Friday, October 12, 2007

सुभो-सुभो हाय नोटपैड की क्‍या मह-मह मस्‍ती..

आज सारी कमीनाई धरी रही घुस गई चतुराई.
भूल गए जैसे होते थे कैसे बेहया होती क्‍या बेहयाई.
सन्‍न देखता रह गया, खुद के देखने से पहले महेश, गणेश,
मातादीन, मंदप्रसाद सब सोये रहे मैं उठ गया.
ताज़ी हवा सूंघकर थोड़ा घबराया कहीं ज़्यादा ही गड़बड़ न हो गया हो विचारता कुछ शरमाया भी.
मगर अब क्‍या हो सकता था.
चाय उबल रही थी नल चल रहा था.
साइकिल के मुरचा खाये चेन पर
नए तेल की कुप्‍पी की सिंगार की तरह
मैं नवल रहा था. अकड़ी हुई पीठ की धजा तान
हाय, सुभो-सुभो नोटपैड पर कैसा हलल-हलल चल रहा था!

2 comments:

  1. सुनाया जाये वही सुभो सुभो का हलल हलल. इन्तजार करते हैं.

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  2. एक बार फ़िर से सोया जाये।

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