Tuesday, November 20, 2007

नानान के बहाने ये कैसा मनमोहिनी खेल?..

जीवन में यही सब उल्‍टी-सीधी चीज़ें होती हैं. ज्‍यादा उल्‍टी. (सीधी होती हैं? कहीं होती होंगी तो मेरे यहां आकर उलट क्‍यों जाती हैं? या उन्‍हें लेते-पाते हुए मैं उल्‍टा क्‍यों, कैसे हो जाता हूं?.. ओह, इतने लम्‍बे अवकाशोपरांत वापस अपने कंप्‍यूटर का अपना की-बोर्ड हाथ आया और मैं, देखिए, कैसी उल्‍टी बहक बहक रहा हूं! क्‍यों बहक रहा हूं? कोई मुझे रोकेगा नहीं? टोकेगा? आप हाथ नहीं पकड़ि‍येगा? चलिए, मुंह ही पकड़ लीजिए)..

ख़ैर, बात यह है कि किसी नेक़दिल मित्र के यहां से होती हुए एक ग़ुमनाम मगर पहचानी हुई एक चिट्ठी पास पहुंची है. पहले एक नज़र आप भी मार लीजिए तब बात आगे बढ़ाते हैं. तो चिट्ठी का मज़मून है:


अजांग के लिए

प्रिय अज़ांग,

किसी ने बताया आपकी तबियत अच्छी नहीं है। बहुत खराब लगा। आप अकेला महसूस कर रहे होंगे। आना चाहती हूँ ....ऐसे में नहीं आई तो बेटियाँ किस काम की। अब आपकी तबियत कैसी है? मैं आपके लिये रोज़ पूजा करती हूँ जैसे आपने सिखाई थी। आप अपना ध्यान रखिये। जल्दी अच्छे हो जाइये। कहते हैं प्रसन्न मन हो तो ऐसे शरीर में रोग भी नहीं टिकता। सही कहते हैं क्या?

हो सकेगा तो मिलने ज़रूर आऊँगी।

आपकी
नानान


पढ़ लिया? मेरी तबियत का पूछ रही है. कहती है मेरे लिए पूजा करती है जैसी मैंने सिखाई थी! भइया, जीवन में जिसने कभी पूजा की नहीं उसने दो वर्ष की एक बच्‍ची को पूजा कैसे और कहां से सीखा दी? (वैसे मैंने तो नानान को अपनी नाक नोंचना और कपड़े खराब करना भी नहीं सिखाया था! हरामख़ोर चाची या उसकी वह बदजात मां गाओपिंग थी जिससे बेचारी भोली बच्‍ची इन दुगुर्णों की शिक्षा पाई होगी.. मुझसे तो प्‍यार और संस्‍कार ही पाती रही.. और फिर न पाने के लिए जुदा हो गई बेचारी! ओह, मेरे दिल की दुलरनी नानान कुसुम!)..

देखिए, किस चतुराई से नादान नानान के कंधे पर रखकर गोली दाग़ी जा रही है! एक नन्‍हीं बच्‍ची के शब्‍द लगते हैं ये? सवाल ही नहीं उठता. इनकी व्‍यस्‍कता अनक्‍वेश्‍चनेबल है! हां, यह सवाल ज़रूर है कि सेवाभाव की नक़ाबी आड़ में गाओपिंग को ऐसे लम्‍बे अंतराल पर एक बीमार से इस तरह प्रणय निवेदन करने की आवश्‍यकता क्‍यों पड़ी? और करनी ही पड़ी तो वह सीधे अपने अंतरंग मनोभाव मुझे प्रेषित नहीं कर सकती थी? या स्त्रियों का प्रणय, या कैसा भी निवेदन इसी तरह एम्‍बीगुअस बना रहता है? रहेगा? हमेशा?.. या कहीं ऐसा तो नहीं कि इस हितचिंता के पीछे गाओपिंग भी नहीं, अपनी पहचान छिपाती कोई अन्‍य नक़ाबधारी ताक़त छिपी बैठी है? (या खड़ी है सोयी है व्‍हाटेवर?) आई एम इंट्रिग्‍ड. हाऊ टू कैच द कलप्रिट? कोई आइडिया है आपके पास?..

7 comments:

  1. बहुत दिनों बाद आपको देखकर हम सब लोग खुश हैं. आशा करते हैं चीन यात्रा सफल रही होगी.

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  2. गुड है। आने दो देखा जायेगा।

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  3. नानाक के बहाने हमें अजदक तो पढ़ने को मिला !
    घुघूती बासूती

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  4. अभी तक मिलने भी नहीं आई.. हद है?

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  5. एक आइडिया है अपन के पास. अगली बार दिल्ली आएंगे तो बताएंगे.

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  6. बीमारी ने सच आपको पतनशील बना दिया है । नानान के सहज निश्च्छल निर्मल स्नेह के पीछे भी आप चोर सिपाही का खेल खेल रहे हैं ? डी दास को बुलाईये । वही मालूम करेगा कल्प्रिट कौन है ?

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  7. बिटिया नै बहुतै अच्छी चिट्ठी लिखी है . हमाओ आशीष दियो .

    वापै 'डाउट' करबे को कौनौ कारण नइयें .

    रही वाकी अम्मा की बात तो बे जानें और तुम जानौ . मियां-बीबी के लफड़ा में जो फंसै सो बेवकूफ़,उज़्बक और न जानै का का .

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