Thursday, November 1, 2007

पेट साफ़ रखने के पक्ष में कुछ स्‍ट्रेट सुझाव..

जैसा बोओगे, वैसा काटोगे. मिर्ची खाओगे तो मिर्ची हगोगे. सिंपल ह्यूमन ट्रूथ. इसमें कहीं कोई भारतीय रहस्‍यवाद नहीं. मगर भारत है तो रहस्‍यवाद कहीं न कहीं घुसना ही चाहिए. जैसे पिछले छह दिनों से मैं एक चिरकुट बीमारी मुक्ति की दवाइयां खा रहा था, मगर मुक्ति की जगह, बीमारी ही हग रहा था (वेरी पज़लिंग, नो?). कल दवाई खिड़की से बाहर फेंक दी, उसके बाद से एकदम रिलीव्‍ड महसूस कर रहा हूं (नॉट पज़लिंग एट ऑल!). समटाईम्‍स आई वंडर (मेरे साथ आप भी कर सकते हो..) एज़ इफ़ देयर इज़ अ स्‍ट्रेंज वे टू इंडियन रीयेलिटि (अंड़से पेट की बीमारी से रिलीव होने के बाद वंडरमेंट का नाटकीय तौर पर बढ़ जाना बड़ा स्‍वाभाविक है, अगेन, इट्ज़ वन ऑव दोज़ बेसिक ह्यूमन फ़ोलिज़, तो उसे ज़्यादा भाव देने की जगह, आइए, मूल विषय पर ही वापस लौटते हैं)...

बाबा नागार्जुन का एक बहुचर्चित क्‍वोट है- 'खाइएगा खेसाड़ी और हगिएगा कलाकन्‍द, ऐसा कैसे होगा?' बाबा का संदर्भ साहित्‍य की एक दूसरी समस्‍या के सिलसिले में रहा है, मैं उसे यहां लिखने-पढ़ने से जोड़कर कुछ बातें कहना चाहता हूं. सवाल उठता है सैकड़ों और हजारों की तादाद में अपने को साहित्‍यकार बतानेवाले बंधुगण (व बहिनीगण) जो बेगूसराय, बलिया, बिलासपुर से सैकड़ों व हजारों की तादाद में साहित्यिक-सांस्‍कृतिक झंडा बुलंद किए रहते हैं; दिल्‍ली व अन्‍य नगरों में छापेखानों में रिम पर रिम कागज़ कविताओं से काला होता रहता है, और भाईलोग जिसे 'अहा, कलाकन्‍द, ओहो, कलाकन्‍द!' कहते अघाते नहीं, मगर वास्‍तव में जो कलाकन्‍द तो क्‍या, खेसाड़ी का घटिया वर्ज़न भी नहीं, वह क्‍या सिर्फ़ इसीलिए कि हिंदी का वृहत्‍तर समाज कुपोषण प्रभावित है? लोगों ने अरसे से कलाकन्‍द खाना तो दूर कलाकन्‍द देखा भी नहीं है, बिना देखे कलाकन्‍द समझ खेसाड़ी खा रहे हैं, और नैचुरली, वही, हग रहे हैं? वेरी बिग पॉसिबलिटि.

क्‍या यह सचमुच आश्‍चर्य किंतु घोर सत्‍य है कि हिंदी का एक औसत रचनाकार सिर्फ़ खेसाड़ी पढ़ता है? मैंने श्री च, ग व त से इस संबंध में बातचीत की कि भइया, इस पोस्‍ट उदारीकरण व ग्‍लोबलाइज़ेशन के दौर में अब तो बाज़ार में काफी कुछ उपलब्‍ध है (तुम्‍हारे टेंट में नोट भी) तो खेसाड़ी खाते रहने की यह कैसी मजबूरी? कुछ तो दूसरे अनाज, अन्‍य फल-फूल का भी सेवन करते रहा करो? मगर जानकर घोर निराशा हुई कि खेसाड़ीवाली उनकी ज़ि‍द पूर्ववत बरकरार है. श्री च, ग व श्रीमान त ने अपना व अपने चार साथी रचनकारों की रचना से अलग कुछ भी पढ़ने में स्‍वयं को असमर्थ बताया. एक सज्‍जन भावुक होकर बोले पत्‍नी बहुत हल्‍ला करती है मगर मैं तो बेटी का टेक्‍स्‍टबुक तक नहीं पढ़ पाता! आजकल बच्‍चों की किताबें कितना मुश्किल हो गई हैं, आप समझ ही रहे हैं? दूसरे सज्‍जन ने कहा कुछ समय पहले तक वे पढ़ते थे, अब अख़बार भी नहीं पढ़ते, व्‍हॉट्ज़ द पॉयंट? अख़बार बिके हुए हैं. देश बिका हुआ है. मैंने खीझकर कहा और आपका साहित्‍य? तो दांत निपोरकर ठें-ठें करने लगे, कि अरे, वही तो हमारे जीवन का निर्दोष कलाकन्‍द है!

अब उन चिरकुट को मैं क्‍या कहता कि जिसे वह बता रहे थे वह कलाकन्‍द तो क्‍या, खेसाड़ी भी नहीं.. घास-फूस.. शायद बच्‍चे के बासी लेंड़ तक से गया-गुजरा है! मगर चूंकि यह हिंदी समाज है, रहस्‍यलोक का धूर्तवाद उंगलियों के पोर व साहित्‍य के छोर पर विराजता है, न केवल चिरकुटई खेसाड़ी की जगह बार-बार कलाकन्‍द कहकर गायी जाती रहेगी, बहुत बार कलाकन्‍द के नाम पर पुरस्‍कृत भी हो लेगी!

उम्‍मीद करता हूं आप चिरकुट सम्‍प्रदाय से नहीं हैं, और खेसाड़ी व कलाकन्‍द का फर्क़ करने की तमीज़ रखते हैं.. तो हमेशा इसका रोना रोने की जगह कि आजकल किसी चीज़ के लिए समय कहां मिलता है!.. बीच-बीच में ज़रा अपने मन लायक कलाकन्‍द खोजकर पढ़ लिया कीजिए.. उच्छिष्‍ट भी वही बाहर आएगा..

12 comments:

  1. उनका क्या करेंगे - जो खाते हैं फाइव स्टार हगते हैं साम्यवादी!

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  2. अजदक भाई
    पहली बात तो यह कि यह वाक्य बाबा नागार्जुन का नहीं एक कहावत है....
    दूसरी यह कि आपकी पोस्ट ने चिरकीन की याद दिला दी आज की मेरी पोस्ट पढ़े....

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  3. The visionary lies to himself, the liar only to others.
    नीत्से के इस वचन का हिन्दी की चिरकुटाई के अनुरूप (वर्तमान संदर्भ में )अनुवाद करूँ तो होगा - विद्वान ज्ञान का फल खाता खुद के लिये है मगर हगता दूसरों के लिये है ।

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  4. आप क्या कह रहे हैं.. आज कल हम ब्लॉग के अलावा कुछ नहीं पढ़ते.. टिप्पणी चाहने और उस की आस में करने के बाद कहाँ कुछ समय बचता है.. आप तो लगता है पार हो गए..फिर भी टिप्या रहा हूँ.. थोड़ा बहुत बचे हों तो हो जायं..

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  5. अभय जी से सहमति है लेकिन आप कलाकंद के पारखी जान पड़ते हैं कृपया कुछ उत्तम कला-कंदों का पता बताइये. ताकि हम भी आनंदित हो सकें.हमें तो अभी तक पहचानने तक की भी शऊर नहीं है जी.और ये मजाक नहीं है जी.

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  6. ही ही ही... मैं तो अजदकी साहित्य आजकल यहीं पढ़ता हूँ. और सोचता हूं कि आज नहीं तो कल थोड़ी बहुत मात्रा में मैं भी कुछ अजदकी हगना सीख जाऊंगा :)

    हिन्दी साहित्य की तथाकथित पत्र-पत्रिकाओं की घोर अपठनीय सामग्री पर क़रारा व्यंग्य.

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  7. हम कलाकंद का इलाका अलवर का बहुतै फ़ेमस कॉलेज़ में पढाई-लिखाई किया हूं . बहुतै कलाकंदी समय रहा ऊ . कलाकंद खाते रहे अउर खिलाते रहे . पर एतना समझ लीजिए कि जो कलाकंद खाते हैं,ऊ बिदमान-पुरुष,बल्कि पुरुष नहीं महापुरुष ही कउन-सा कलाकंद हगते हैं . हिंदी का बुद्धिजीवी को शाप लगा है,ऊ कुछ भी खाये......

    ई टिप्पणी ग्रेजुएशन का साथी प्रदीप पंचोली को याद करते हुए लिख रहा हूं . ओहका एक्सपर्टीज़ रहा बिना टका-पइसा दिये कलाकंद लाने में . कबहूं लिखेंगे ऊ कहानी . अबहीं ऊ पंचोली साहब वरिष्ठ अध्यापक हैं उहां .विद्यार्थी लोगन को इस क्षेत्र में कौनो गुरु-मंत्र दिए हैं कि नहीं पता नहीं .

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  8. क्या कलाकंदी पोस्ट है। :)

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  9. क्या कलाकंदी पोस्ट है। :)

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  10. pet saf rakhne ke paksh.....'खाइएगा खेसाड़ी और हगिएगा कलाकन्‍द, ऐसा कैसे होगा?'
    bahut badia likhle bani pramod babu....

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  11. per saf rakhne ke........
    bahut badhia ba........

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  12. thanx pramod ji...................
    पेट साफ़ रखने के पक्ष में कुछ स्‍ट्रेट सुझाव..ke liye.

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