Thursday, October 18, 2007

कोई दूर से आवाज़ दे..

भोर की साफ हवा. कंटीला ठंडापन. देह के पोर-पोर खुल रहे हैं. साथ ही सिकुड़ रहे हैं. ऐसे में बाहर क्‍यों निकला हूं इसका अपने पास जवाब नहीं. शायद उस बड़ी, सियाह चील के असर में जो भारी पंखों से हवा को एक रिद्मिक अंदाज़ में काटती सिर पर मंडरा रही है? उसके पंखों से हवा का 'साक्! साक्!' कटना कानों में पड़ रहा है.. या कि सिर्फ़ मेरा वहम है. आवाज़ जो है पंखों की नहीं, भोर की हवा की है. आसमान में एक धुंधला नीला खालीपन है, कोई चील नहीं है. दरअसल सुबह की इस सुहानी हवा को फेफड़ों में उतारता मैं भी बाहर नहीं हूं. जहां हूं इट्स समव्‍हेयर एल्‍स! फिर सिर के ऊपर मंडराती चील? मेरे अंतर्मन में महज एक छवि है? सुबह की स्‍वच्‍छता में? क्‍यों है?..

किसी मेले में नहीं भटका. किसी भंवर में नहीं फंसा जहां से निकलना असम्‍भव हो रहा है. न कोई पीछे जान पर टूटा पीछा कर रहा है, और पैर में भारी पत्‍थर बंधे हैं कि एक-एक कदम भारी पड़ रहा है, और पीछा करनेवाले की दूरी पल-पल कम हुई जा रही है! सीधे माथे पर साक्! साक्! की सेंसुअस, सिडक्टिव आवाज़ निकालता चील.. बिम्‍ब ज़ाहिर क्‍या करना चाहता है.. कि मैं चिंथे जाने को प्रस्‍तुत हूं? सो सिंपल? रैश एंड स्‍ट्रेट? आई एम स्‍टन्‍न्‍ड. सहमकर पैर के खुरदुरे नाखुन टटोलता हूं. बांह के रोयें और गरदन के बाल छूकर देखता हूं, कोई ज़ख्‍म नहीं है. आंखें भी देख रही हैं, सुरक्षित हैं. पैर में चप्‍पल है (उंगलियों के किनारे गर्द में काले भले पड़ गए हों, शीत में अकड़े नहीं), सेलफ़ोन भी जेब में साबूत है और काम कर रहा है. एक रिक्‍शावाला नींद के अकड़ेपन में कसमसाकर जग गया है. एक आदमी पूजा के फूल इकट्ठा करने बाहर निकला है. एक कुत्‍ता देह झाड़कर मुस्‍तैदी से दिन के लिए तैयार हो रहा है, लेकिन मैं आश्‍वस्‍त नहीं हो पा रहा हूं. अवचेतन में साक्! साक्! के स्‍वर गूंजते रहते हैं. किसी लूप की तरह रिपीटेडली घूमते रहते हैं.

मेरा नाम शाहिद कपूर नहीं, न रामगोपाल वर्मा की फ़ैक्‍टरी की तरह मेरी फ़ि‍ल्‍में हैं जो फ्लॉप हो रही हैं. न मनमोहन की तरह मुझे किसी बुश को जवाब देने की मजबूरी है. मैं वही हूं जो सालभर पहले था, अभी दो दिन पहले तक था, फिर साक्! साक्! के इस लूप के लपेटे क्‍यों..

9 comments:

  1. भावों के अनुरूप एकदम सटीक images...कुत्ते का देह झटकना, आदमी का फूल लेने निकलना और फिर चील की साक-साक। पूरा दृश्य आंखों में खिंच जाता है।

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  2. ज़्यादा मत घबराइए. सुना है कि घूरे के भी दिन फिरते हैं.

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  3. घुरे और अपने से पहले कामना करता हूं तुम्‍हारे फिर जायें.. अच्‍छे दिन आयें..

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  4. "सिर्फ़ मेरा वहम है. आवाज़ जो है पंखों की नहीं, भोर की हवा की है. आसमान में एक धुंधला नीला खालीपन है, कोई चील नहीं है."


    सशक्त चित्रण कि सारा शब्द चित्र सजीव हो उठा.

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  5. आँख मूंद लूँ। शायद नीली काली धुँधली सी यह बेचैनी थम जाये....पर आवाज़ और जोर से सुनाई देती है। जैसे पलकों के बंद करने पर एक अकेली खिड़की जो निकल भागने का दरवाजा हो सकती थी ....बंद हो गई है....साक्! साक्! के स्‍वर गूंजते जा रहे हैं। किसी लूप की तरह रिपीटेडली घूमते जा रहे हैं।

    यह छवि क्यों मुझ पर यूँ हावी हो रही है....अंदर से ही जैसे कोई ड्रिल चला रहा हो....सूराख पर सूराख...आँख खोल सकता हूँ....निकल भागने का रास्ता इतना ही दूर है। पलक झपकाने जितना। पर पलक भी भारी है। खोलने का मन नहीं है।

    ....यह दिल्ली में चाय पीने का रिवाज़ नहीं है क्या?!!

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  6. आप तो गए काम से प्रमोद

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  7. सुन्दर उलझन चित्रण.ताने बाने ठीक से दिख रहे हैं-कुहासे के बावजूद भी.

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  8. इसलिए कि लिखते रहते हो। और लिखोगे साक-क झेलोगे। अकेले चलना टैगोर के जमाने में सही रहा होगा। साकण्साक से बचना है तो जरा जमाने के साथ चले।
    विपिन

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  9. ये साक-साक तो खूब लाए प्रमोद भाई...लगा जैसे मेरे आस पास ही कहीं विशाल डैने हवा को चीर रहे हों साक-साक..सजीव चित्रण...शु्क्रिया

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