Thursday, November 1, 2007

हिंदी में इंटेलेक्‍चुअल कौन है?..

है कोई माई का लाल? इंटुलेक्‍चुअल? उसकी औलाद ही सही? कोई तो होगा?.. सोचिए, सोचिए. देर तक सोचते रहिएगा.. मगर सोच पाइएगा? सक्षम हैं? माने इतना इंटेलेक्‍ट है कि ढंग से सोच पाएंगे? वेरी डाऊटफुल.. फिर? फिर क्‍या.. सोचते रहिए, मगर उससे कुछ उखड़ना-कबरना खास होना नहीं (ओह, कितना गुस्‍सा आ रहा है.. क्‍यों आ रहा है? इसीलिए न कि यह खाक़सार है, और इस अमूर्त अनंत के अति लघु, क्षुद्र जीवों में, आप सबों में, अन्‍य कोई नहीं- इंटेलेक्‍चुअल!.. सो, अंधों में काना किंग होने की एकांतिकता, अकेलेपन की कठोर-घोर अनुभूति, मन में गुस्‍से की फुंकार, चाबुक की फटकार चमकाएगी ही. वेरी नैचुरल..)

ढंग से विषय शुरू होने के पहले ही विषयांतर कर रहा हूं. क्‍यों कर रहा हूं? इसलिए कि हिंदी का इंटेलेक्‍चुअल हूं? ख़ैर, मुझसे अलग एक कोई तो होगा? कहीं तो होगा? दिल्‍ली-बंबई में नहीं, बिलासपुर में हो, बोकारो में? या कलकत्‍ते में? टांगरा के किसी पुराने चीनी को विस्‍थापित किये; पुराने मकान पर नया रंग-रोगन चढ़ाये प्रॉपरली सेटल्‍ड एंड बल्जिंग टू गो? माईट बी अ पॉसिबलिटी.. व्‍हॉई नॉट? इज़ प्रियंकर अवर सैड एंड फ़ॉल गाय? इज़ ही लिविंग इन ओल्‍ड ऑक्‍युपायड हाऊस इन ओल्‍ड टांगरा विद् एन ओल्‍ड चायनीज़ वुमन? (ओह, गॉड.. पुअर प्रियंकर.. गॉड ब्‍लेस हिम..)

व्‍हॉई सो मच ऑव विषयांतर? कांट वन (मीनिंग मी) स्टिक टू सैंट्रलिटी ऑव अ सिंपल थीम?..

इंटेलेक्‍चुअल होना बुद्धिजीवी होना नहीं. बुद्धिजीवी इंटेलेक्‍चुअल का वाजिब अनुवाद नहीं. जिसने किया होगा चिरकुट होगा, ऐसे ही नहीं है कि हिंदी इंटेलेक्‍ट की ऐसी कारुणिक दशा है. क्‍योंकि हिंदी इंटेलेक्‍चुअल जीवी भले ढेरों चीजों का हो, बुद्धि-आश्रित तो कतई नहीं होता. होना नहीं भी चाहिए. जैसाकि पिछले दिनों स्‍वामी उदय जी सही ही फरमा रहे थे- हिंदी सज-धज को बुद्धि से कौ काम? आप एक सिंपल फैक्‍ट क्‍लैरिफाई कीजिए. जैसा हमारे एक पुराने हितैषी पिछले दिनों चिंता में अलल-बलल बकने लगे थे कि बताइए, बताइए, हिंदी में इन दिनों कौन-सा काल चल रहा है? आधुनिक, उत्‍तर-आधुनिक कि दक्षिण-आधुनिक, बोलिए, बोलिए? मैंने कहा, ससुर, यह सब बुड़बकई आप से बतियाएंगे, और नोट काटेंगे मिस्‍टर एस पचौरी? इतना अकिल रहता तो आप अपना गंदा चेहरा का गंदा खजुआहट हमारे आगे निकालने का जगह कोई सीनियर मार्केटिंग में सीरियस पैसा काट रहे होते.. और हमरी सुबह का सत्‍यानाश नहीं कर रहे होते! हिंदी में कौन काल कल चल रहा है इसको तय करनेवाले घंटा आप कौन हुए? कितना गो किताब लिखे हैं? कितना प्रकाशक लोग का गाड़ी आपको रिसीव और ड्रॉप करने पहुंचती रही है? हिंदी में कालनिर्णय इसपे निर्भर करता है कि निर्णय करनेवाली पार्टी खुद कितना कालजयी है. बाबू नामबर हुए.. और श्रोतागण का उत्‍साह थोड़ा गुदगुदाइन हुआ तो अपनी चदरी में वे एक्‍के साथ मध्‍य, अधुना, उत्‍तर-अधुना सब हवा उड़ाये चलते हैं.. चलते हैं कि नहीं, बताइए?.. और ठहरे हुए वह भी जानते हैं, और सही ही जानते हैं कि हिंदी में अभी ही नहीं, आनेवाले वर्षों-वर्षों तक प्राचीन, प्राक्-आधुनिक काल ही चलते रहनेवाला है!..

जर्मनी में एक पहुंचे हुए विद्वान रहे. असल बुद्धिजीवी. वॉल्‍टर वेंन्‍यामिन. किताबों के बड़े पहुंचे रसिक. बहुत प्‍यारी-प्‍यारी पहुंची हुई चीजें लिखीं. एक बड़ी उम्‍दा पहुंची हुई चीज़ सन् 1936 में लिखी थी. चर्चित निबंध. समूची पढ़ी-लिखी दुनिया में लोग कभी न कभी उनके चर्चित निबंध 'आर्ट इन द एज़ ऑव द मैकनिकल रिप्रॉडक्‍शन' पर लौटते ही रहते हैं. बिना लौटे राह नहीं निकलती. मगर हिंदी में बात अलग है. बिना लौटे, आये, गाये सब तरह से निकल जाती है. राह. वॉल्‍टर वेंन्‍यामिन और उनका लिखा जाये चूल्‍हे में. ऐसा है, बंधु, कि हिंदी का हिसाब-किताब सचमुच ही अलग है..

एनीवे, देखिए, फिर विषयांतर हो गया. अब हो गया तो हो गया, आप क्‍या उखाड़ लीजिएगा. अलबत्‍ता सवाल बचा रहता ही है कि मेरे सिवा हिंदी में इंटेलेक्‍चुअल कौन. बड़ा सीधा फ़ॉर्मूला है. जो वेदोपनिषद से दो सूत्र, मानस से चार दोहा और गांधी, रवींद्र, निराला की एक-एक पंक्ति सही-सही क्‍वोट कर ले, वह हो चुका हिंदी का इंटेलेक्‍चुअल. मैं नहीं कर पाता, बाज मर्तबा खुद को ही सही-सही नहीं क्‍वोट कर पाता, मगर वह इतर प्रसंग है. उस पर फिर कभी..

(ऊपर का चित्र: बुद्धि-वैभव की व्‍यथाकथा वॉल्‍टर वेन्‍यामिन, 1892-1940)

8 comments:

  1. ई सब कोट तो हम भी कर सकते हैं जी इंटरनैट से टीप के ..का हमहुँ इंटलक्चुअल हैं..?? हमको ना बुझाता..तनि बुझायेंगे...

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  2. "सीधा नहीं सवाल , बड़ा ही जटिल प्रश्न है"

    लिखना-पढ़ना अच्छा लगता है. घर के छोटे छोटे अंतहीन कामों से छोटे छोटे पल निकाल जीवन के छोटे छोटे अनुभवों को कभी कलमबद्ध कर देते हैं , कभी किसी के अनुभवों को पढ़ते हैं.
    आज आपके चिट्ठे का आनन्द ले रहे हैं.

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  3. हे प्रभु अब इंटेलेक्चुअल होने की भी भाषा चुननी पड़ेगी....लेट मी थिंक....इंटेलेक्चुअल तो हूँ....पर हिंदी में....?!!

    प्रमोद जी कुछ और भी प्वाइंट्स दीजिये...सब मैच करके अभी बताती हूँ...आप अकेले इस शिखर पर ..कुछ अच्छा नहीं लग रहा!!

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  4. अजी! आप इण्टेलेक्चुअल नहीं हैं, हिन्दी में। आप हिन्दी में 'बुद्धिजीवी' हैं!!!!!

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  5. किसी होड़ में शामिल हुए बगैर मजा आता ही नहीं, इंसान की फितरत ही यही है। आप भी इंटेलेक्चुअलिज्म की होड़ आयोजित करने में जुट गए! यदि कोई चुनौती न दे तो आपकी खीज बढ़ सकती है। साबित कैसे करेंगे अपने आप को?

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  6. इंटेलेक्चुअल ? नारसिसिस्ट भी एक शब्द हुआ करता था .....

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  7. पता नहीं किस बारे में बात चल रही है!!!

    लगता तो कोई इन्टेल्क्चुअल ही है, जो बतियाये चला जा रहा है.

    मैं तो एक को ही जानता हूँ-कहीं ये वो ही तो नहीं-अपने, अरे अच्छा सा तो नाम है-हाँ, प्रमोद जी तो नहीं अजदक वाले.

    क्या पता. वो नहीं होंगे वो तो बुद्धिजीवी हैं...अरे नहीं नहीं-इन्टेल्क्चुअल ही है. पता नहीं!! मगर कुछ तो हैं...

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  8. इन्हा देखिये... हमरा कुल्ह इंटेलेक्ट जो है चुअल जा रहा है अउर आप जाने का खोजे में अझुराइअल हैं।

    अच्छा ऊ सब छोड़िये, ई बताइये कि आजकल हैं कहां? एक हफ्ता से आपका फोन दिन में सात बार ट्राइ कर रहे हैं मगर फोन है कि लगने का नाम ही नहीं ले रहा है। कुछ बेहद जरूरी बतकही करनी है आपसे... पहली फुर्सत में मेरे फोन की घंटी बजा दीजिये। बहुत जरूरी है। जरूरी बुझाय तो ई संवाद वाला अंश सम्पादित कर दीजियेगा।

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