Wednesday, October 17, 2007

व्‍हॉट इज़ टू बी डन?..

सुबह की चमकीली धूप में ठेले पर सिगरेट खरीद रहा हूं. ट्रांजिस्‍टर पर आशा भोंसले 'सैंया ना थामो बैंया' गा रही है. विनती के शब्‍दों की आड़ में मादक अदायें पिच कर रही है. लेकिन सैंयाजी बैंया थामे हुए हैं, न छोड़ रहे हैं न आगे बढ़ रहे हैं; शायद भूल गए हैं. क्‍योंकि आशाजी पुनि:-पुनि: उसी टेक पर लौट रही हैं. अलबत्‍ता बगल में बरमुडा धारे एक नौजवान बच्‍चा अपने मोटर-मैकेनिक से जिरह करते हुए बहुत प्रसन्‍न नहीं दिख रहा. माने सैंया-बैंया वाले श्रृंगारी भाव उसके मन को नहलाने में असमर्थ रहे हैं. मतलब गाना और माहौल एक-दूसरे को अथॉंटिकेट नहीं कर रहे. कोई बैंया लहर-लहरकर सामने आती होती, तो मैं भी उसे एक ओर ठेलकर कहता- जरा सांस लेने दो, सजनप्रिया, अपने जलवे किसी और वक़्त के लिए रखो!

दिल्‍ली में दिन बीत रहे हैं. महीने के ऊपर अब ये घलुआ बीत रहे हैं. माथे में कुछ विचार थे कि राजधानी में रहते हुए यह-यह सब करना होगा. वह सब कुछ नहीं हुआ. और जो हो रहा है उसके बारे में बहुत साफ़ नहीं हूं कि हो क्‍या रहा है. कुछेक दिनों में ठंड बढ़ेगी तो शायद मेरे मुंह और दिमाग का अंड-बंड भी बढ़े. लक्षण वैसे ही हैं. अच्‍छे नहीं हैं. कभी-कभी चमकीली धूप और आशा भोंसले की लड़ि‍याहटों से ज़्यादा खुद से घबराहट होती है. किताबें और बेचैनियां बढ़ाने से अलग, मैं सुलझाता क्‍या हूं? फ़ि‍क्सर क्‍यों नहीं हो पाता. एक से एक तो हैं राजधानी में, तो मैं क्‍यों नहीं हो पाता?

कविवर बोधिवर ने इत्तिला किया है कि आज उनके सुधड़ सुपुत्र, बाबू अभय तिवारी और पूजेय-अजेय दूधनाथ सिंह का जन्‍मदिन है. तीनों को हमारी भी शुभकामनाएं. हमारी बीए की हिंदी कक्षाओं में कुछ रंग सफेद चमकते कुर्ते-पैजामे में दूधनाथजी की तरफ से भी आता रहा. अब कभी-क‍भी पत्रिकाओं के फ़ोटू में वे दिखते हैं तो सफेद चमकती दाढ़ी में दिखते हैं. मुझसे और छात्र होंगे, उनकी शुरुआती कहानियों के पाठक होंगे, सबकी ओर से उनके स्‍वास्‍थ्‍य व दीर्घायु की कामना. मानस बच्‍चा है और अभय बाबू तो दीर्घायु के पराक्रमी रथ पर चढ़ ही चुके हैं. दिल्‍ली की दीवारों पर 'तीन दिन तक लगातार खांसी आए तो टीबी की जांच करायें!' जैसे विज्ञापनों के बगल से रिक्‍शा गुजरता था, और उनके चेहरे पर शिकन तक नहीं आती थी. 'इफ़ यू आर सफरिंग फ्रॉम ऑवरवेट देन प्‍लीज़ काल सच एंड सच नम्‍बर..' जैसा विज्ञापन दिखने पर वह मेरी ओर देखकर मुस्‍कराने लगते थे. मैं, कातरता में, क्‍या देखूं क्‍या अनदेखा कर जाऊं गाने लगता था!

जन्‍मदिन की बात उठने पर अपने साथ तो कम से कम अब यही होता है: सेलिब्रेटरी मोड में जाने की सूझती नहीं. रीवर्स में अटके दु:खी होते रहते हैं कि देखो, एक साल और गया! इस बीच मेरा सिगरेट चुक गया है, आशा भोंसले की सैंयावाली प्रार्थना नहीं चुकी है. इच्‍छा हो रही है घुमाकर एक हाथ लगाऊं. हालांकि मौसम अच्‍छा है, फिर पराये शहर में हूं और सड़क पर दो पुलिसवाले वैन रोककर चाय पी रहे हैं.. फिर भी.. यू गॉट एनी सजे़शन?

4 comments:

  1. नो सजेसन,जस्ट इंजौय.

    ReplyDelete
  2. आपकी जैसी बेचैनी बची रहनी चाहिए आदमी के अंदर. इसीलिए तो इतनी गौर से देख पा रहे हैं चीज़ों को आप. आपके पास आस-पास के बहुत सारे डीटेल्स हैं. वरना कौन ध्यान रखता है. मशीन की तरह एक जगह पर रहने के अलावा आदमी कहां गंभीरता से जुड़ा होता है अपने परिवेश से? आशा है कि सारी भौतिक परेशानियों के बाद आप इस बेचैनी को किसी गंभीर रचना में ढालने की कोशिश करेंगे.

    ReplyDelete
  3. दिल्ली मे दिमाग दुरूस्त है ये क्या कम है. सर्दी जल्दी आ जाये ताकि आपके दिमाग का अंड बंड सामने आये. इतजार है.

    ReplyDelete
  4. आपके लिये तो हमेशा की तरह बस एक ठो सजेशन है कि एक सिगरेट और सुलगा लिजिये और आशा जी की स्वर लहरी में खोये बस ऐसे ही लिखते चलें-हमें पढ़ने का आनन्द लेने दें- निर्बाध.

    ReplyDelete