Friday, November 9, 2007

लेटे-लेटे दुनिया..

बीमारी के बहाने की आड़ ही सही, लेटे-लेटे कुछ ठीकठाक दिन निकल गए. ऐसा नहीं है कि लेटने से हमें कोई गुरेज हो. पुराना अरमान था कि लेटे-लेटे कुछ लंबी यात्राएं करते, कुछ महान लोकोपकारी कार्यों को अंजाम देते. अभी जब लेटे रहना ही मजबूरी बना हुआ है तो, देखिए, सारी क्रियेटिविटी घुस गई है. दिमाग में जो-जैसा भी लोकोपकारी विचार-वन जगमग-जगमग होना था, सब सूना-अंधारे में पड़ा है. आधे और घंटे भर की छोटी झपकियों के अधबीच जब कभी आंख खुलती है तो चादर से बाहर अलसाये निकले पैरों पर उच्‍च विचार दौड़ते नहीं दीखते; अमूर्तन में किन्‍हीं मूसकराज का बिम्‍ब झिलमिलाता है. पूंछ, मूंछ और रफ, रेशेदार देह की किरकिरी स्‍नेहाटें.. उनींदी नाक के सोते-जगते में सामने का वायुप्रदेश भी ऐसी ही उलझी-झंकझंक का विस्‍तृत असुविधाप्रदेश बना रहता है.. देह की जान दरकने का अंदाज़ था, लेकिन दिमाग के जान की हवा भी यूं पंक्‍चर होगी, इसे आंखों के आगे इस तरह लेटे-लेटे देखना बड़ा कम्‍फर्टेबल नहीं मगर देख तो रहा ही हूं.. लेटे-लेटे..

1 comment:

  1. बहुत सुंदर और सारगर्भित !ज्योति - पर्व की ढेर सारी बधाईयाँ !

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