. आपकी आंखों की बेचैनी या आपके विचारों की ताप नहीं. आपकी सामाजिक हैसियत का कद. आपकी कॉरपॉरेट हैसियत और आपकी कार की मेक. उससे आपकी उपस्थिति और आपके विचारों का वज़न बढ़ जाता है. लात खाये व हीनता-ग्रंथि से ग्रस्‍त समाजों में लोकाचरण की शायद यह सामान्‍य परिपाटी हो. किसी प्रसून जोशी को जवाब देता शायद कोई बड़ा प्रकाशक ऐसा कहने में संकोच व सावधानी बरते कि क्‍यों वह किसी नोबेल पुरस्‍कार से सम्‍मानित लेखक का दो कौड़ी पैसों में दो कौड़ी का अनुवाद करवाता है! अपने कर्मों व विस्‍तार में मुदित बड़े प्रकाशक को इसका कोई अपराध-बोध भी नहीं. वह मज़े में बांह सहलाता कहता है- हां, वह अनुवाद अच्‍छा नहीं हुआ. मगर सवाल यहां इस और उस अनुवाद की नहीं. अंतर्राष्‍ट्रीय ख्‍याति की कोई भी अच्‍छी किताब उठा लीजिए, उसके अनुवाद को ज़रा उलटिये-पुलटिये, फिर या तो शर्म से सिर झुका लीजिए, या गदगद बने रहिए. आपका कुछ बिगड़े तो बिगड़े, हिंदी साहित्‍य का कुछ नहीं बिगड़ता.

सरकारी प्रतिष्‍ठान की एक अच्‍छे धज की सजी दुकान. शीशे के सुधड़ दरवाज़े. फिलहाल बंद हैं. मेरे सवाल करने पर बरामदे की बेंच पर दोपहर की सुस्‍ताहट में रमे कर्मचारियों के गुट में से कोई जवाब देता है- यह आज बंद ही रहता है. जवाबोपरांत प्रसंग की इतिश्री मान, कर्मचारी हाथ की सुरती मलता, साहित्‍य से परे अपने समय में लौट जाता है. एक दूसरी जगह इसी तरह की सजी अच्‍छी दुकान है. सरकार की नहीं, प्रकाशन की. बंद नहीं खुली है, मगर तत्‍काल उसका एक अन्‍य इस्‍तेमाल हो रहा है. शीशे के दरवाज़े के पार बुझी हुई बत्तियों के नीम अंधेरे में दीख रहा है कर्मचारी फ़र्श पर अख़बार बिछाये दोपहर का भोजन निपटा रहे हैं. एक औरत अपनी टिफिन में पानी गिराती हाथ धो रही है. शीशे से लगे मेरे चेहरे का ध्‍यान आने पर हाथ के इशारे से समझाती है- अभी जाओ. बाद में आओ.

एक लेखक गदगद है कि उसकी चर्चित, सफल किताब पर पिछले वर्ष बीस हजार की रायल्‍टी आई. मैं सन्‍न हूं कि यह सफलता की कहानी है तो असफलता की कहानियां कैसी होंगी. किस्‍से और भी हैं. आशा और उम्‍मीदों से भरे नहीं. इसी तरह के, चिरकुट स्‍तर के. फिर कहूंगा. आप गदगद समुदाय से हों तो मत पढ़ि‍येगा.

1 comment:

  1. अपनी चिरकुटई में हमरी भी टेक लगाकें गायें..

    हय्या हो हय्या हो
    हिन्दी है भय्या हो
    जेब में चिन्दी नहीं
    फिर भी ता थैय्या हो
    माथे की बिन्दी हैं हो
    ऎसे ही सैय्या हो
    हय्या हो हय्या हो
    हिन्दी है भय्या हो

    वैसे इसे गदगदाये लोगों को ही पढ़ाने की जरूरत है..लेकिन उन्हे पढ़ाने के लिये आपको अपने कार का मेक बताना पढ़ेगा... यू आर ए राइटर...हो हो हो...ओ.. हिन्दी राइटर.. ग्रेट यार..बढ़े करेजियस हैं आप...

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