Friday, November 30, 2007

हिंदी किताबों के बहाने पंजीरी और चरणामृत..

कल शाम दिल्‍ली से एक बंधुवर ने फ़ोन करके खींचना शुरू किया.. कि दाढ़ीवाली फ़ोटुएं दिखाकर मैं हज जाने की अपनी एलिजिबिलिटी प्रूव कर रहा हूं ऑर व्‍हॉट? कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा वाले अंदाज़ में मैंने जवाब दिया- गुरु, किताबों की लिस्‍ट हिलाने-फड़फड़ाने के बावजूद कोई टेरराइज़ नहीं हो रहा है, हद है, मेरे स्‍टॉक एकदम नीचे झूल रहे हैं, भइया.. एनीवे, जैसा कर ले जाने की मेरी प्रतिभा है, झिकझिक मेरी दाढ़ी से बहककर किताबों पर आ गई.. और जैसाकि तब स्‍वाभाविक था ही, दिल्‍लीवाले बंधुवर चुप हो गए और सारा टिल्‍ल-बिल्‍ल मैं ही बोलता रहा.. बात से बात निकली (मैंने ही निकाली) तो याद आया (दिल्‍ली के ही किसी और मित्र से चर्चा हुई थी) कि बचपन में पढ़े हिंदी के ढेरों ऐसे शीर्षक हैं जिनकी संगत में मन रससिक्‍त हुआ था, मगर जिनका न अब कोई अता-पता नहीं है, बल्कि कई मर्तबा पहुंचे हुए पढ़वैयों के आगे भी उनका ज़ि‍क्र करो तो वे मुंह खोलकर हवा में उंगली की पेंसिल (या मैग़जीन, जो भी पकड़े हों) घुमाने लगते हैं.. फिर हिंदी प्रकाशनों का ऐसा व्‍यवस्थित हिसाब-किताब है कि क्‍या मजाल कोई भी प्रकाशक किताब के प्रकाशन विवरण वाले पृष्‍ठ पर पुस्‍तक प्रकाशन का व्‍यवस्थित इतिहास ज़ि‍म्‍मेदारी और प्रेमभाव से छापे! इस छोटे-से काम से, अलग से कोई पैसा खर्च नहीं होता, एक पुस्‍तक-प्रेमी को अपनी पसंदीदा किताब के प्रकाशन की शुरुआत से अबतक का विवरण पाकर किताब के सामाजिक जीवन और उसके सामाजिक दखल का एक समूचा पर्सपेक्टिव मिलता है; मगर चूंकि इसे नहीं करने से प्रकाशक की कोई बिक्री प्रभावित नहीं होती, और उसकी इस प्रकाशकीय लापरवाही को कोई क्‍वेश्‍चन नहीं करता, उसके लिए जो जैसा चल रहा है, बरोबर चलता रहता है, और आगे भी जबतक चल सकेगा यूं ही चलता रहेगा..

ख़ैर, इस मसले की चर्चा के पीछे वजह यह थी कि जो किताबें सीन से ग़ायब हुईं, या फिर उन्‍हें किसी प्रकाशक ने उठा लिया, एकाध संस्‍करण छापे भी तो किसी बड़े लेखक (मतलब जिसे आलोचना संसार बड़ा कहता है) की किताब हुई, तो शायद इधर-उधर चर्चा पढ़कर आप किताब लोकेट कर लें.. अगर लेखक ऐसा बड़ा नहीं हुआ, जिसे बड़े आलोचक बड़ा बनाये रखें, और आप शोधार्थी नहीं हुए तो खोजते रहिए किताब.. सौ में से पंचान्‍यबे प्रतिशत चांस है हाथ नहीं लगेगी!.. जैसे दिल्‍ली में रहते हुए पिछले महीने मैं पानू खोलिया का सत्‍तर में छपा एक उपन्‍यास खोज रहा था (‘सत्‍तर पार के शिखर’).. किताब हाथ नहीं आई से ज्‍यादा, लोग मुंह बनाकर ऐसे देखते रहे मानो आयं, क्‍या-कौन पानू खोलिया.. अब चूंकि कोई परमानंद श्रीवास्‍तव एक और परमानंद ओझा दो ने पानू खोलिया को साहित्यिक समीक्षात्‍मक परिदृश्‍य में जीवित नहीं बनाये रखा है तो कहां से किताब पाइएगा? नहीं पाइएगा. मगर बहुत बार ज़रा बड़े क़दवाले लेखकों की पुस्‍तकों के साथ भी इससे अलग और कोई अच्‍छा व्‍यवहार नहीं दिखता. राही मासूम रज़ा की आत्‍मकथा है- ‘छोटे आदमी की बड़ी कहानी’ या शानी का नॉन-फ़ि‍क्‍शनल ‘शाल वनों का द्वीप’, क़ुरर्तुल एन हैदर का ‘गर्दिशे रंग-ऐ-चमन’ खोजते रहिए, नहीं मिलेंगी, सर्कुलेशन में नहीं हैं. क्‍यों, भाई, इसलिए कि मुस्लिम लेखक हैं? नहीं, सोचनेवालों के लिए यह एक एंगल हो सकता है मगर हमेशा वजह यही नहीं होगी. एक बार फिर ख़ैर, देखिए, मित्र से चर्चावाली बात उठाकर मैं कहां से कहां बहक-भटक रहा हूं.. तो चर्चा यह होती रही थी कि क्‍यों न कोई मानक वर्ष सामने रखकर, मसलन 1950, उसके बाद से प्रकाशित-चर्चित उन सभी पुस्‍तकों को, वे जब याद आयें, एक दशकीय खांचे के नीचे न्‍यूनतम प्रकाशकीय विवरण के साथ चेंपना शुरू किया जाये.. मसलन कोई मौलवी साहब जो ग़दर के दौरान अंग्रेजों को उर्दू का ट्यूशन इस और उस छावनी में देकर अपना अनुभव उर्दू में टीपते रहे और बाद में किताब छपी, जिसका हिंदी तर्जुमा ज्ञानमंडल या बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी ने सन् बावन में छापा, और हममें से किसी को उसकी ख़बर है और उस पुस्‍तक से प्रेम तो इतनी सी सूचना इस नए उद्देश्‍य से शुरू किए गए ग्रुप ब्‍लॉग में पचास के लेबल के नीचे चेंप दें?.. क्‍या कहते हैं, कैसा आइडिया है? एनीवन गेम फ़ॉर दिज़? एक ब्‍लॉग शुरू कर दें?..

ज़रूरी नहीं कि ब्‍लॉग पर सिर्फ़ उपन्‍यासों और कथा-कहानी की ही बात दर्ज़ की जाये. भूगोल, इतिहास, समाजशास्‍त्र, गणित, अनुवाद, जीवनी- वह फैले जीवन के किसी भी क्षेत्र की किताब हो सकती है, शर्त बस इतनी कि रोचक हो, उपयोगी-संग्रहणीय हो.. वर्ना पोंपस, प्रिटेंशस दीखने के ख़तरे के बावजूद एक बार फिर कहूंगा कि अगर ब्‍लॉग पर हमने कुशवाहा कांतों, अमृता प्रीतम, शिवानियों को चेंपना शुरू किया तो बेमतलब के कचर-मचर की एक अंतहीन सूची के जाल में फंसके रह जायेंगे. (मेरा ऐसा मानना है, आप बताइए, आपका क्‍या मानना है).. हालांकि भागाभागी के इस दौर में, घंटा, किसको अब किताबों की इतनी पड़ी है! मुझसे पगलेट अब धीरे-धीरे एक विलुप्‍तप्राय नस्‍ल में बदल रहे हैं.. किताबों की बढ़ी हुई छपाई किताबों से बढ़े लगाव का नहीं, उसकी आक्रामक मार्केटिंग का सूचक है.. फिर भी, जैसे मैं हूं, और भी पगलेट होंगे ही, तो उन सभी पगलेटों को आमंत्रण है कि इस नए उद्दम में अपने-अपने सुझाव दें कि सब सुझावों को नए ब्‍लॉग में इनकॉरपोरेट किया जा सके, मेंबरी की पंजीरी और चरणामृत बांटी जा सके.. या फिर अपनी जोशीली ,ख़ामोशी से ज़ाहिर कीजिए कि मैं फिर अकेला ही दीवार से सिर फोड़ता दु:खी होता रहूं!..

व्‍यवस्‍था बदलाव का एक्‍सरे: दो

रवि गड़ि‍या और इमैनुएल वैलेरस्‍टाइन के सौजन्‍य से कल हमने व्‍यवस्‍थाविरोधी आंदोलनों के समीक्षात्‍मक इतिहास का एक स्‍केची खाक़ा खोलना शुरू किया था.. दूसरी बड़ी लड़ाई के बाद, सन् पैंतालीस के आसपास तीन खानों में बंटी दुनिया के प्रभावकारी राजनीति हलचलों, गति का एक स्‍थूल विभाजन.. मगर इससे पहले, आइए, ज़रा इस समूचे परिदृश्‍य के एकदम बिगनिंग और वैलेरस्‍टाइन साहब के निबंध के भी एकदम शुरू से शुरू करें..

The capitalist world-economy has been in existence for at least 500 years. Its early years were marked by considerable labor unrest, which took many forms, from peasant rebellion to food riots to messianic movements to banditry. But it was not until sometime in the nineteenth century that continuing organized antisystematic political movements of the oppressed strata were first formed. In itself, this was a remarkable social invention, which has too long gone unheralded and unanalyzed.

This social invention, this mechanism of social change, was very efficacious, but it also had limitations, and it is this double reality which explains the curious phenomenon of the post-1945 period. Never did antisystematic movements seem stronger than in the period after 1945. But never did more people have doubts that these were achieving their aims…


लोगों की आशंकाएं निर्मूल नहीं थीं. बहुत जल्‍दी यह दिखने लगा कि लोगों के हीरो जिन व्‍यक्तियों और ताक़तों ने नाजी व फासी आक्रमण का जमकर लोहा लिया था, और युद्ध के बाद बड़े जनसमर्थन के साथ जो अपनी सरकारें बनाने में सफल हुए थे.. जैसे फ्रांस में नाजी दमन का जुझारु पार्टिज़न लड़ाका दी गॉल, इंग्‍लैण्‍ड में लेबर पार्टी सत्‍तारूढ़ हुई.. औपनिवेशिक देशों में अंतत: राष्‍ट्रीयता का सवाल विजयी हुआ, राष्‍ट्रीय सरकारों के बनने की एक लहर-सी चली.. यह वह समय था जब दुनिया के भूगोल के एक बहुत बड़े हिस्‍से पर आशावाद की तूती बज रही थी. पांचवें दशक के उत्‍तरोत्‍तर लोगों के जीवन में नाटकीय परिवर्तन आये भी.. औद्दोगिक क्रांति से पूर्व और उसके पश्‍चात पश्चिमी यूरोप में समृद्धि का ऐसा विस्‍तार हुआ जिससे पहले लोगों का परिचय नहीं था. इसी तरह औपनिवेशिकता से मुक्‍त जनता भी भविष्‍य को आशावाद के एक नए तराजू में तौल पा रही थी.. लेकिन जल्‍दी ही लोगों ने महसूसना शुरू किया कि फ्रांसीसी क्रांति के अनंतर जिस ‘स्‍वतंत्रता, बराबरी, बंधुता’ के सुरीले सुरों में वह अपनी लड़ाइयां लड़ते रहे थे, वह दो कदम आगे जाकर कहीं सोशल-डेमोक्रेसी और फोर्डिज़्म के जाल में उलझ गई है.. सोवियत संघ को दुनिया में समाजवाद के विस्‍तार की जगह पौलेंड, हंगरी, चेकोस्‍लोवाकिया जैसे देशों में स्‍तालिनिस्‍ट दमनकारी दानव के बतौर देखा गया.. वहीं पूर्व-उपनिवेश और अब आज़ादी जी रहे राष्‍ट्रों ने भी ढंग से महसूसा कि नये शासकों की चमड़ी का ही रंग बदला है, नीतियां नहीं..

तो इतिहास से एक बार फिर ठगे जाने की अनुभूति के साथ लोग भविष्‍य के रास्‍ते का क्‍या नया भूगोल बुनने की कल्‍पनाएं सजा रहे थे..

(क्रमश:)

Thursday, November 29, 2007

व्‍यवस्‍था बदलाव का एक्‍सरे: एक

पिछले महीने दिल्‍ली में देह का जो कर्म हुआ, मन जुड़ानेवाली एक मज़ेदार बात यह हुई कि मस्‍त और मुश्किल रवि गड़ि‍या से पहचान बनी.. बोनस में यह कि उनकी उन्‍मुक्‍त उदारता के सौजन्‍य से आंदोलन व सामाजिक परिवर्तन-संबंधी दसेक ऐसी किताबें हत्‍थे चढ़ी जिनका- मन की तमाम अभिलाषा के बावजूद- व्‍यवस्थित परायण धीरे-धीरे जीवन से छूटता गया है. हम अभी असमंजस में थे ही कि मुंबई के लिए निकलते हुए रवि को किताबें न लौटाने का क्‍या बहाना बनायेंगे, कि बंदे ने अपने वकीली जाकिट को बेमतलब बनाकर, कहते हुए, ‘अरे, भाईसाब, हमारी तरफ़ से गिफ्ट समझके रख लो!’, हमें मुंहजोर व चोर बनाते-बनाते लगभग बचा लिया.. सोचिए, दुनिया में अभी भी रवि जैसे लोग हैं.. और राजधानी दिल्‍ली में हैं! और सबसे बड़ी बात वक़ालत जैसे धंधे में हैं!..

ख़ैर, एक साथ पंद्रह किताबों को उलटने-पुलटने के क्रम में (आप आतंकित होते रहे हैं या नहीं? दरअसल कोष्‍ठक में ऐसे वाक्‍यांशों को ठेलने के पीछे आपको आतंकित करना ही मक़सद होता है..) इन दिनों रवि की दी गयी एक किताब, ‘ट्रांसफ़ॉर्मिंग द रेवोल्‍यूशन: सोशल मूवमेंट्स एंड द वर्ल्‍ड सिस्‍टम’ भी देख रहा हूं. समिर अमीन, जोवान्‍नी अर्रिगी, आंद्रे गुंडर फ्रैंक और इमैनुएल वैलरस्‍टाइन के संपादन में पांच ‘विचारोत्‍तेजक’ लेखों का संकलन है जिसे 2000 में पहले मंथली रिव्‍यू प्रेस, न्‍यूयॉर्क ने छापा था, 2006 में दिल्‍ली के आकार ने पुनर्प्रकाशित किया है. संपादकों की छोटी-सी भूमिका के बाद पहला निबंध ‘व्‍यवस्‍थाविरोधी आंदोलन: इतिहास और संशयइमैनुएल वैलरस्‍टाइन ने लिखी है. (दूसरा लेख जोवान्‍नी अर्रिगी का है, ‘मार्क्सिस्‍ट सेंचुरी- अमेरिकन सेंचुरी: द मेकिंग एंड रीमेकिंग ऑव द वर्ल्‍ड लेबर मूवमेंट’; तीसरा, ‘द सोशल मूवमेंट्स इन द पेरिफ़ेरी: एन एंड टू नेशनल लिबरेशन?’, लिखवैया हैं: समिर अमीन; फिर आंद्रे गुंडर फ्रैंक और मार्ता फ्युंतेस लिखते हैं, ‘सिविल डेमोक्रेसी: सोशल मूवमेंट्स इन रिसेंट वर्ल्‍ड हिस्‍टरी’; अंतिम निबंध ‘अ फ़्रेंडली डिबेट’ के नाम से संपादक मंडल का कन्‍क्लूज़न है).. मैं वैलरस्‍टाइन वाले पहले निबंध से गुजर रहा था. वैलरस्‍टाइन साहब अपने लंबे और दिलचस्‍प लेख में (जिसके लिखे जाने तक गोर्बाचोव बाबू अभी पदच्‍यूत नहीं हुए रहिन) कुछ मज़ेदार विभाजन करते हैं, तो कहीं-कहीं दिल को तक़लीफ़ देनेवाले सरलीकरण (एक ही निबंध में सबकुछ सम-अप करने की मज़बूरी में?).. आइए, कुछों पर एक नज़र फिराया जाये..

लेख का पहला खंड है- 'व्‍यवस्‍थाविरोधी आंदोलनों का जन्‍म और रणनीति संबंधी डिबेट, 1789-1945’.. तो यहां कुछ महत्‍वपूर्ण ऐतिहासिक उठानों को वैलरस्‍टाइन साहब तिथियों की संगति में समझने व वैश्विक स्‍तर पर उनके महत्‍व को समझाने की कोशिश करते हैं.. 1789, 1830, 1848, 1870, 1914, 1945 ये वे ख़ास तिथियां थीं जिनके गिर्द घटनेवाली घटनाएं, अपनी स्थानीयता से परे दुनियावी स्‍तर पर, सामाजिक-राजनीतिक बदलाव का विचार बनाने में महत्‍वपूर्ण साबित हुईं.. निबंधकार बताते हैं लोगों में शोषण के विरोध का तत्‍व हमेशा होता है. जितना वे कर सकते हैं उसका वे एक्टिव विरोध करते हैं, जितना ज़रूरी होता है पैसिवली उसे झेलते हैं. 1789 से 1945 का समय काम की स्थिति में बेहतरी, सामाजिक बराबरी और समाजवादी आकांक्षाओं की मांगों के सांगठनिक मुश्किलों की एक लंबी यात्रा थी. यह एक मुश्किल लड़ाई थी, जिसमें आमतौर पर, दुनिया का एक बहुत बड़ा हिस्‍सा खुद को शोषित महसूस करता था. 1945 इस लिहाज़ से एक बड़ा मनोवैज्ञानिक परिवर्तनकारी बिंदु साबित हुआ. ऐसा क्‍यों? ऐसा इसलिए कि उन्‍नीसवीं सदी से ज़ारी व्‍यवस्थाविरोधी आंदोलन अंतत: अब एक ऐसे बिंदु पहुंचा जो उनके पूर्ववर्ती सभी संघर्षों की भरपाई करता दिख रहा था. फ़्रांसीसी क्रांति से जिस सीक्‍वेंस की शुरुआत हुई थी, जिस कड़ी में पहले राजसत्‍ता की प्राप्ति होनी थी, फिर उस सत्‍ता का समाज बदलने में (मतलब क्रांति के स्‍वतंत्रता, बराबरी और बंधुत्‍व पाने की दिशा में) इस्‍तेमाल होना था.. उस मुकाम की दहलीज़ खुल रही थी..

जिस सामान्‍य अर्थ में हम आज ‘विश्‍व’ का तीन हिस्‍सों में वर्तमान विभाजन देखते हैं.. वह यथार्थ भी, अपने आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक नीहितार्थों में, 1945 के ठीक बाद से ही हमारे स्‍मृतिपटल पर स्‍थायी होना शुरू हुआ. इसमें जहां एक ओर पश्चिम का औद्दोगिक संसार था (जिसमें मुख्‍यत: पश्चिमी यूरोप, उत्‍तरी अमरीका और ऑस्‍ट्रेलेशिया थे; मगर, 1970 के बाद से जापान भी), तो दूसरी धुरी समाजवादी मुल्‍क थे (सोवियत रूसी गणराज्‍य, पूर्वी यूरोप, चीन, उत्‍तरी कोरिया, तीन इंडोचीनी राज्‍य; और हां, क्‍यूबा); और तीसरा विभाजन था तीसरी दुनिया (एशिया, अफ्रीका और लातिनी अमरीकी महादेश).. आनेवाले वर्षों के इस निर्णायक विभाजन की 1945 महत्‍वपूर्ण धुरी बनी.. क्‍या महती परिवर्तन हुआ था वैश्विक समाज में?.. और आंदोलनों की धार को कहां मजबूत किया जाना था?.. इसके बारे में एक-दो किस्‍तों में अभी और बात करेंगे.. रवि गडि़या को धन्‍यवाद देते हुए..

(क्रमश:)

ओ सलम.. भोजपुरी में

कौआ खिरकी पर हम बिछौना में, तुम केने हो, सलम?
देह रुसाइल है जांगर थकायल है मगर मन का का करें, बुच्‍चन,
मन में ढिठाई है देमाग में मिठाई है.
छुच्‍छल जीभ हेलाते हैं कमरी में गोर हिलाते हैं.
तुम वे-आऊट सुझाय नहीं रहे, सलम, कमरी में गोर सटाय नहीं रहे?
मालूम है, कहोगे, डागदरजी डांटेंगे नया परची फारेंगे.
चार दिन का मुसीबत चौदह होगा, बेबाती का गदहपचीसी होगा
अर्र-बर्र सोचेंगे और भर्र-भर्र रोयेंगे.
जही चाहते हैं कि टंटा और बर्हे?
चुपचाप पटाये नहीं रह सकते, हेल्‍दी थिंकिंग से मन सजाये नहीं रह सकते?
जेही तो मुसीबत है, बुच्‍चन, सरल-सीधा बोल के हमको टेर्हा-टेर्हा फंसाते हो
मुंह का मिठाई बनने का जगह, ओ सलम, दूर हमसे जाते हो?

Tuesday, November 27, 2007

बेजी बोली बेमरीया देह में एत्‍ता मत लिखो, बाद में रोने लगोगे.. त् बेजीजी से छमा मांगते हुए..

रामजीत राय व्‍याहता बेबी कुमारी राय का सखी सकीना को हाले-दिल का ख़त..

तुम्‍मो नंबर एक का चोट्टि‍ये ठहरी, बतजात! ई कवनो बतायेवाला बात था जो तोराके खबर करते? एक त् मुंह अप्‍पने गोर, ऊपर से लईलीं करीयर चदरिया ओढ़! एक त् अइसे ही दुनिया-जेहान का नजर देख-देख के करेजा जर रहा है.. घामा-अंधेरिया कहिंयो बइठते हैं देमाग टनटनाने लगता है, अऊर तू पूछती है, तोराके चिट्ठी काहे नै लिखे! अरे, कवनो लिखेवाला बात होता तब न तोराके खत-चिट्ठी लिखते रे, मुंहजार?..

मन एकदम्‍मे भात में कंकर माफिक करर-करर हो गया है, सकीनिया, सच्‍चो में! बुझइबे नै करता है कवन करवट ठाड़ा हों, बइठें, कि कवनो गड़हा-गड़ही में कूदके जीवनलीला का दी एंटिंग बोल लें! तू समझेगी हम जोकिन-चुटकुला बोलके जी ठंडाय रहे हैं, लेकिन नहीं, हम करेजा का एंटियर हकीकत खोल रहे हैं, सखी! हकीकत हेहर-होहर उड़के जो तोहरा लगे ले चहुंपा है ऊ रीयल हकीकत नै न है, सहेली.. समाज-सोसायटी ला काजे असल हकीकत कहंवा ले चहुंपेगा.. असल हकीकत त् हमरा करेजा का दस किवाड़ी का भीतरी लुकाइल बइठल है! अऊर ऊ हकीकत ऊ नै है जो दुनिया-जेहान बोल रहा है, जेकरा खबर तोको मुश्‍तकिन के साथी से सुने को मिला..

अब तू बोलेगी हम कौची बास्‍ते एत्‍तागो बुझव्‍वल खेल रहे हैं? त् हमरा जइसन फूटल करम का मौगी बुझव्‍वल नै खेलेगी तो खोखो अऊर लुक्‍काछिप्‍पी खेलेगी, हो? एगे, फूटल करम नै होता जी त् सभा-सोसाइटी में अइसा बदनामी झेलते जी? बेना अपराध का रोज-रोज सजा पाते? तू लिख दी हम पढ़ लिए मगर अऊर कवनो हमरा मुंह का सामना आके बोले कि हम अपराध किये हैं, हम ऊ मुंहजार का मुंह नै नोंच लिए त् अपना बाप का असल छौंड़ी नै, हां?..

हां, रे सकीनिया, सच्‍चो में.. तू ही बोल ना, कवन अपराध है मेरा? अबाल्‍शन का टोटल नियूज झुट्ठल है.. एगे, पेट में बीज होगा तब न अबाल्‍शन होगा हो.. जब पेट में बीजे नै था त् कहंवा से और कौची का हम अपराध किये? हां, सखी, एगो तूहिये है जेकरा आगे हम अपना मन अऊर करेजा खोलके अपना जिनगानी का भेद ओजागर कै रहे हैं! राज को राजे रहने देना, नहीं त् ई सच्‍चाई जान लिये त् अल्‍जाम बड़ खूंखारीवाला करेंगे. हमरा किस्‍मते खराब है, परेम किये त् ऊ सकारथ नै हुआ.. अब एतना लंबा भकेसन के बाद इनका साथ-संगत हुआ त् हियां नवका टंटा! गड़ही-पोखर में बूड़के जान देवे वाला बात हम अइसे ही नै करते हैं, सखी! बहुत तोरासे मिलेके मन कै रहा है, मगर ई हाली में कहंवा निकलें, कइसे उजियाला का फेसिन करें?

तोहरी दुखियारी, तुमरे जलम-जलम की सहेली,
बेबी कुमारी राय

कस्‍बे में शहर..

बाहर से देखनेवाला कोई कहता कि उसकी आंखों में हिक़ारत भरी है तो शायद शहर की लड़की भी ताज्जुब करती. कहती- नो, यू आर रीडिंग मी रॉंग, इट्स जस्‍ट फ्लैट क्‍यूरिओसिटी, दैट्स ऑल! लेकिन शहर की लड़की क्‍यूरीयस से ज़्यादा टाईम किल कर रही थी. टाईम किल करनेवाले तरीके से ही सेलफ़ोन को अपने गालों पर बेमतलब घुमाते हुए बोली- तो जब उनके बारे में नहीं सोचती.. घर का काम नहीं होता.. तब क्‍या करती हो?..

शहर की लड़की की पैनी आंखों को अपना मुआयना करता देख कस्‍बे की लड़की यूं भी चौकन्‍ना थी.. सोचकर मुसकराते हुए

जवाब दिया- घर का इतना तो काम रहता है!.. फिर ठहरकर बोली- तुमलोगों की तरह खाली थोड़ी रहते हैं!..

सुनकर शहर की लड़की को अच्‍छा नहीं लगा, लेकिन उसने चेहरे पर अच्‍छा नहीं लगने के भाव आने नहीं दिये.. फ़ोन को होंठों से सटाकर बोली- लेकिन कभी तो खाली रहती होगी? जब रहती हो तब क्‍या करती हो?..

कस्‍बे की लड़की हंसने लगी.. देरतक हंसती रही.. मानो कोई मज़ेदार चुटकुला सुन लिया हो..

नॉट लाइक अ रेस्‍पोंसिबल हस्‍बैंड..

लंदन के इसलिंग्‍टन रोड पर वह इकलौती बर्मी कंपनी थी (ऊपर से मज़ा यह) जिसने अपने यहां वेलफ़ेयर का ज़ि‍म्‍मा एक जापानी को दे रखा था. इतिकावा सनकी था. उसने यूरोप में एज़ ऑव एनलाइटमेंट की पढ़ाई नहीं की थी मगर घड़ी देखने की तर्ज़ पर लॉजिक और कॉमन सेंस देखकर हर काम करता. इसीलिए ऐसा हुआ कि महीने भर से छुट्टी के लिए उसके पीछे कांख रहे मैट और क्रेग (जिन्‍होंने अबकी मध्‍य-पूर्व की टहल की योजना बनायी थी) सिर घुनते रह गए, उन्‍हें नहीं मिली.. छुट्टी मिली दफ़्तर के लावारिस, गुमनाम हिन्‍दुस्‍तानी जयकांत पंडा को जिसने पहले ही मान लिया था इस वर्ष मां-बाप का चेहरा देखना किस्‍मत में नहीं लिखा..

तनाव और झुंझलाहट के असर में जयकांत ने गुरुदासपुर की पंजाबी पत्‍नी सोहन के आगे छुट्टी की बात तक नहीं उठाई थी. इसीलिए रसेल स्‍क्‍वेयर के ट्यूब से बाहर आने पर पत्‍नी के दिखते ही उसने उसे हर्षातिरेक में सूचित किया कि महीने भर की नहीं लेकिन बीस दिन की छुट्टी मिल गयी है.. तीन दिन पाईं गां जाई गांर लोको आऊ मां-बपा संगे रहीबा कू हेब्‍ब.. फिर उन्‍हें साथ लेकर बाकी के दिन भाई श्रीकांत के यहां मौज़-तफ़रीह करके बितायेंगे!

सुनकर सोहन एकदम-से खुश हुई और फिर उसी तेज़ी से उसके चेहरे का रंग उड़ भी गया. - और मम्‍मी-पापा? मेरा गुरुदासपुर?- वह चिंहुककर पूछी तो पहले जयकांत पंडा को समझ नहीं आया.. फिर हकलाता वह बचाव की सोचने लगा.. ज़बरजस्‍ती मुस्‍कराने की कोशिश करता यह भी सोचता रहा कि इतिकावा साहब की आंखों में वह एक वाजिब कारीग़र भले बन गया हो, सोहन की नज़रों में रेस्‍पोंसिबल हस्‍बैंड बनने में, शादी के दस वर्षों बाद, वह अभी भी फ़ेल क्‍यों होता रहता है?..

Monday, November 26, 2007

अदर कलर्स ऑव ए लेखक्स लेखकीय लाईफ़..

“बर्फ़”, “इस्‍तानबुल”, “मेरा नाम लाल है” और “काली किताब” के लिखवैया जनाब ओरहान पामुक की नयी किताब का अंग्रेजी अनुवाद बाज़ार में आ गया है. किताब का नाम है- “अन्‍य रंग: निबंध और एक कहानी”. जैसाकि तहलका के ताज़ा अंक में किताब की समीक्षा करते हुए संपुर्ण चटर्जी ने लिखा है.. पामुक की आखिरी किताब “इस्‍तानबुल” जहां इस वाक्‍य पर खत्‍म होती है कि “मैं एक कलाकार नहीं होना चाहता.. मैं एक लेखक बनूंगा.” अन्‍य रंग शुरू ही इस वाक्‍य से होती है कि “मैं तीस वर्षों से लिख रहा हूं.” तो किताब इन गुजरे तीस वर्षों की दुनिया की जिज्ञासा, उल्‍लास, जिजीविषा, और लिखाई के विविध रंगों के बहुरुपी, बहुविध कोने-अंतरों की झलकियां हैं. किताब के दूसरे हिस्‍से “बुक्‍स एंड रीडिंग” वाले खंड में पामुक लिखते हैं- “उपन्‍यास उतनी ही कीमती हैं जितना कि वह जीवन के आकार और प्रकृति के संबंध में सवाल उठाती हैं.

अन्‍य रंग के प्रेस किट से:

From Orhan Pamuk, winner of the 2006 Nobel Prize in Literature, comes a personal selection of his best work from the past twenty-five years. ‘I have come to see the work of literature less as narrating the world than “seeing the world with words”. From the moment he begins to use words like colours in a painting, a writer can begin to see how wondrous and surprising the world is, and he breaks the bones of language to find his own voice. For this he needs paper, a pen, and the optimism of a child looking at the world for the first time.’

Other Colours ranges from lyrical autobiography to essays on literature and culture, from humour to political analysis, from delicate evocations of Pamuk’s friendship with his daughter to provocative discussions of Eastern and Western art. It ends with his Nobel Lecture, ‘My Father’s Suitcase’, a brilliant and moving illumination of what it means to be a writer.

किताब फेबर एंड फेबर ने छापी है, कीमत है चार सौ पंचानबे रुपये. लहे तो उठा लीजिए.

हूं का भूगोल..

फूल हूं धूल हूं मौक़े पे बबूल हूं.
अपहचानी सौगात हूं उलझी हुई बात हूं
दिखते-दिखते दिखी गुम गई ऐसी अंधेरिया सियह रात हूं.
ग़रीबी का गड्ढा हूं घोड़े की लीद औ' अपनी मट्टी पलीद हूं.
शायद मामूली घिसी हुई लकड़ी का पट्टा हूं मगर शायद
कभी भी चल जाये वैसा देशी कट्टा भी हूं.
दायें से बायें में उल्‍टा नहाये तीन कदम
आंय और पांच कदम बांय हूं.
आईने में मुंह बाये अलबल गाये हूं.
हंसी में उड़ाये हूं रोते-रोते चुपाये
बिनबुलायी महफ़ि‍ल में आये हूं.
सुलगती रात में परछाई हूं अजन्‍मे बच्‍चे की दाई हूं.
कहें तो आपकी लोरी हूं लंगोटिया यार हूं वर्ना
क्‍या है न पक सकनेवाली खिचड़ी हूं
चूल्‍हे में बरसात की सीली लकड़ी हूं.

Sunday, November 25, 2007

हड़बड़ बैचेनियों की इतवारी कला..

आप नीचे उकेरी रेखाओं, रंगों को कला-टला का नाम से नवाज़े जाने से एतराज़ करें तो आपके एतराज़ से हमें ऐसा विशेष एतराज़ न होगा.. क्‍योंकि इस तरह (या किसी भी तरह की टकसाली कला से) सबसे ज्‍यादा एतराज़ खुद हमें होता है.. तो वह सब ठीक है.. बात दरअसल यह है कि कल अभय के एक अविनाश के जवाबी मेल फ़ॉरवर्ड को देखने के बाद हमारा मूड ज़रा बहका-उड़ा-उड़ा-सा है.. अविनाश के तौर-तरीके से दुखी होने से कहीं हम डिप्रेस ज्‍यादा होते रहे.. इस तरह की सोच की लकीरें बहुत मेरे पल्‍ले नहीं पड़तीं.. जितना पड़ती हैं वह यही बताती है कि सहोदर सामाजिकता की कितनी स्‍पष्‍ट सीमायें और व्‍यर्थतायें हैं.. इच्‍छा हुई दिल्‍ली में उड़ रहे चील को फ़ोन घुमाकर ज़रा बात करें.. फिर लगा कभी-कभी हम खुद से बात करना भी भारी महसूसने लगते हैं तो ऐसे वक़्त इस जहालत से क्‍या खाकर अभी संवाद करेंगे? करके और दुखी होने से ज्‍यादा और क्‍या कबारेंगे.. तो कबारने का ख़्याल छोड़, कुछ कला कोड़ने और गोड़ने लगे.. इंडियन इंक, जेल पेन और थोड़े एक्रिलक की छुवाइयों के साथ.. आपका गाली देने का मन करे तो उन्‍हें मेरी ओर फेंकने की बजाय, प्‍लीज़, दिल्‍ली की ओर उछालियेगा..

तस्‍वीर एक: रात में दु:स्‍वप्‍न..



तस्‍वीर दो: बीहड़ में यात्रायें..



तस्‍वीर तीन: सोचता हुआ आदमी..

Saturday, November 24, 2007

उत्‍तरआधुनिक हौले-हौले..

परिदृश्‍य बहुत डिप्रेसिंग है, दोस्‍तो. सुबह चेहरे से चादर हटाता हूं और आंखों के आगे डिप्रेसन का अनन्‍त विस्‍तार खुलने लगता है.. खुलता चला जाता है. इंजीनियरिंग की पढ़ाई अफ़लातून ने की है, अनूप शुक्‍ला ने की है.. अफ़लातून कहीं भी सस्‍ता शेर लिखने का बहाना खोजते रहते हैं, जबकि गीतवाद में नहाये अनूप डेंस व कॉम्‍प्‍लेक्‍स गद्य को न समझ पाने का.. जबकि इंजीनियरिंग न पढ़के मैं स्‍ट्रक्‍चरलिज़्म और मॉडर्ननिज़्म में मुंह मारके डिप्रेस होता रहता हूं.. व्‍हॉई? बिकॉज़ आई एम एज़ नॉलेजेबल एज़ नॉलेज़ इटसेल्‍फ़? बिकॉज़, एज़ एक्‍लेस्यितास सेज़- ‘..ही दैट इन्‍क्रीसेथ नॉलेज़, इन्‍क्रीसेथ सॉरो’? व्‍हॉई कांट आई बी अवे फ़्रॉम टाईटल्‍स लाइक- ज़ां फ्रांकुआ ल्‍योतार्द्स ‘द पॉस्‍टमार्डन कंडिशन: ए रिपोर्ट ऑन नॉलेज़ एंड बी अ हैप्‍पी पर्सन लाइक अनूप ड्रेंच्‍ड इन सॉंग्‍स एंड सॉनेट्स, एंड गो ऑन लिविंग इन अ हवेली काइंड ऑव हाऊस फ़ॉर हैपिली एवर आफ़्टर?.. लेकिन नहीं. कुछ लोगों के रहने के लिए हवेली है तो मेरे लिए हेल और होल! इज़ ईट फ़ेयर? दिल्‍ली के ज्‍यादातर पत्रकार दोस्‍तों के घर की (आत्‍मा की तो रहने ही दीजिए!) बनावट ऐसी है कि क्‍या मजाल बैठक में सुबह सूरज की रोशनी चली आये! जबकि मेरी आत्‍मा में तो आती रहती है लेकिन बैठक में सूरज में रोशनी ले सकूं, इतनी जगह नहीं निकल पाती.. वहां की सारी जगह मेरी चिन्‍ताओं और ल्‍योतार्द के मेटानैरेटिव और माइक्रोनैरेटिव ने घेरी हुई है! फिर जबसे वापस बंबई लौटा हूं वर्तनी की अशुद्धियों का एक नया दु:ख जान खा रहा है. पैंतालीस को पैंतालिस लिख देता हूं और आयुर्वेदिक टैबलेट्स खाकर निश्चिंत रहता हूं.. व्हेयर शैल इट टेक मी? सर्टेनली नॉट टू अ बैटर अंडरस्‍टैंडिंग ऑव लैंग्‍वेज एंड लाईफ़?

ख़ैर, आइए, हिन्‍दी का पाखंड और अनुवाद की अपनी दिक्‍कतें उतार फेंककर ल्‍योतार्द की तार्किकता का कुछ आनंद लिया जाये. खांटी फ़्रेंच में नहीं, जिम पॉवेल की अनुदित अंग्रेजी में.. मगर पहले ज़रा बेसिक बैकग्राउंड..

बैंकग्राउंड अट्ठारहवीं सदी के एज़ ऑव एनलाइटमेंट के रीज़न व तार्किकता का है, जिसकी सामान्‍य धारणा थी कि अंततोगत्‍वा विज्ञान से अंधविश्‍वास छंटेंगे, तरक्‍की आयेगी.. दुनिया धुंधलकों से निकलकर सीधे विकास पथ पर जाएगी.. माने यह मेटानैरेटिव का समय था.. एक केंद्रीय धुरी वाला ग्रैंड नैरेटिव था.. विज्ञान व तरक्‍की के रास्‍ते समूची दुनिया को उसके गिर्द प्रोग्रैम्‍ड होकर आगे बढ़ना था.. मगर इसी विज्ञान की नींव पर हिटलर का ऑश्वित्‍ज़ खड़ा हुआ, हिरोशिमा और नागासाकी की आणविक तबाही हुई तो पहुंचा हुआ दर्शन व शास्‍त्री लोग विज्ञान और तरक्‍की को शंका से देखने लगे.. केंद्रित वैश्विक मेटानैरेटिव खंड-विखंडित होकर माइक्रोनैरेटिव के बहुविध बहाव में दुनिया को बहकाने लगा. वी डू व्‍हॉट वी डू, बिकॉज़ दैट्स द वे वी डू इट का दुनिया गाना गाने लगी. लोग सुनने और सराहने भी लगे.. ल्‍योतार्द इसी असमंजसी क्षण में कहीं अपना तर्क ठेलते हैं..

After all, applying science and reason to the construction of gas chambers and efficient railroad schedules, the Nazis exterminated millions of human beings. Did these people experience freedom and liberation?

And did science fulfill Hegel’s narrative of increasing knowledge? No. For physics has led us to the realization that electrons can travel two different paths through space simultaneously—or pass from one orbit to another crossing the space in between. A paradox! And how can we unfold the Unity of all Knowledge if our thought processes are not even able to comprehend how these things happen?

Because of disbelief in the metanarratives that had legitimized science, science no longer plays the role of a hero that would lead us slowly toward full freedom and absolute knowledge.

Question: But if science is no longer about finding truth—then what is it about?

Answer: When science encounters paradoxes, such as the electron goes opposite directions simultaneously, it abandons its search for decidable truth and seeks to legitimize itseld through performativity. Science stops asking, “What kind of research will unfold the laws of nature?” and begins asking, “What kind of research will work best?” And to “work best” means “What kind of research can generate more of the same kind of research? Can it perform? Can it produce more of the same kind of research?” So science is no longer concerned with truth but with performativity—performing—producing more of the same kind of research, because the more research you produce, the more proof you produce and the more you are seen as being right, the more money and power you get.

So when people no longer believe in metanarratives that legitimize science, science is then forced to legitimize itself..

बात घुस रही है भेजे में? कहां से घुसेगी.. गीत होती तो घुसती, सुबह-सुबह दर्शन घुसाना होता तो तहसील के दफ़्तर और बस अड्डे के पीछेवाली गली में रहकर आपने हाईस्‍कूल थोड़ी किया होता.. मेरे साथ पैरिस और वियेना टहलते होते.. ख़ैर, यह किस्‍सा यहीं खत्‍म नहीं हुआ है.. आगे और है ल्‍योतार्द और ज़्यां बॉदरिलार..

Friday, November 23, 2007

विमल ठुमर लाल को बधाई!

बहुत वर्ष गुज़रे.
प्रिसाइसली कहें तो ठीक-ठीक पैंतालिस वर्ष.
जैसाकि बाबू गजराज राव ने थोड़ी देर पहले सूचित किया, “सन् बासठ में आज ही के दिन विमलजी इस भूलोक में अवतरित हुए थे”..
सब मेरी तरह भाग्‍यवान नहीं होते कि देह और दिमाग़ दोनों भरपूर रूप से जवान बना रहे, तो विमल लाल के साथ भी यह तो हुआ ही है कि देह ज़रा फैल-फुला गई है, मगर मन अबहीं तलक अच्‍छे आलूदम की तरह रसेदार बना हुआ है.
हंसी भी नहीं गई है, जैसाकि तस्‍वीर में दिख ही रही है, तो यह बड़ी उप‍लब्धि है..
आप बधाई-टधाई जो देना हो, दे लें..
इसके पहले कि रात जवानी और बुढ़ापे से गुजरकर कहीं की कहीं और निकल जाये!

आउटलुक एक्‍सप्रेस वालो कोई मदद करो, भाईलोग?..

एक मुसीबत में फंसा हूं, दोस्‍तो. किसी के पास मुझे इससे निकालने का सुझाव हो तो प्‍लीज़, सुझाये. मुसीबत क्‍या है? मुसीबत ससुरी यह है कि नॉर्मल ब्राउज़र में अपने जी-मेल की चिट्ठी-पत्री देखने के साथ हम ज़रा थोड़ा-सा और एडवेंचरस हुए, और अपने जी-मेल अकाउंट को अपने आउटलुक एक्‍सप्रेस में भी नत्‍थी करने की कोशिश की.. ठीक? बात समझ में आ रही है ना? अब ये आउटलुक एक्‍सप्रेस, जो हमारे पुराने एमटीएनएन वाली मेल आईडी का डिफ़ॉल्‍ट मेल-बॉक्‍स था, है, वहां फ़ाईल के स्‍क्रॉल डाऊन में ‘आइडेंटिटीज़’ में जाकर ‘एड न्‍यू आइडेंटी’ में अपनी जी-मेल वाली नयी आइडेंटिटी जोड़ी. कुछ और जगहों पर थोड़ा-मोड़ा कन्फिगर करने के बाद अब ‘आइडेंटिटीज़’ से ठीक ऊपर ‘स्विच आइडेंटिटी’ वाले ऑप्‍शन से हम कभी भी पुराने-नये एमटीएनएन या जी-मेल किसी भी आईडी के चयन का मेल-बॉक्‍स खोल सकते हैं. तो यहां तक तो सब बड़ा फ़र्स्‍ट क्‍लास हो गया (अभय मियां की दया से, उनका शुक्रिया) मगर ज़रा आगे जाकर एक नयी, और बड़ी उलझन खड़ी हो गई. और उसका समाधान पूछने पर अभय बाबू ने भी असमर्थता में हाथ ऊपर खड़े कर दिये. अब बंधुवर, आपही में से किसी से ज्ञानदान की उम्‍मीद है.. रोशनी जलायें, दिशा दिखायें.. !

दिक्‍कत क्‍या है? तो दिक्‍कत प्‍यारो यह है कि आउटलुक एक्‍सप्रेस के अपने पुराने एमटीएनएल अकाउंट के जरिये ईनबॉक्‍स में जाकर जब मैं मेल रिसीव करता हूं तब तो वह जो कुछ नया मेल हो उसे रिसीव करने का काम जैसे नॉर्मली करना चाहिए, वैसे करता है, मगर अपने जी-मेल में मेरे घुसने के बाद, जैसे ही मैं सेंड/रिसीव को क्लिक करता हूं, ससुरी, हर मर्तबा, जी-मेल के तहखाने मे उतर चार सौ पचास पुराने मेल डाऊनलोड करना शुरू कर देती है. चलिए, एक बार डाऊनलोड करके अपना खेल खेल ले, तो ज़नाब, वह भी नहीं, हर बार वही खेल क-ख-ग के साथ शुरू होता है. मतलब? मान लीजिए हमारे जी-मेल के अकाउंट में पहले के चार सौ पचास मेल हैं, आउटलुक एक्‍सप्रेस के ईनबॉक्‍स ने जिसमें से दो सौ साठ आलरेडी डाऊनलोड कर लिया है, मगर अगली दफा वह फिर नये सिरे से उन सबको वापस डाऊनलोड करता दिखाती है! हद है!..

तो इस तरह अपने आउटलुक एक्‍सप्रेस के अकांउट से जी-मेल के अपने नये मेल को पाने का तो सवाल ही नहीं, अलबत्‍ता हर बार चार सौ पचास मेल डाऊनलोड करने के जाल में ज़रूर उलझने की मजबूरी बन गयी है. किसी की अक़ल में इस मुसीबत के समाधान की बत्‍ती जल रही है? कि मैं आउटलुक एक्‍सप्रेस के अपने जी-मेल अकाउंट में नया मेल पाऊं, पुराने बाबा आदम वाले पिटारे के बार-बार खुलने की ज़ि‍न्‍नात मजबूरी न हो?.. कोई रास्‍ता दिखाये माय-बाप?

ई इतना बड़ अनर्थ कइसे हो गया, सखी?..

रामजीत राय का रत्‍न खोयी बेबी कुमारी राय को सखी सकीना का पत्र..

हमरे अंधारे जीवन की एवलेडी टार्चलाईट, हरीयर सुगनी, चंदा की रोशनी! जुग-जुग जीओ. दूध नहाओ, पेटो फलो! लेकिन ई सब का सुन रहे हैं, बेबी? और सुनके कुच्‍छो नीमन नहीं लग रहा है, सच्‍चो में!.. ई कवनो बात हुआ, जी? ख़ुदा अपना से लग्‍गल फैमिली का संगे कभी अइसा करते हैं, सुने है कोई? हम तो नहिंये सुने हैं!..

मगर ई सब हुआ कइसे, बेबी सुगनी? दस रुपिय्या खरच कै जीतपुर का पोस्‍टआफिस पे हमरे नाम कोई चिट्ठी आईल है कि नहीं, चेकिन बास्‍ते गए रहे, ई धूप-घामा में देह का कितना गजन हुआ, तोको का बोलें, सखी, और हुआं चहुंपके पता चलल कि चिट्ठी त् नहींये आयल है, मगर मुश्तकिन के साथी भेंटा गये, उनहीं से तोहरे बाबत खबर पता चला! सुनके पहिले हमको त् यकीने नहीं हुआ, दांत का बीच जीभ दबा लिये, एक्‍सीटेंट और बिलिडिंग से कवनो तरह बच गए, ख़ैरीयत समझो.. लेकिन तू कैसी सखी है, बेबी? कि हमको इतना बड़का ख़बर मुश्‍तकिन का साथी बताये और तू एक अंतरदेसी भेजके नहीं बता सकती थी? काहे, बेबी, बोल न? हम जनाना लोग आपस का दुख आपसे में नहीं बांटेंगे त् ई ज़हान में कवन हमरा लोग का सुनवाई करेवाला है, बेबिया, बोल ना? मगर ई एत्‍ता बड़ा बात हो कइसे गया? तू त् गदबद, करेजा का मजबूत छौंड़ी है, रे? तब? तीने महीना में अबाल्‍शन कइसे हो गया? पेरगनेंसी का काम्पिलिटेशन का किस्‍सा पहिलहुं सुने हैं मगर अइसा कवनो केस तो हमरा नज़र से नहीं गुजरा कि मम्‍मी का हेल्‍थ, डेअलपमेंट सही है और बिगनिंग इस्‍टेज में बच्‍चा गड़बड़ा जाये? ऊ रामजी भइया, प्रापर डाकदर-नर्स चेकिन-फिटिंग नहीं देख रहे थे, का हो? एतना बड़का मिसचांस, मिसकैरी हो कइसे गया, हमरा तो अक़ले नहीं काम कर रहा?..

का बोलती है, हम तोहरा देखभाल बास्‍ते चल आवें? मगर इहंवा घर में भी तो खाना-पानी देखे खातिर केकरो रहे के दरकार है. ई भट्टावाला काम छोड़ दिहिन हैं और आजकल घरे में रहते हैं. फिर वही संझा-सकाली दारु का खेल! हमरा त् यहिये सब सोच-सोचके वजन गिर रहा है! डेलाइबर साहब का जाने कवन बात हुआ हियां झगड़ा कै के हैदराबाद चल गए है. दू महीना से हुवें पड़े हैं. ओको सोच-सोचके भी वजन डाऊन हो रहा है.. उन्‍हीं का चिट्ठी का मोह में त् हम पोस्‍टआफिस गए थे! दस दिन से कवनो खोज है न ख़बर.. और अब ऊपरी से तुमरा बैड निऊस.. एगो छोटा जिन्‍दगानी में जनाना कवनची-कवनची बरदाश्‍त करे, ख़ुदा?..

अपना खोज-खबर और देह का हाली का डिटेलिन में जल्‍दी से जल्‍दी ख़बर देना, सखी?

तोहरे ललकी टिकुली वाले दमकते मुखड़ा को मन में बसाये बइठी.. तोहरे सुनर हेल्‍थ का दुआ मांगती

तोहरी ज़ि‍न्‍दगानी की राज़दार,
सकीना

चीन की दीवार.. ये गिरी वो गिरी!

देखिए, डायरी की बात चली और असल काम की चीज़ कहना रह ही गया! काम की चीज़ यह कि दिल्‍ली प्रवास की इस लम्‍बी अवधि के सारे समय मैं इसी मुगालते में था कि मेरी चीन यात्रा वाली डायरी किसी मोहतरमा ने उड़वा ली है. (और किस वजह से उड़वातीं? सिर्फ़ इसीलिए उड़वाया, जैसा मैं सोच और समझ पा रहा था, कि बेग़म न केवल गाओपिंग को पसन्‍द नहीं कर पा रही थीं; उस बेचारी गंवार और ज़ाहिल औरत से तहेदिल नफ़रत करने लगी थीं. अब अभय की निर्मलता चाहे जो कहे, औरतों का मन इसी तरह से काम करता है, इसका हम और आप क्‍या कर सकते हैं? आप बीच-बीच में दारु पी लेते हों मैं तो वह भी नहीं कर सकता. इन दिनों कॉफ़ी तक की मनाही है. डॉक्‍टर तक बेग़मजात है तो सर्द सांस ही ली जा सकती है. समझाया तो नहीं ही जा सकता. एनीवे, मैं अपनी चीन डायरी व दिल्‍लीवाली इन ख़ास मोहतरमा की बाबत कह रहा था. उनकी गाओपिंग से नफ़रत तो पहले की ही तरह बदस्‍तूर जारी है, मगर बंबई आकर बंदे को अपने जूते-चप्‍पलों के कंजास में, जहां वह अपने गुप्‍तधन छिपाकर रखता है, जूतों की एक जोड़ी गायब मिली, मगर हैरतअंगेज़ तरीके से डायरी का सूराग मिल गया! माने चीन वाली डायरी वहीं गायब जूतों के बीच पड़ी मिल गयी!..)

थोड़े समय के लिए मन हतप्रभ बना रहा (ऐसे मौकों पर बन ही जाता है) मगर डायरी के धूल खा रहे पन्‍नों को पलटते हुए- दरअसल पन्‍नों से ज्‍यादा चार-पांच सिगरेट फूंकने का बहाना पाकर सुखी व टेंस होते हुए- गाओपिंग, ज़ानसी, नानान और जाने क्‍या-क्‍या देखते, व पहचानते हुए शक़ की गुंजाइश ही नहीं थी कि मेरे हाथ में और कुछ नहीं मेरी खोयी हुई चीन डायरी ही है. हर्षातिरेक तो महसूस हो ही रहा था थोड़ी शर्म भी महसूस हो रही थी, क्‍योंकि डायरी के खो जाने की चिंता में मैं रवीश समेत राजधानी के ढेरों अन्‍य पत्रकार मित्रों से पहले ही झगड़ चुका था कि घंटा तुमलोगों के पहुंचे हुए पत्रकार होने पर धिक्‍कार है अगर मेरा अविस्‍मरणीय चीनी संस्‍मरण समेटे एक अदद डायरी तक न खुजवा सके? बेचैन होकर फ़ोन उठाते हुए और यह देखने के बाद कि फ़ोन पत्‍नी का है उसे तत्‍काल डिसकनेक्‍ट करते हुए रवीश ने बुदबुदाके आत्‍मस्‍वीकारोक्ति की भी थी कि इतना नाटक बतियाने की ज़रूरत नहीं, हिन्‍दी का पत्रकार होकर वह यूं भी धिक्‍करित हैं! फिर उन ख़ासमख़ास मोहतरमा से झगड़े का किस्‍सा तो पहले कह ही चुका हूं. गुस्‍से की रौ उखड़कर मैंने यहां तक कह दिया था कि अबे, आप प्राचीन परम्‍पराओं वाली अपने को हिन्‍दुस्‍तानी औरत कहती हो? किस मुंह से कहती हो? कि एक प्राचीन परम्‍पराओं वाली शराफ़त से लबरेज़ एक चीनी महिला के इकतरफ़ा प्रेम तक को नहीं बरदाश्‍त कर सकतीं?.. बरदाश्‍त तो नहीं ही कर सकती हैं, मगर देख रहा हूं डायरी उड़वाने वाली बात कोरी गप्‍प साबित हुई है..

ख़ैर, इस उलझे, बेमतलब जीवन में क्‍या गप क्‍या सच्‍चाई. काम की बात इतनी सी है कि चीन का बहुत सारा अनकहा छुटा रह गया है, और चीन में मौका-बेमौका जो कुछ मेरे साथ घटित होता रहा, या नहीं हो सका- उसके साथ-साथ इस पर्टिकुलर ‘’दिल्‍ली में डायरी खोयाई और बंबई में पाई’’ वाले हादसे को लेकर मैं जेनुइनली शर्मसार हूं. वैसे यह भी ऐसी तोप घटना नहीं है. असली तोप ख़बर यह है कि जल्‍दी ही चीन की बची हुई किस्‍तों की गोली आपकी ओर दागना शुरू करुंगा. उसके लिए धीरे-धीरे तैयार होना शुरू कीजिए.

Thursday, November 22, 2007

डायरी के भीतर क्‍या है?..

कभी आपने डायरी लिखी है? क्‍या बेहूदा सवाल पूछ रहा हूं. कविता और डायरियां किसने नहीं लिखीं? कुछ चमड़ी के मोटे (मेरी तरह), थेथर, बेहया लोग होते हैं.. उम्र के बीतने के साथ भी बाज नहीं आते.. मगर आमतौर पर जीवनानुभव व समझ में शर्मसार होते हुए लोगों का कविता लिखना छूटता जाता है. डायरी लिखना तो और पहले छूट चुका होता है.. (आपने आखिरी मर्तबा कब लिखी थी? सच बताइएगा)..

वैसे मैं कुछ ज्‍यादा ही सामान्‍यीकरण तो नहीं कर रहा? कर ही रहा होऊंगा. आप मन की परतें खोल ढंग से सूचित नहीं करेंगे तो अपने पास राय बनाने व तथ्‍य टीपने के रास्‍ते क्‍या बचते हैं?.. नहीं बचते हैं.. मसलन ‘’जीवन व समाज में चिंता का स्‍थान’’ के बारे में मेरा कुछ ऑपिनियन है.. बात उठते ही पंजा गाल और ठोढ़ी पर चला जाता है. आंखों में गंभीरता चली आती है.. हो सकता है आपके न आती हो? हो सकता है ‘’जीवन व समाज में चिंता का स्‍थान’’ का प्रसंग उठते ही आप मुस्‍कराने लगते हों? दांत दिखाने लगते हों? मैं नहीं कह रहा कि वाक़ई में दिखाते ही हैं.. मगर जबतक अपन वस्‍तुस्थिति को लेकर ढंग से सूचित नहीं होंगे, सच्‍चाई कुछ की कुछ तो हो ही सकती है? कि मैं कुछ समझे हुए हूं और आप चमड़ी के मोटे न होकर भी डायरी लिखे मार रहे हों?..

अब ज़रा इस तथ्‍य पर गौर कीजिए.. स्‍टेशनरी की दुकानों के काउंटर व बाहर पटरी पर डायरियां थोक की थोक सजनी शुरू हो गई हैं.. तो हर वर्ष ऐसे ही थोड़ी सज जाती हैं?.. लोग आकर खरीदते होंगे इसीलिए सजती हैं.. और खरीदनेवाले सब मोटी चमड़ी के ही होंगे, या जुम्‍मा-जुम्‍मा जीवन का स्‍वाद लेना शुरू किये युवजन होंगे, ऐसा तो नहीं होगा.. होगा भी तो, कम से कम मुझे मानने में संकोच हो रहा है.. और लोग खरीदते हैं तो बारहों महीने न भी सही, कुछेक महीने तो ज़रूर ही उसके पृष्‍ठों पर वृतांतों की दर्ज़गी होती होगी? भई, सब हमारी तरह असमंजस और व्‍यर्थताबोध में थोड़ी गिरफ़्तार होंगे.. क्‍यों होंगे? अर्थपूर्ण, ऊटपटांग कुछ का कुछ तो लिखा ही जा रहा होगा? आज ‘स’ फिर दिखी, उन नज़रों की ताप में मैं सारे दिन दफ़्तर की एसी में जलता रहा. शाम को घर लौटते हुए भी, विदाऊट एसी. रात के खाने का इंतज़ार करते हुए भी आंखों के आगे ‘स’ की वही नज़रें तैरती रहीं. ‘द’ के पास पांच क्रेडिट कार्ड्स हैं और अब वह हमेशा हंसता रहता है! क्‍यों हंसता रहता है बहन.... क्‍या रेड्डी के बाद सचमुच वही प्रोमोट होनेवाला है? पापाजी इंदौर में मुन्‍नी के यहां इलाज के बाद हफ़्ते भर के लिए मेरे पास आने की ज़ि‍द कर रहे हैं, उन्‍हें रखूंगा कहां? व्‍हॉट एन ईडियट पापाजी इज़..

यही सब या और कुछ? अब डायरी में काहिरा, दमासकस, फ़ि‍लीस्‍तीन की ताज़ा हालत, दुनिया में आतंकवाद या परवेज़ मुशरर्फ़ के भविष्‍य की चिंता तो नहीं ही होनेवाली. वह तो हिंदी पत्रिकाओं के पृष्‍ठों पर भी महज़ परिपाटी के नाम पर होती है. तो फिर डायरियों में उनके पीछे कोई व्‍यर्थ में क्‍यों कांखे? फिर किसपे कांखे? आप कुछ बता नहीं रहे और मैं जाने क्‍या-क्‍या सोचकर जला जा रहा हूं..

Wednesday, November 21, 2007

नानान के लिए एक तुकबंदी..



बत्‍तख बड़ी बदमाश है
कादो-पांकी के पास है
ओहो पीला ठोर नचाती है
पक्-पक् बहुत सुनाती है
देखो, कादो के छींटे तीन पड़े
पियराये पंखों पे बड़े महीन जड़े
अलबल हिंयां से हुआं डुगराती है
मस्‍त धूल औ’ पानी उड़ाती है
अभी यहां घाम में खड़ी
पलक झपके फूस के छत पे चढ़ी
मइय्या, देखो, अब डुगरा के साइकिल पे गिरी
कैरियर पे बैलेंस बनाये आंख चियारे ससुरी
नटखट की नानी
जाने समझे खुद को
क्‍यों इत्‍ती सयानी
चाची की चईली खायेगी
सब बूझ जाएगी
भागके दड़बे में
होश अपने ठिकाने पाएगी.

भोजपुरी में आधुनिक..

एटीच्‍यूड मत दीजिए. प्‍लीज़. क्‍योंकि वह मेरे पास भी है. पर्याप्‍त मात्रा में है. मैं भोजपुरी में आधुनिक होने की कोशिश कर रहा हूं, और चूंकि इससे पहले ऐसे किसी आधुनिकत्‍व की परम्‍परा नहीं है (परम्‍परा क्‍या, ककहरा भी नहीं है), तो विचार क्‍या वर्तनी की शुद्धता तक पर मेरा कितना नियंत्रण होगा, मैं आश्‍वस्‍त नहीं; मात्र इसीलिए आप मुझपर चढ़ जायेंगे और एटीच्‍यूड देंगे (और मैं ले लूंगा?) तो इसकी ग़लतफ़हमी में मत रहिए. किसी की ग़लतफ़हमी में मत रहिए. फिर चाहता क्‍या हूं? आपसे? भोजपुरी में आधुनिकबोध का आनन्‍द लीजिए, और मुक्‍तहस्‍त मेरी तारीफ़ कीजिए. चलिए?

केकरा खातिर एहर-ओहर के धूल खईनी
जांगर चलवनी
देह धुंकवनी
कपड़ा चिरवइनी
तोहरा खातिर, हे प्रीतम तोहरा खातिर

केकरा खातिर पामुक के पन्‍ना घोंटनी
बोदेलियर के पाठ कईनी
ई वाद अऊर ऊ दर्शन
के परायन में भइली पुरईंनी
लागा चुनरी में दाग से दूर रहिके
चुनरी में दाग़ लगवनी
तोहरा खातिर, हे बालम तोहरा खातिर

केकरा खातिर मन औंजौंवनी
केकरा खातिर चैन लुटौवनी
केकरा खातिर घर फूंकनी
केकरा खातिर फक़ीरी ओढ़नी
तोहरा खातिर, हे साजन तोहरा खातिर.

Tuesday, November 20, 2007

नानान के बहाने ये कैसा मनमोहिनी खेल?..

जीवन में यही सब उल्‍टी-सीधी चीज़ें होती हैं. ज्‍यादा उल्‍टी. (सीधी होती हैं? कहीं होती होंगी तो मेरे यहां आकर उलट क्‍यों जाती हैं? या उन्‍हें लेते-पाते हुए मैं उल्‍टा क्‍यों, कैसे हो जाता हूं?.. ओह, इतने लम्‍बे अवकाशोपरांत वापस अपने कंप्‍यूटर का अपना की-बोर्ड हाथ आया और मैं, देखिए, कैसी उल्‍टी बहक बहक रहा हूं! क्‍यों बहक रहा हूं? कोई मुझे रोकेगा नहीं? टोकेगा? आप हाथ नहीं पकड़ि‍येगा? चलिए, मुंह ही पकड़ लीजिए)..

ख़ैर, बात यह है कि किसी नेक़दिल मित्र के यहां से होती हुए एक ग़ुमनाम मगर पहचानी हुई एक चिट्ठी पास पहुंची है. पहले एक नज़र आप भी मार लीजिए तब बात आगे बढ़ाते हैं. तो चिट्ठी का मज़मून है:


अजांग के लिए

प्रिय अज़ांग,

किसी ने बताया आपकी तबियत अच्छी नहीं है। बहुत खराब लगा। आप अकेला महसूस कर रहे होंगे। आना चाहती हूँ ....ऐसे में नहीं आई तो बेटियाँ किस काम की। अब आपकी तबियत कैसी है? मैं आपके लिये रोज़ पूजा करती हूँ जैसे आपने सिखाई थी। आप अपना ध्यान रखिये। जल्दी अच्छे हो जाइये। कहते हैं प्रसन्न मन हो तो ऐसे शरीर में रोग भी नहीं टिकता। सही कहते हैं क्या?

हो सकेगा तो मिलने ज़रूर आऊँगी।

आपकी
नानान


पढ़ लिया? मेरी तबियत का पूछ रही है. कहती है मेरे लिए पूजा करती है जैसी मैंने सिखाई थी! भइया, जीवन में जिसने कभी पूजा की नहीं उसने दो वर्ष की एक बच्‍ची को पूजा कैसे और कहां से सीखा दी? (वैसे मैंने तो नानान को अपनी नाक नोंचना और कपड़े खराब करना भी नहीं सिखाया था! हरामख़ोर चाची या उसकी वह बदजात मां गाओपिंग थी जिससे बेचारी भोली बच्‍ची इन दुगुर्णों की शिक्षा पाई होगी.. मुझसे तो प्‍यार और संस्‍कार ही पाती रही.. और फिर न पाने के लिए जुदा हो गई बेचारी! ओह, मेरे दिल की दुलरनी नानान कुसुम!)..

देखिए, किस चतुराई से नादान नानान के कंधे पर रखकर गोली दाग़ी जा रही है! एक नन्‍हीं बच्‍ची के शब्‍द लगते हैं ये? सवाल ही नहीं उठता. इनकी व्‍यस्‍कता अनक्‍वेश्‍चनेबल है! हां, यह सवाल ज़रूर है कि सेवाभाव की नक़ाबी आड़ में गाओपिंग को ऐसे लम्‍बे अंतराल पर एक बीमार से इस तरह प्रणय निवेदन करने की आवश्‍यकता क्‍यों पड़ी? और करनी ही पड़ी तो वह सीधे अपने अंतरंग मनोभाव मुझे प्रेषित नहीं कर सकती थी? या स्त्रियों का प्रणय, या कैसा भी निवेदन इसी तरह एम्‍बीगुअस बना रहता है? रहेगा? हमेशा?.. या कहीं ऐसा तो नहीं कि इस हितचिंता के पीछे गाओपिंग भी नहीं, अपनी पहचान छिपाती कोई अन्‍य नक़ाबधारी ताक़त छिपी बैठी है? (या खड़ी है सोयी है व्‍हाटेवर?) आई एम इंट्रिग्‍ड. हाऊ टू कैच द कलप्रिट? कोई आइडिया है आपके पास?..

Wednesday, November 14, 2007

नोंदिग्राम, नोंदिग्राम..



आमार नाम, तोमार नाम
नोंदिग्राम, नोंदिग्राम

बाइने देखो, दाइने देखो
बोम-गोलार माइने देखो

जारा बुझछे ना तारा बुझबे ना
बोझार किछु बेचे आछे ना
सिंदुरी रोक्‍ते तिक्‍त कांदार मोद्दे
ओरा लेखिये दियेछे
ओर दू कोड़ि‍र राजनीतिर दाम

बिचारेर भ्रांति, हताहत शांति
नांगादेर नांगा नाच
लागाओ लागाम!
नोंदिग्राम, नोंदिग्राम!!

Monday, November 12, 2007

अबे, अपने को दोस्‍त कहते हो? मज़ाक करते हो? अबे, फिर..?

जैसा बीमारी में, और बीमारों के साथ अक्‍सर होता है, हर गुजरते मिनट में देह दुख महसूसती है, और न दिखे तो होता ही है, और भूले से कोई दोस्‍त सामने पड़ गया तो उस पर गुस्‍सा उफनता है- कि ससुर, अपने को दोस्‍त कहते हो? अबे, धिक्‍कार है! हम यहां लेटे-लेटे आं-आं कर रहे हैं और तुम साले, कानपुर वनडेयर देख रहे हो और घेंवड़ा अपने को हमारा दोस्‍त बताते हो? आइंदा फ़ोन किये तो हाथ का फ़ोन खींचके अपना नंबर डिलीट न कै दिये तो घंटा दोस्‍त न हुए, हां.. आदि-आदि और इसी तरह का और भी काफी सारा बमगोला..

ऐसा नहीं है कि आज के ठेलमपेली व्‍यस्‍त जीवन में इससे किसी दोस्‍त-टोस्‍त को विशेष फर्क पड़ता है, मगर अपनी तरफ से सामाजिक रवायत की एक अदाबाजी हो जाती है.. दोस्‍त मियां भी हेंहें-ठेंठे के साथ एक लाईन कहने का बहाना पा लेते हैं कि पिरमोद भाई, आप भी घंटा बेबात का बतंगड़ बनाते हो.. चार दिन की तफ़रीह की जगह में चालीस दिन ठेलोगे तो बीमार नहीं पड़ोगे तो क्‍या कमानी ऑडिटोरियम में रोज़ शाम सितार ही सुनते रहोगे? उज़बेकी राजकुंअर नहीं हो, स्‍ट्रगलिंग आर्टिस्‍ट हो, तो जीवन मज़ा थोड़े है? कला से हारे हुए हो तो जीवन भी बीच-बीच में धार पे लेती ही रहेगी, है कि नै? हेंहें-ठेंठें.. मैं सन्‍न हुआ सुनूंगा और सोचूंगा कि ससुर, ऐसे दोस्‍त की तरफ चप्‍पल फेंकूं, या चप्‍पल सहेजे सिर के नीचे तकिया बनाये, चदरी में मुड़ी लुकाये गां-गों करता समय गुजार दूं?..

वैसे ज्‍यादातर वही कर रहा था.. समय ही गुजार रहा था.. इस और उस करवट लेता.. गंदे चादरों की महक सहेजता.. दोस्‍तों के मैत्रीभाव व जीवन से लगातार धन्‍य, बाग़-बाग़ होता..

वैसे दोस्‍त ही समय सार्थक करते रहे हों ऐसा नहीं.. मैंने भी बहुतों के यहां फ़ोन की घंटी घुमाके अदाबाजी के खेल किये, कि और गुरु, अकेले-अकेले दही पी रहे हो, हमें साथ लेकर किसी दिन बैठना नहीं है, हां?.. और सामनेवाले ने गड़बड़ाके, हड़बड़ाके जवाब दिया- अरे, क्‍या बात करते हैं, सरजी, कल मिलते हैं ना?.. और फिर सामनेवाले सहोदर का नहीं, हमारा ही कल नहीं आया.. जो आया वह ज्‍वैंडिस लेकर आया और हम हांफते-कांखते हुए इस साइकिल रिक्‍शा पे चढ़के अस्‍पताल जा रहे थे, और उस साइकिल रिक्‍शा से उतरकर अपने टेस्‍ट देखकर स्‍वयं को और दिल्‍ली में अपनी तिमारदारी को धिक्‍कार रहे थे.. अचानक अपनी चिंता हो रही थी, उन अपॉयंटमेंट्स की नहीं जो हमने बायें-दायें ले-दे रखी थीं..

ख़ैर, इससे यह कहना छूट नहीं जाता कि दोस्‍त हरामी हैं.. वह तो वे हैं ही.. सारी दुनिया हो रही है.. फिर दोस्‍त जाति काहे पीछे रहे? अच्‍छी बात यह है सुबह पांच बजे हमें नींद नहीं आ रही (ओह, कैसी सुखकारी अनुभूति है!), और देह में इतनी ताकत आ गयी है (मन में तो थी ही) कि ये सारे मार्मिक मर्मभेदी भाव की-बोर्ड पर तल्‍लीनता से उच्‍चार सकें! और इसके सब बुरे ही बुरे पहलू हों, ऐसा भी नहीं.. कमसेकम फिलहाल, इस एकाध घंटे की चैतन्‍यता में एक तो दीख ही गया.. इधर-उधर की आवारागर्दी में रवीश के ब्‍लॉग पर नज़र मारी, और पिछले कईएक दिनों के पोस्‍टों का जायज़ा लेकर मन ज़रा संतुष्‍ट हुआ कि पिछले दिनों की अफ़सरी ने रवीश बाबू का चाम पूरी तरह अभी मोटा नहीं किया है.. बहुत सारी जीवंत चिंतायें अभी भी वाजिब तरीके से वाजिब पैमाने में बाहर आ रही हैं! मोगांबो नहीं हूं लेकिन फिर भी खुश हुआ.. आपने भी नहीं देखा हो तो एक नज़र ज़रा लौटकर फिर से रवीश पंचांग पलट लें.. मन तरेगा.. हमारी तरह आप भी इस सुन्‍न अनमनेपन में कुछ दिमागी ताकत पाएंगे.

Friday, November 9, 2007

लेटे-लेटे दुनिया..

बीमारी के बहाने की आड़ ही सही, लेटे-लेटे कुछ ठीकठाक दिन निकल गए. ऐसा नहीं है कि लेटने से हमें कोई गुरेज हो. पुराना अरमान था कि लेटे-लेटे कुछ लंबी यात्राएं करते, कुछ महान लोकोपकारी कार्यों को अंजाम देते. अभी जब लेटे रहना ही मजबूरी बना हुआ है तो, देखिए, सारी क्रियेटिविटी घुस गई है. दिमाग में जो-जैसा भी लोकोपकारी विचार-वन जगमग-जगमग होना था, सब सूना-अंधारे में पड़ा है. आधे और घंटे भर की छोटी झपकियों के अधबीच जब कभी आंख खुलती है तो चादर से बाहर अलसाये निकले पैरों पर उच्‍च विचार दौड़ते नहीं दीखते; अमूर्तन में किन्‍हीं मूसकराज का बिम्‍ब झिलमिलाता है. पूंछ, मूंछ और रफ, रेशेदार देह की किरकिरी स्‍नेहाटें.. उनींदी नाक के सोते-जगते में सामने का वायुप्रदेश भी ऐसी ही उलझी-झंकझंक का विस्‍तृत असुविधाप्रदेश बना रहता है.. देह की जान दरकने का अंदाज़ था, लेकिन दिमाग के जान की हवा भी यूं पंक्‍चर होगी, इसे आंखों के आगे इस तरह लेटे-लेटे देखना बड़ा कम्‍फर्टेबल नहीं मगर देख तो रहा ही हूं.. लेटे-लेटे..

Saturday, November 3, 2007

जाड़े की चमकीली सुबह में औंजाईन..

कितनी सारी केंचुलों के नीचे पस्‍त, निढाल लेटा हूं. आंख खुलती है तो हवा के रसायन सूंघता हूं. किसी भारी अजगर की तरह हुमसकर फैलता हूं, भरभराकर गिरता हूं.

रोज़ वही जवाब दोहराता मैं आज़ि‍ज़ आया, रोज़ वही सवाल पूछते तुम भी थके. हमारे बीच का थका हुआ रोज़ हमसे परे कितना जीवंत, चमकदार रोज़-रोज़.

मुन्‍नी, देखो तुम बोलीं और नहीं आयीं. निमकी आयी न हमारे गोड़ का दबना न तुम्‍हारी गोदी का आराम न चिल्‍ल-चिल्‍ल न सस्‍ते तेल की महक देखो, कुछ नहीं आया और मैं फ़रेबी, पाजी अभी भी राह तक रहा हूं.

Thursday, November 1, 2007

हिंदी में इंटेलेक्‍चुअल कौन है?..

है कोई माई का लाल? इंटुलेक्‍चुअल? उसकी औलाद ही सही? कोई तो होगा?.. सोचिए, सोचिए. देर तक सोचते रहिएगा.. मगर सोच पाइएगा? सक्षम हैं? माने इतना इंटेलेक्‍ट है कि ढंग से सोच पाएंगे? वेरी डाऊटफुल.. फिर? फिर क्‍या.. सोचते रहिए, मगर उससे कुछ उखड़ना-कबरना खास होना नहीं (ओह, कितना गुस्‍सा आ रहा है.. क्‍यों आ रहा है? इसीलिए न कि यह खाक़सार है, और इस अमूर्त अनंत के अति लघु, क्षुद्र जीवों में, आप सबों में, अन्‍य कोई नहीं- इंटेलेक्‍चुअल!.. सो, अंधों में काना किंग होने की एकांतिकता, अकेलेपन की कठोर-घोर अनुभूति, मन में गुस्‍से की फुंकार, चाबुक की फटकार चमकाएगी ही. वेरी नैचुरल..)

ढंग से विषय शुरू होने के पहले ही विषयांतर कर रहा हूं. क्‍यों कर रहा हूं? इसलिए कि हिंदी का इंटेलेक्‍चुअल हूं? ख़ैर, मुझसे अलग एक कोई तो होगा? कहीं तो होगा? दिल्‍ली-बंबई में नहीं, बिलासपुर में हो, बोकारो में? या कलकत्‍ते में? टांगरा के किसी पुराने चीनी को विस्‍थापित किये; पुराने मकान पर नया रंग-रोगन चढ़ाये प्रॉपरली सेटल्‍ड एंड बल्जिंग टू गो? माईट बी अ पॉसिबलिटी.. व्‍हॉई नॉट? इज़ प्रियंकर अवर सैड एंड फ़ॉल गाय? इज़ ही लिविंग इन ओल्‍ड ऑक्‍युपायड हाऊस इन ओल्‍ड टांगरा विद् एन ओल्‍ड चायनीज़ वुमन? (ओह, गॉड.. पुअर प्रियंकर.. गॉड ब्‍लेस हिम..)

व्‍हॉई सो मच ऑव विषयांतर? कांट वन (मीनिंग मी) स्टिक टू सैंट्रलिटी ऑव अ सिंपल थीम?..

इंटेलेक्‍चुअल होना बुद्धिजीवी होना नहीं. बुद्धिजीवी इंटेलेक्‍चुअल का वाजिब अनुवाद नहीं. जिसने किया होगा चिरकुट होगा, ऐसे ही नहीं है कि हिंदी इंटेलेक्‍ट की ऐसी कारुणिक दशा है. क्‍योंकि हिंदी इंटेलेक्‍चुअल जीवी भले ढेरों चीजों का हो, बुद्धि-आश्रित तो कतई नहीं होता. होना नहीं भी चाहिए. जैसाकि पिछले दिनों स्‍वामी उदय जी सही ही फरमा रहे थे- हिंदी सज-धज को बुद्धि से कौ काम? आप एक सिंपल फैक्‍ट क्‍लैरिफाई कीजिए. जैसा हमारे एक पुराने हितैषी पिछले दिनों चिंता में अलल-बलल बकने लगे थे कि बताइए, बताइए, हिंदी में इन दिनों कौन-सा काल चल रहा है? आधुनिक, उत्‍तर-आधुनिक कि दक्षिण-आधुनिक, बोलिए, बोलिए? मैंने कहा, ससुर, यह सब बुड़बकई आप से बतियाएंगे, और नोट काटेंगे मिस्‍टर एस पचौरी? इतना अकिल रहता तो आप अपना गंदा चेहरा का गंदा खजुआहट हमारे आगे निकालने का जगह कोई सीनियर मार्केटिंग में सीरियस पैसा काट रहे होते.. और हमरी सुबह का सत्‍यानाश नहीं कर रहे होते! हिंदी में कौन काल कल चल रहा है इसको तय करनेवाले घंटा आप कौन हुए? कितना गो किताब लिखे हैं? कितना प्रकाशक लोग का गाड़ी आपको रिसीव और ड्रॉप करने पहुंचती रही है? हिंदी में कालनिर्णय इसपे निर्भर करता है कि निर्णय करनेवाली पार्टी खुद कितना कालजयी है. बाबू नामबर हुए.. और श्रोतागण का उत्‍साह थोड़ा गुदगुदाइन हुआ तो अपनी चदरी में वे एक्‍के साथ मध्‍य, अधुना, उत्‍तर-अधुना सब हवा उड़ाये चलते हैं.. चलते हैं कि नहीं, बताइए?.. और ठहरे हुए वह भी जानते हैं, और सही ही जानते हैं कि हिंदी में अभी ही नहीं, आनेवाले वर्षों-वर्षों तक प्राचीन, प्राक्-आधुनिक काल ही चलते रहनेवाला है!..

जर्मनी में एक पहुंचे हुए विद्वान रहे. असल बुद्धिजीवी. वॉल्‍टर वेंन्‍यामिन. किताबों के बड़े पहुंचे रसिक. बहुत प्‍यारी-प्‍यारी पहुंची हुई चीजें लिखीं. एक बड़ी उम्‍दा पहुंची हुई चीज़ सन् 1936 में लिखी थी. चर्चित निबंध. समूची पढ़ी-लिखी दुनिया में लोग कभी न कभी उनके चर्चित निबंध 'आर्ट इन द एज़ ऑव द मैकनिकल रिप्रॉडक्‍शन' पर लौटते ही रहते हैं. बिना लौटे राह नहीं निकलती. मगर हिंदी में बात अलग है. बिना लौटे, आये, गाये सब तरह से निकल जाती है. राह. वॉल्‍टर वेंन्‍यामिन और उनका लिखा जाये चूल्‍हे में. ऐसा है, बंधु, कि हिंदी का हिसाब-किताब सचमुच ही अलग है..

एनीवे, देखिए, फिर विषयांतर हो गया. अब हो गया तो हो गया, आप क्‍या उखाड़ लीजिएगा. अलबत्‍ता सवाल बचा रहता ही है कि मेरे सिवा हिंदी में इंटेलेक्‍चुअल कौन. बड़ा सीधा फ़ॉर्मूला है. जो वेदोपनिषद से दो सूत्र, मानस से चार दोहा और गांधी, रवींद्र, निराला की एक-एक पंक्ति सही-सही क्‍वोट कर ले, वह हो चुका हिंदी का इंटेलेक्‍चुअल. मैं नहीं कर पाता, बाज मर्तबा खुद को ही सही-सही नहीं क्‍वोट कर पाता, मगर वह इतर प्रसंग है. उस पर फिर कभी..

(ऊपर का चित्र: बुद्धि-वैभव की व्‍यथाकथा वॉल्‍टर वेन्‍यामिन, 1892-1940)

पेट साफ़ रखने के पक्ष में कुछ स्‍ट्रेट सुझाव..

जैसा बोओगे, वैसा काटोगे. मिर्ची खाओगे तो मिर्ची हगोगे. सिंपल ह्यूमन ट्रूथ. इसमें कहीं कोई भारतीय रहस्‍यवाद नहीं. मगर भारत है तो रहस्‍यवाद कहीं न कहीं घुसना ही चाहिए. जैसे पिछले छह दिनों से मैं एक चिरकुट बीमारी मुक्ति की दवाइयां खा रहा था, मगर मुक्ति की जगह, बीमारी ही हग रहा था (वेरी पज़लिंग, नो?). कल दवाई खिड़की से बाहर फेंक दी, उसके बाद से एकदम रिलीव्‍ड महसूस कर रहा हूं (नॉट पज़लिंग एट ऑल!). समटाईम्‍स आई वंडर (मेरे साथ आप भी कर सकते हो..) एज़ इफ़ देयर इज़ अ स्‍ट्रेंज वे टू इंडियन रीयेलिटि (अंड़से पेट की बीमारी से रिलीव होने के बाद वंडरमेंट का नाटकीय तौर पर बढ़ जाना बड़ा स्‍वाभाविक है, अगेन, इट्ज़ वन ऑव दोज़ बेसिक ह्यूमन फ़ोलिज़, तो उसे ज़्यादा भाव देने की जगह, आइए, मूल विषय पर ही वापस लौटते हैं)...

बाबा नागार्जुन का एक बहुचर्चित क्‍वोट है- 'खाइएगा खेसाड़ी और हगिएगा कलाकन्‍द, ऐसा कैसे होगा?' बाबा का संदर्भ साहित्‍य की एक दूसरी समस्‍या के सिलसिले में रहा है, मैं उसे यहां लिखने-पढ़ने से जोड़कर कुछ बातें कहना चाहता हूं. सवाल उठता है सैकड़ों और हजारों की तादाद में अपने को साहित्‍यकार बतानेवाले बंधुगण (व बहिनीगण) जो बेगूसराय, बलिया, बिलासपुर से सैकड़ों व हजारों की तादाद में साहित्यिक-सांस्‍कृतिक झंडा बुलंद किए रहते हैं; दिल्‍ली व अन्‍य नगरों में छापेखानों में रिम पर रिम कागज़ कविताओं से काला होता रहता है, और भाईलोग जिसे 'अहा, कलाकन्‍द, ओहो, कलाकन्‍द!' कहते अघाते नहीं, मगर वास्‍तव में जो कलाकन्‍द तो क्‍या, खेसाड़ी का घटिया वर्ज़न भी नहीं, वह क्‍या सिर्फ़ इसीलिए कि हिंदी का वृहत्‍तर समाज कुपोषण प्रभावित है? लोगों ने अरसे से कलाकन्‍द खाना तो दूर कलाकन्‍द देखा भी नहीं है, बिना देखे कलाकन्‍द समझ खेसाड़ी खा रहे हैं, और नैचुरली, वही, हग रहे हैं? वेरी बिग पॉसिबलिटि.

क्‍या यह सचमुच आश्‍चर्य किंतु घोर सत्‍य है कि हिंदी का एक औसत रचनाकार सिर्फ़ खेसाड़ी पढ़ता है? मैंने श्री च, ग व त से इस संबंध में बातचीत की कि भइया, इस पोस्‍ट उदारीकरण व ग्‍लोबलाइज़ेशन के दौर में अब तो बाज़ार में काफी कुछ उपलब्‍ध है (तुम्‍हारे टेंट में नोट भी) तो खेसाड़ी खाते रहने की यह कैसी मजबूरी? कुछ तो दूसरे अनाज, अन्‍य फल-फूल का भी सेवन करते रहा करो? मगर जानकर घोर निराशा हुई कि खेसाड़ीवाली उनकी ज़ि‍द पूर्ववत बरकरार है. श्री च, ग व श्रीमान त ने अपना व अपने चार साथी रचनकारों की रचना से अलग कुछ भी पढ़ने में स्‍वयं को असमर्थ बताया. एक सज्‍जन भावुक होकर बोले पत्‍नी बहुत हल्‍ला करती है मगर मैं तो बेटी का टेक्‍स्‍टबुक तक नहीं पढ़ पाता! आजकल बच्‍चों की किताबें कितना मुश्किल हो गई हैं, आप समझ ही रहे हैं? दूसरे सज्‍जन ने कहा कुछ समय पहले तक वे पढ़ते थे, अब अख़बार भी नहीं पढ़ते, व्‍हॉट्ज़ द पॉयंट? अख़बार बिके हुए हैं. देश बिका हुआ है. मैंने खीझकर कहा और आपका साहित्‍य? तो दांत निपोरकर ठें-ठें करने लगे, कि अरे, वही तो हमारे जीवन का निर्दोष कलाकन्‍द है!

अब उन चिरकुट को मैं क्‍या कहता कि जिसे वह बता रहे थे वह कलाकन्‍द तो क्‍या, खेसाड़ी भी नहीं.. घास-फूस.. शायद बच्‍चे के बासी लेंड़ तक से गया-गुजरा है! मगर चूंकि यह हिंदी समाज है, रहस्‍यलोक का धूर्तवाद उंगलियों के पोर व साहित्‍य के छोर पर विराजता है, न केवल चिरकुटई खेसाड़ी की जगह बार-बार कलाकन्‍द कहकर गायी जाती रहेगी, बहुत बार कलाकन्‍द के नाम पर पुरस्‍कृत भी हो लेगी!

उम्‍मीद करता हूं आप चिरकुट सम्‍प्रदाय से नहीं हैं, और खेसाड़ी व कलाकन्‍द का फर्क़ करने की तमीज़ रखते हैं.. तो हमेशा इसका रोना रोने की जगह कि आजकल किसी चीज़ के लिए समय कहां मिलता है!.. बीच-बीच में ज़रा अपने मन लायक कलाकन्‍द खोजकर पढ़ लिया कीजिए.. उच्छिष्‍ट भी वही बाहर आएगा..