Friday, October 12, 2007

हिन्‍दुस्‍तान से होकर गुज़रना नोबेल के तीन साहित्यिक तिलंगों का..

इलाहाबाद के दारागंज पहुंचकर दारियो फ़ो का झकास परिहास उबा‍सियां भरने लगा. किसी के बताने पर चौंककर बोले- अच्‍छा, यहां इतने कवि हुए हैं? विपिन अग्रवाल ने ‘एब्‍सर्ड’ लिखा है सोचकर उन्‍हें ताजुब्‍ब हुआ.

डोरिस लेसिंग
घूम आईं उत्‍तराखंड के बीहड़ उजाड़, अजानी ज़बानों में सुनती रहीं झारखंड और छत्‍तीसगढ़ के आदिम आदिवासी किस्‍से. इतना सारा जीकर, जान-समझकर भी कितना रहता जाता है जानने को. पहचानने को एक उम्र कितना कम कितना-कितना कम होती है.

ओरहान पामुक
खोये-खोये धीमी मुस्‍कान मुस्‍कराते खुद को बचाते रहे- जनाब, ऐसा क्‍या ख़ास है आपके हिन्‍दुस्‍तान में जो हममें हमारे यहां नहीं है. वहीं धोखे हैं मक़्क़ारियां हैं. रहस्‍यवाद है बीच राजधानी पहाड़ पर सुरम्‍य बंगले हैं, कोई अधपागल बुढ़ि‍या बेसुरे सूफ़ी छंद गाती है; स्‍कूलों से बाहर आवारा बच्‍चों का गिरोह है, बेशर्म कुत्‍ते हैं लाचारियां हैं. ऐसा मत स‍मझिए आपके यहां नहीं आये तो हम वहां हुए नहीं, इस्‍तांबुल में रहना आपकी दिल्‍ली से गुज़रना ही है.

5 comments:

  1. क्या बड़ा लेखक होने की मान्यता नोबल प्राइज मिलने पर ही होती है? दारियो फो, लेसिंग और पामुक इतने महान हैं कि हम अपनी भाषा में ऐसे लेखकों की कल्पना भी नहीं कर सकते? आप इन विदेशी लेखकों को तो हिंदुस्तान घुमा रहे हैं. किसी भारतीय लेखक को भी मुक्त होकर विदेश घूमने का मौक़ा दीजिए.

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  2. बिल्कुल। एक-दो महीने पहले बता दीजिएगा तो पासपोर्ट बनवा लेंगे।

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  3. अज्द्क नाम से तो सुधीश जी के पास था. आशीष कुमार 'अन्शु'

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  4. वाकई पामुक का कहना सही हे, संत्रास व शोषण् भाषा.जगह बदलने से बदलता नहीं वैसे सिर्फ नोबेल विजेता ही नहीं कई बड़े नाम भारत आये हैं ... चे, नेरूदा। चेखव तो मृत्युद्धीप सखालीन की यात्रा से लौटते समय भारत होते हुए ही मास्को गए थे।

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  5. विदेशी लेखक भारत घूमने के बाद अपने देश में इतराते हैं या नहीं मैं नहीं जानता मगर अपने यहां के लेखक ज़रूर विदेश घूम चुकने के बाद ज़रा ज्यादा इतराने लगते हैं। मेरी बात से ये भी साबित हो रहा है कि भारतीय लेखक भी विदेश-उदेश घूम-फिर लेते हैं। हम तो बैठे देखते-पढ़ते रहते हैं उनका इतराना :)

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