Saturday, October 20, 2007

दिल्‍ली के अंधेरे..

नहीं छूट पाता चार हाथ के अपने दायरों से. रहता हूं उसी में गुड़ा-मुड़ा. रेजगारी, गोल्‍ड फ्लैक की डंडी और चिरकुट चिंताओं के साथ. कसमसाता, बसाइन-बसाइन. अलबत् मन छूटकर भागता रहता है पहाड़ों के पार, पराये गांवों के परायी ज़बानों के बीच. दृश्‍यावलियां कितनी पहचानी हैं. देखी फ़ि‍ल्‍मों में सब बार-बार, अपनी जानी हैं. रजत पर्दे से छिपी रह गई थी जो दु:ख की नदी कसैली, वनैली वह जार-जार धुंआधार फ़्रेम पर फैलने लगती है. छुप जाता है सिनेमा बचे रहते हैं ज़लालत के चोट खाये चेहरे. गरीबी, अपमान के अंधेरे कैदख़ाने. दिल्‍ली का फ़रेब, बर्बरता और राजनीति की अंधी दुनिया.

(संजय काक की कश्‍मीर पर डॉक्‍यूमेंट्री 'जश्‍न-ए-आज़ादी' देखकर)

7 comments:

  1. केवल फिल्मों में देखने से बात नहीं बनेगी,एक बार जाके देख आइये उन पहाड़ों को.

    ReplyDelete
  2. चिरकुट चिंतायें वफ़ादार होती हैं। साथ लगी रहती हैं।

    ReplyDelete
  3. अब दिल्ली की बेदिली से निकल कर चलिए कहीं देश दर्शन को निकला जाय..

    ReplyDelete
  4. आपका ब्लॉग तो गहरा समुन्दर सा है और चीन की यात्रा पढ़ कर तो मेरे लिए ईरान की यात्रा लिखने का रास्ता और सरल हो गया. धन्यवाद...

    ReplyDelete
  5. kuchh kiya jaye ki un chehron ki muskrahat laut aaye,

    ReplyDelete
  6. नहीं छूट पाता चार हाथ के अपने दायरों से. रहता हूं उसी में गुड़ा-मुड़ा. रेजगारी, गोल्‍ड फ्लैक की डंडी और चिरकुट चिंताओं के साथ.

    बहुत सुंदर।

    ReplyDelete
  7. निकलें एकाध राऊन्ड चीन फिर से. नजर अंदाज हो जायेंगी चिन्तायें -वह तो लगी ही रहेंगी.

    ReplyDelete