Saturday, November 3, 2007

जाड़े की चमकीली सुबह में औंजाईन..

कितनी सारी केंचुलों के नीचे पस्‍त, निढाल लेटा हूं. आंख खुलती है तो हवा के रसायन सूंघता हूं. किसी भारी अजगर की तरह हुमसकर फैलता हूं, भरभराकर गिरता हूं.

रोज़ वही जवाब दोहराता मैं आज़ि‍ज़ आया, रोज़ वही सवाल पूछते तुम भी थके. हमारे बीच का थका हुआ रोज़ हमसे परे कितना जीवंत, चमकदार रोज़-रोज़.

मुन्‍नी, देखो तुम बोलीं और नहीं आयीं. निमकी आयी न हमारे गोड़ का दबना न तुम्‍हारी गोदी का आराम न चिल्‍ल-चिल्‍ल न सस्‍ते तेल की महक देखो, कुछ नहीं आया और मैं फ़रेबी, पाजी अभी भी राह तक रहा हूं.

5 comments:

  1. शिकायत मत कीजिए. मुन्नी ज़रूर आएगी.

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  2. आनंद आ गया ़़़ कसक भी हुई ़़़़शब्द अपनी औकात पार कर वहाँ पहुँचे जहाँ रहती हैं अनुभूति ।

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  3. आज आपके पिछले कुछ लेख पढे. काफी सधी हुई शैली है आपकी. हिंगलिश भी कहीं न कहीं कसक लिए हुए है.

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  4. Priy Pramod,
    Khoob Mooli khaiye aur jaldi tabiyat theek kariye.
    Filhaal Ranchi mein hoon. 8 ki shaam vapis lautunga tab baat hogi.
    Sanjay

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  5. u old dog, now i can't get thru to either of your phones. call when u can

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