Monday, October 15, 2007

सोचो तो..



सोचो तो तारों भरी रात है
उम्‍मीद है, सपना है
तुम दिल के इकदम
करीब हो, मैं हमदम हूं
तुम्‍हारा अजीज़, अपना हूं

सोचो तो कितनी बातें हैं
क़ि‍स्‍सोंभरी हज़ार रातें हैं
सुनहले दिन की सजीली पगडंडियां हैं
अधूरी-अधछूटी यात्राओं का रोमांच है
शर्मीली शामों की उमगती बेचैनियां हैं
पैरों से गुजरती इक मीठी का चुप्‍प बहना
कोई गाना पहले कभी सुना नहीं फिर भी
मन उमेंठता जैसे सगा पुराना, पहचाना

सोचो तो सब कैसी मासूम मामूली हसरतें हैं
कि मैं चन्‍द समझदार पंक्तियां लिख सकूं और
तुम समझदारी के तरतीब में उन्‍हें समझ सको
शर्म हो तो मेरा ही न हो, तुम्‍हें भी तोड़ जाये
मुसकराओ तो मैं भी तुम्‍हारे साथ खुलकर हंस सकूं.

सोचो तो समूची ज़िंदगी की ज़ि‍ल्‍लत है
रोज़, हर रोज़ की बात है. सोचो तो
पास कोई नहीं, सब सूना, इक लम्‍बी सियाह
रात है. या फिर सोचो तो हथेली पर नर्म
घास है, लूट के इस बंजर वक़्त में तुम्‍हारी
आत्‍मा में हम सबकी उम्‍मीदों का भाप है.

5 comments:

  1. अब उस पक्षी का इन्तेज़ार है?
    जो वीराना देख निपटेगा,
    और निपटेगा बीज,
    तब कहीं हट पाएगी वह खीज,
    जिसका उस बंजर पर राज है ।

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  2. सबसे ऊपर जो फोटू दिख रिया है. वो पांडवों के साथी का तो नहीं है. आपके बार-बार सोचो-सोचो कहने पर हमने सोचा. सोचकर विचार आया कि न जाने कैसा होता होगा वो प्रेम जिसकी कल्पना कवि कर ले जाते हैं. हमारी शुभकामनाएं आपकी साथ हैं. फिलहाल आप-आप अच्छा ही अच्छा और सुकून देने वाला सोचते रहें. ज़िंदगी के डरावने पक्ष को भूल जाएं.

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  3. जैसे सगा पुराना पहचाना......मन को उमेठनेवाली ए बातें बड़ी लुभावनी है...सर

    आपका

    नालायक और भटका भाई
    बोधिसत्व

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  4. इश्क मीर एक भारी पत्थर है
    कहां तुझ नातवां से उठता है...

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  5. मन चंचल है, उसी की उधेड़ बून है:

    सोचो तो!!!

    सब कुछ सोच आधारित ही है भाई!!

    बहुत बढ़िया.

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