Monday, November 12, 2007

अबे, अपने को दोस्‍त कहते हो? मज़ाक करते हो? अबे, फिर..?

जैसा बीमारी में, और बीमारों के साथ अक्‍सर होता है, हर गुजरते मिनट में देह दुख महसूसती है, और न दिखे तो होता ही है, और भूले से कोई दोस्‍त सामने पड़ गया तो उस पर गुस्‍सा उफनता है- कि ससुर, अपने को दोस्‍त कहते हो? अबे, धिक्‍कार है! हम यहां लेटे-लेटे आं-आं कर रहे हैं और तुम साले, कानपुर वनडेयर देख रहे हो और घेंवड़ा अपने को हमारा दोस्‍त बताते हो? आइंदा फ़ोन किये तो हाथ का फ़ोन खींचके अपना नंबर डिलीट न कै दिये तो घंटा दोस्‍त न हुए, हां.. आदि-आदि और इसी तरह का और भी काफी सारा बमगोला..

ऐसा नहीं है कि आज के ठेलमपेली व्‍यस्‍त जीवन में इससे किसी दोस्‍त-टोस्‍त को विशेष फर्क पड़ता है, मगर अपनी तरफ से सामाजिक रवायत की एक अदाबाजी हो जाती है.. दोस्‍त मियां भी हेंहें-ठेंठे के साथ एक लाईन कहने का बहाना पा लेते हैं कि पिरमोद भाई, आप भी घंटा बेबात का बतंगड़ बनाते हो.. चार दिन की तफ़रीह की जगह में चालीस दिन ठेलोगे तो बीमार नहीं पड़ोगे तो क्‍या कमानी ऑडिटोरियम में रोज़ शाम सितार ही सुनते रहोगे? उज़बेकी राजकुंअर नहीं हो, स्‍ट्रगलिंग आर्टिस्‍ट हो, तो जीवन मज़ा थोड़े है? कला से हारे हुए हो तो जीवन भी बीच-बीच में धार पे लेती ही रहेगी, है कि नै? हेंहें-ठेंठें.. मैं सन्‍न हुआ सुनूंगा और सोचूंगा कि ससुर, ऐसे दोस्‍त की तरफ चप्‍पल फेंकूं, या चप्‍पल सहेजे सिर के नीचे तकिया बनाये, चदरी में मुड़ी लुकाये गां-गों करता समय गुजार दूं?..

वैसे ज्‍यादातर वही कर रहा था.. समय ही गुजार रहा था.. इस और उस करवट लेता.. गंदे चादरों की महक सहेजता.. दोस्‍तों के मैत्रीभाव व जीवन से लगातार धन्‍य, बाग़-बाग़ होता..

वैसे दोस्‍त ही समय सार्थक करते रहे हों ऐसा नहीं.. मैंने भी बहुतों के यहां फ़ोन की घंटी घुमाके अदाबाजी के खेल किये, कि और गुरु, अकेले-अकेले दही पी रहे हो, हमें साथ लेकर किसी दिन बैठना नहीं है, हां?.. और सामनेवाले ने गड़बड़ाके, हड़बड़ाके जवाब दिया- अरे, क्‍या बात करते हैं, सरजी, कल मिलते हैं ना?.. और फिर सामनेवाले सहोदर का नहीं, हमारा ही कल नहीं आया.. जो आया वह ज्‍वैंडिस लेकर आया और हम हांफते-कांखते हुए इस साइकिल रिक्‍शा पे चढ़के अस्‍पताल जा रहे थे, और उस साइकिल रिक्‍शा से उतरकर अपने टेस्‍ट देखकर स्‍वयं को और दिल्‍ली में अपनी तिमारदारी को धिक्‍कार रहे थे.. अचानक अपनी चिंता हो रही थी, उन अपॉयंटमेंट्स की नहीं जो हमने बायें-दायें ले-दे रखी थीं..

ख़ैर, इससे यह कहना छूट नहीं जाता कि दोस्‍त हरामी हैं.. वह तो वे हैं ही.. सारी दुनिया हो रही है.. फिर दोस्‍त जाति काहे पीछे रहे? अच्‍छी बात यह है सुबह पांच बजे हमें नींद नहीं आ रही (ओह, कैसी सुखकारी अनुभूति है!), और देह में इतनी ताकत आ गयी है (मन में तो थी ही) कि ये सारे मार्मिक मर्मभेदी भाव की-बोर्ड पर तल्‍लीनता से उच्‍चार सकें! और इसके सब बुरे ही बुरे पहलू हों, ऐसा भी नहीं.. कमसेकम फिलहाल, इस एकाध घंटे की चैतन्‍यता में एक तो दीख ही गया.. इधर-उधर की आवारागर्दी में रवीश के ब्‍लॉग पर नज़र मारी, और पिछले कईएक दिनों के पोस्‍टों का जायज़ा लेकर मन ज़रा संतुष्‍ट हुआ कि पिछले दिनों की अफ़सरी ने रवीश बाबू का चाम पूरी तरह अभी मोटा नहीं किया है.. बहुत सारी जीवंत चिंतायें अभी भी वाजिब तरीके से वाजिब पैमाने में बाहर आ रही हैं! मोगांबो नहीं हूं लेकिन फिर भी खुश हुआ.. आपने भी नहीं देखा हो तो एक नज़र ज़रा लौटकर फिर से रवीश पंचांग पलट लें.. मन तरेगा.. हमारी तरह आप भी इस सुन्‍न अनमनेपन में कुछ दिमागी ताकत पाएंगे.

2 comments:

  1. आप फिर से गरिया रहे हैं मतलब स्वस्थ हो रहे हैं... सही है.. जल्दी अच्छे हो जाइये..

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  2. क्या करें भाई जमाना ही ऐसा है.. सबकी अपनी अपनी परिभाषाये हैं दोस्ती की भी और दुश्मनी की भी..

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