Tuesday, October 16, 2007

पैसा..

देखता हूं रोज मोटे शीशों और रंगीन
फाइबर में सजी गाड़ि‍यों के ऊपर से
गुजरती, अपोलो अस्‍पताल, एयरपोर्ट
और होटेल लाउंज में, और तो और
बीच सड़क बार-बार चौबीस गुना सात

इतना भोला नहीं हूं, जानता हूं किस
चिड़ि‍या का नाम है पैसा
हाथ से छूकर उसके मुलायम
पंख कभी देखे नहीं मगर जिया है
कैसे गप् निगल लेती है, चींथकर खत्‍म
कर देती है आत्‍मा, चुग चुकी जीवन
का सारा प्रेम, बिचारे हारे, हकलाये
हंसते है हाथ हिलाते हैं मगर देखिए,
सीधे मुंह बात तक नहीं करती..
टेढ़े भी कहां करती है?
उम्‍मीद की एक नल टप्-टप् चूती है

समूचा पूरा दिन अगोरते हैं
अकबकाये चिरौरी करते हैं
रतजगा करके लेकिन हाय
हाथ कहां आती है
एक पंख तक नहीं गिरता!
गिरे हमीं रहते हैं

बेहया फिर भी हारते कहां हैं
कभी दायें टेक लेते हैं
कभी बायें. सर्द रातों में नंगे पैर
भागे आंगन में आकर देखते हैं
काले आसमान में किधर उड़ रही है चिड़ि‍या

पहाड़ों के ऊपर धुंआ छोड़ती जाती है
शहर के चौक में बजवाती है नगाड़े
चिड़ि‍या, मस्‍त बच्‍चे चिंहुकते पूछते
है क्‍या बला. अमरीका कि जापान
हवा और पानी की खुराक
पर कोई कराहता हिन्‍दुस्‍तान.

4 comments:

  1. ज़िंदगी की ठसक के लिए बेहयाई ज़रूरी है। जो हो हमारे ठेंगे से...हम तो ज़िंदगी की निचोड़ कर ही मानेंगे।

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  2. चिड़ि‍या, मस्‍त बच्‍चे चिंहुकते पूछते
    है क्‍या बला. अमरीका कि जापान
    हवा और पानी की खुराक
    पर कोई कराहता हिन्‍दुस्‍तान.


    ---आह्ह्ह!!! क्या कहें!!

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  3. उंगली सही तरफ उठायी है

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