Wednesday, November 21, 2007

नानान के लिए एक तुकबंदी..



बत्‍तख बड़ी बदमाश है
कादो-पांकी के पास है
ओहो पीला ठोर नचाती है
पक्-पक् बहुत सुनाती है
देखो, कादो के छींटे तीन पड़े
पियराये पंखों पे बड़े महीन जड़े
अलबल हिंयां से हुआं डुगराती है
मस्‍त धूल औ’ पानी उड़ाती है
अभी यहां घाम में खड़ी
पलक झपके फूस के छत पे चढ़ी
मइय्या, देखो, अब डुगरा के साइकिल पे गिरी
कैरियर पे बैलेंस बनाये आंख चियारे ससुरी
नटखट की नानी
जाने समझे खुद को
क्‍यों इत्‍ती सयानी
चाची की चईली खायेगी
सब बूझ जाएगी
भागके दड़बे में
होश अपने ठिकाने पाएगी.

5 comments:

  1. खूबसूरत रचना हैं अजदक जी

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  2. बहुत सुंदर।

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  3. फूस के छत पर लौकी की लतर ?
    किधर ?

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  4. चाची की चईली! बाप रे !
    नदी किनारे सांप रे !
    ओहका काटा नईं मांगे पानी ।

    ओ कत्तों नही समझे है
    कहानी का खुक्कल-पेंच
    प्रार्थना-फ़रियाद की बानी ।

    अब तो अल्लाह बचाए राम
    का करू कहां जाऊं
    ओ मेरी मोतियाबिंदी नानी !

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