Thursday, October 11, 2007

बहुरुपिया मैं की अकबक अलबलाहटें..

बहुरु‍पी व्‍यक्ति. बहुरुपिया. कुछ लोगों के लिए सहज-साध्‍य होता है. कुछ लोग हांफते-कांपते रहते हैं मगर अपने खांचे से बाहर अपने को उकेर नहीं पाते. खांचे से बाहर कर दीजिए, वे एकदम गुम जाएंगे. मैं लिखने की अदाबाजियों में अपने बहुरुप को खोजता रहता हूं; कभी चार कदम की कोई छोटी सफलता मिलती है, तो ढेरों दफे हास्‍यास्‍पद भी होता रहता हूं (खांचे से बाहर खुद को खोजने व पाने में हास्‍यास्‍पद होते रहने के खतरे हैं, स्‍वाभाविक है; इसलिए जो मध्‍यवर्गीय वैनिटी के मफ़लर में अपनी ठंड तोपे रहना चाहते हैं, उन्‍हें सलाह है इस बहुरुप-तुरुप के टंटे में न पड़ें!).. लेकिन फिलहाल मैं अपनी अदाबाजियों की.. और अपनी असफलता, या कहिए, कोशिशों की सीमाओं की कह रहा था. कि चार दिशाओं में चार कदम चलने के अनंतर कैसे थक-हारकर मैं पतनशील का टैग लगाकर एक करवट सोने की सहूलियत से चिपक लेता हूं. बहुरुप सबकॉंशस में डोलता रहता है, उसकी पतली-महीन धारियां बनती-बिगड़ती रहती हैं; लेकिन वह ठीक-ठीक पकड़ में नहीं आता.

एक व्‍यक्ति है जो सुबह चेतना में लौटने के साथ फेफड़े में साफ़ हवा का स्‍वाद, प्‍याली भर चाय-कॉफ़ी खोजता है. देह पर धम्‍म से गिरते किसी छोटे बच्‍चे का बोझ, किसी अंतरंग की मीठी चुटकी के स्‍नेह में नहाये अलसाहट में दिन शुरू करता है. फिर अनसुलझे सवालों, विचारों व चिंताओं के छोटे-बड़े ढेरों तालाब निकल आते हैं, जिसमें अव्‍यवस्थित, हड़बड़ाई चिप्पियां चलती हैं- पुरानी लकड़ी के फट्टोंवाली एक कमज़ोर डोंगी.. कभी बूड़ती, कभी डगमगाती मंथ्‍ारगति डोलती चलती है. कभी उत्‍साह का झकझोर उठता है, और टिल्‍ली डोंगी दूर कहीं से कहीं निकल लेती है; तो कभी थिर पानी के सूनसान में अपने बीहड़ एकांतवास में- भयदग्‍ध- अपने अंत की राह तकती जैसे जड़मना भी हो जाती है. चित-पट के दोनों ही रूप हैं, और दोनों ही बराबर के वास्‍तविक हैं..

फिर एक वह शख्‍स है जो जहां जाये, परिस्थिति से निर्लिप्‍त किताबी टोह में रहता है, दैहिक बोझ हैंडिल करने में हड़बड़ाता है, मगर किताबी बोझ बढ़ाता चलता है. क्‍यों? इस क्‍यों का उसके पास जवाब नहीं. और भी ढेरों क्‍यों और कैसे हैं जिनका उसके पास जवाब नहीं. उन जवाबों की टोह में रहने की जगह वह वैश्विक नक्‍़शे पर कहीं और स्‍थानांतरित होकर किसी सपनीले लोक में मगन हो लेता है; छोटे-छोटे तारे-सितारे गढ़ता उन्‍हें इस नोट और उस बुक में दर्ज करता रहता है. कैसे इंडलजेंसेस हैं ये? इस रूप का वस्‍तुगत मूल्‍य क्‍या है?..

फिर सामाजिक निर्जन में हा-हा ठी-ठी की अदायें हैं. जो लोकोपचार के किसी वाजिब मशीन में कभी कोई सिलसिलेवार पंक्‍चुएशन नहीं ब‍नतीं. अपने पथरीलेपन में बस अपने को यूं ही एक्‍जॉस्‍ट करती रहती हैं. ऐंठेंपन का यह कैसा टेढ़ापन? कौन जाने. फिर अंदर सीली, मटमैली दीवारों के उस ओर धीमी गरज से बहता कोई सोता अचीन्‍हीं अंतरंगताओं का. कैसी गझमझ अंतरंगता? ठीक-ठीक चाहता क्‍या है? मांगता क्‍या है? अपने बहुरूप को व्‍यक्‍त करना जानता है?..

खांचे की मांग और दबाव से अलग खुद अपनी वर्जनाएं होती हैं, नासमझी और असमंजस की सीमाएं होती हैं. लोगों की तरह शहरों की भी एक खास तरह की स्‍मृति अपने झोले में दाबे लिये चलते हैं. बात निकलने पर याद आता है फलाने हिलते हुए हंसते हैं, या कितना अनफ्रेंडली शहर है. बहुरूप की टोह कहां रहती है? बहुरुपिया अपने विविध-अबूझ परतों में सोया रहता है.

3 comments:

  1. अपनी समझ में सिर्फ हिलते हुए हंसने वाला रूप आया.

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  3. पूरी की पूरी पोस्ट समझ आ रही है...यह अच्छा लक्षण है कि बुरा...?!!

    चित्र और बात दोनो पसंद आये....कुछ जवाब भी सुझाइये।

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