Sunday, October 14, 2007

मेरी ठसक, सामाजिक सन्‍नता.. व ईद के मुबारक़बाद..

इन अनूप शुक्‍ला का आखिर क्‍या किया जाये (बंगलॉनुमा उनका मकान व धान के खेत का नहीं, वह तो मैं सहर्ष किसी भी क्षण हड़पने को प्रस्‍तुत हूं ही..)? इस घड़ी-घड़ी फ़ोनियाते मस्तियाये शख्‍स का क्‍या किया जाये जो हंसते-हंसते अचानक एक मामूली सच्‍चाई से रूबरू होने पर एकाएक सन्‍न हो जाता है. फिर सन्‍न ही बना रहता है? सोचते-सोचते मैं बीच में थक जाता हूं हिन्‍दी की ऐसी बेचारी-हारी कल्‍पनाशीलताओं से. होगा क्‍या. जाएगी कहां हिन्‍दी? क्‍या उखड़ेगा? ऐसे आप फिर धान ही उखाड़ते रहिये, बाकी क्‍या उखा‍ड़ि‍येगा. हद है! ओह. एनीवे, जैसाकि मेरे साथ अमूमन होता है, मैं गंभीर बात कर रहा था, और जैसाकि अनूप के साथ है, गंभीर बात सुनते ही उनके हंसी छूटने लगी. बेबात हंस रहे थे, और मैं वयस्‍क अपरिपक्‍वता के ऐसे साक्षात से जेनुइनली डिप्रेस हो रहा था, झींककर गंभीरता के अपने मानकों से ज़रा नीचे उतर आया, रोज़मर्रा के मामूलीपने में घुसा ही था, माने अपनी उम्र की सच्‍चाई और अभय के फरेब की पोल-पट्टी का ज़ि‍क्र किया ही था कि अनूप सन्‍न रह गए. सारी हंसी उड़ गई. हकलाते हुए फिसलने लगे कि हमारी श्रीमतीजी तो अभय को पच्‍चीस का सर्टिफिकेट दे चुकी हैं? दीखा होगा तभी दी हैं, हमारी श्रीमतीजी से चूक नहीं होती! मैंने चिढ़कर कहा चूक नहीं होती जभी तो आप-सा गुणगणेश गणरत्‍न प्राप्‍त की हैं? बाबू अनूप, अभय हों पच्‍चीस कि उन्‍नीस, मुझसे आप ये नोट करा लो कि मैं उससे तीन साल छोटा हूं, और वह आपको और आपकी श्रीमतीजी को जवान दिखता है तो मैं कम हसीन नहीं दिखता होऊंगा! और दिखने में कोई कसर रह जा रही है तो दोष मुझमें नहीं आपकी दृष्टि में है, और अभय, अपने, व श्रीमतीजी के बाल रंगने के साथ-साथ जेनुइन रंगीनी देखनेवाली दृष्टि पाइए पहले!

अनूप सन्‍न बने रहे. मैंने ऊबकर फ़ोन रख दिया. ऐसे आदमी से कोई क्‍या बात करे. करे क्‍या?.. खामखा बैठे-बिठाये संडे खराब कर दिया. माने अभी दिन और पूरी शाम बची हुई है, मगर आसपास जैसे एक से एक प्रतिभाशास्‍त्री बने हुए हैं, आगे संडे के सत्‍यानाश को मैं आखिर क्‍या खाके रोक लेनेवाला हूं? रूका हुआ आदमी हूं नहीं ही रोक सकूंगा.

अब इसी को लीजिए, मैं ठहरा हुआ देखता रह गया, और माथे से एक-एक करके सांय-धांय समूचा एक महीना निकल गया! राजधानी में न दो कौड़ी का कोई रोज़ग़ार ढूंढ सका हूं, न ऐसा कोई ठौर जहां कोई रूपसी गोद में मेरा पैर लेकर दाबते हुए अपना जीवन साथर्क करे! अपने को जो मेरा मित्र बताते थे, वे मेरी मौजूदगी के तनाव में घबराकर अपना फोन फेंक दे रहे हैं, कि अचानक सामने पड़ने पर कह सकें कि अरे, भैया, फोनवे हेरा गया तो का करते? नंबरे नै था जो आपको कंटैक्‍ट करते!..

बुझइछि, बुझइछि, हमरा आगै कथा-काहिनी नै पेलतौ, हां? ससुर बात करते हैं फोन हेरा गया था! अबे, आपै काहेला नै हेरा गए, आं?..


ठेकुआ, पूड़ी-दही वाली सारी दोस्तियां दो कौड़ी की साबित हुईं. किसी ने गर्दन तो क्‍या, कुर्सी के हत्‍थे पर भी ज़्यादा वक़्त हाथ धरने नहीं दिया. या तो बेबात खीं-खीं हंसते रहे, और मौका लगते ही गलत बस में चढ़के अंतर्ध्‍यान हो गए (फ़ोन तो पहले से फेंका हुआ था ही!).. दिल्‍ली की ठंड शामें मैं ऐसी ही दोस्तियों की सोचता गर्मी जगाकर अंचिया रहा हूं.

प्रत्‍यक्षा दोस्‍त नहीं थी, लेकिन अपने वॉशिंग मशीन और बेटे के बाथरूम के इस्‍तेमाल की अनुमति देकर उसने होने से पहले मुझे किया. सन्‍न. बालकनी पर कपड़े सुखाते हुए उसकी साहित्यिक निधि का निरीक्षण करते हुए भी मैं सन्‍न ही होता रहा. अलबत्‍ता अपने साहित्यिक अनुराग का परिचय देते हुए जब वह अपने पठन-पाठन का विवरण देने लगी तो मैं बाथरूम-ऋण के बावजूद लड़ाई की मुद्रा में आने से स्‍वयं को रोक न सका- इतनी कथा-कहानी पढ़ती हो, क्‍यों पढ़ती हो? पढ़ो तो सिर्फ़ श्रेष्‍ठ साहित्‍य पढ़ो! प्रत्‍यक्षा ने आपत्ति की कि कहां क्‍या लिखा जा रहा है देखेंगे-जानेंगे नहीं तो पता कैसे चलेगा खुद क्‍या-कैसा लिख रहे हैं! मैंने हुंकारती आवाज़ में जवाब दिया- बित्‍ते भर की छोटी-सी ज़िंदगी है, सिर्फ़ श्रेष्‍ठ पढ़ो, श्रेष्‍ठ! उससे मन उकता जाये तो मेरा लिखा पढ़ो!

मेरा जवाब सुनकर प्रत्‍यक्षा सन्‍न रह गई. मैं इतमिनान से चाय की चुस्‍की लेता रहा. बीच-बीच में घड़ी देखता कि कोई मियां मित्र ईद की सेवइयों के लिए जाने कब बुलव्‍वा भेज दे. अभी तक नहीं भेजा है. मगर मन ही मन मुबारक़बाद, मुबारक़बाद बुदबुदाता मैं अभी भी उम्‍मीदबर हूं! आप बुलवा रहे हैं, कि खामखा मेरी गर्मी बढ़वा रहे हैं?..

5 comments:

  1. अभी तक बुलाया कि नहीं किसी ने सिवईंय्या खाने. मैं वहाँ होता तो बुला लेता. :)

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  2. पढ़ कर हम भी सन्न रह गये..अब क्या कैसे बुलायें :-)

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  3. आपका लिखा पढ़ लिया। अब श्रेष्ठ पढ़ा जाये। अभय तिवारी को शायद कुछ 'कनपुरिया डिस्काउंट' भी मिला होगा। वैसे अभय पर धोखाधड़ी का मुकदमा चलाया जा सकता है क्या? वकील कौन होगा, अदालत कौन सी होगी?

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  4. सन्न तो आप करते रहते हैं. अदा है आपकी.

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  5. सिर्फ़ श्रेष्‍ठ पढ़ो, श्रेष्‍ठ! फिर न मिले तो श्रेष्ठतर (Azdak) चलो अभी तो श्रेष्टतम का स्थान रिक्त ही है! ध्यान दें विद्वजन! अवसर है अभी।

    ह्म्म... सापेक्ष रूप से उम्र की गणना करने का फ़ायदा तो दिखा। लगाते रहो अभय की उम्र का हिसाब। आपने तो अपने लिये समीकरण दे ही दिया। सो फ़िट बैठेगा ही, मगर याद रहे यह समीकरण भी एक सीमा में हो - मान लीजिये को अभय के लिये कहे कि वे 60 वर्ष के हैं, तब आपको तुरंत अपना (अभय - 3) वाला समीकरण वापस लेना होगा क्या?

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