Saturday, October 20, 2007

पुराने यार से दुलार..

बालु प्‍यारे, दोस्‍त दुलारे. मिले और देखो, पहचान नहीं पाये. मैं भी मुंह पर हाथ डाले बैठा रहा सकुचाया, शरमाया. उमर हो रही है अब क्‍या किया जाये, दोस्‍त. बाल पक रहे हैं, देह फूल रही है, सीढ़ि‍यों को देखकर कांपने-हांफने लगते हैं. फिर हाथ का बोझा देखकर तुम हंसने लगे कि अबे, तुम अब भी पढ़ते हो? समय, समाज और अपने अभिशाप को मैंने मुंह के बल गिरा लिया, बचाकर झोला ओढ़ा दिया. बोला, तुम पियो दारु, चहको, रहो मस्‍त, हम इसी भवुकई में रहेंगे. आईंदा फिर मिलना हुआ तो तुम रुककर नज़दीक मत आना, हम पटरी पर कुछ खोजते-सहेजते रहेंगे, तुम पीठ पीछे गाड़ी से बिन-पहचाने निकल जाना.

बालु ने मुंह घुमा लिया, यार, मज़ा नहीं है, ईएमआई में अटक गए हैं! तुम यकीन नहीं करोगे सात साल हो गए किन्‍नी से मिले. ऐसा भी नहीं कि वही भागी चली आई मगर शर्म लगती है किसलिए साला इतना घुल रहे हैं! यही पाने के लिए घिस रहे हैं इतना भूल रहे हैं? मैंने कहा, कोई ऑरिजनल नहीं बता रहे हो, बहुत सुन रक्‍खी हैं ऐसी ही कहानियां पहले भी, छोड़ो हटाओ. क्‍यों नहीं ऐसा करते गुरु, कि सब ताक पर रखकर, इसके पहले कि सर्दियां शुरू हों, हफ़्ते भर को पहाड़ पर निकल जायें? संगत रहेगी, बहुत मज़ा रहेगा, बालु? हांफते हुए ऊंचाइयां नापें, लकड़ी के चूल्‍हे पर आलू पकायें, तुम अपने किस्‍से सुनाओ, बताओ?

अबकी बालु एकदम चुप हो गया, फिर कुछ ज़्यादा ही हंसने लगा. मैं सिर झुकाये अपने भावुक उत्‍साह पर लजा रहा था, और बालु दरअसल बिला-वजह बहुत ज़्यादा घबरा रहा था..

4 comments:

  1. बालू को मैं पहचान गया. बेचारा. उधार की ज़िंदगी ऐसी ही होती है.

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  2. ये सारी वित्त व्यवस्था लोगो को बालू बनाने मे ही तो जुटी है. आपने सही बखान किया है

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  3. इरादा अच्छा है। आलू अभी कानपुर में चौदह रुपये किलो हैं। खरीद लिया जाये तुरन्त!

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  4. इरादा नेक है भाई. बालु बिला-वजह बहुत ज़्यादा घबरा रहा है.

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