Thursday, November 22, 2007

डायरी के भीतर क्‍या है?..

कभी आपने डायरी लिखी है? क्‍या बेहूदा सवाल पूछ रहा हूं. कविता और डायरियां किसने नहीं लिखीं? कुछ चमड़ी के मोटे (मेरी तरह), थेथर, बेहया लोग होते हैं.. उम्र के बीतने के साथ भी बाज नहीं आते.. मगर आमतौर पर जीवनानुभव व समझ में शर्मसार होते हुए लोगों का कविता लिखना छूटता जाता है. डायरी लिखना तो और पहले छूट चुका होता है.. (आपने आखिरी मर्तबा कब लिखी थी? सच बताइएगा)..

वैसे मैं कुछ ज्‍यादा ही सामान्‍यीकरण तो नहीं कर रहा? कर ही रहा होऊंगा. आप मन की परतें खोल ढंग से सूचित नहीं करेंगे तो अपने पास राय बनाने व तथ्‍य टीपने के रास्‍ते क्‍या बचते हैं?.. नहीं बचते हैं.. मसलन ‘’जीवन व समाज में चिंता का स्‍थान’’ के बारे में मेरा कुछ ऑपिनियन है.. बात उठते ही पंजा गाल और ठोढ़ी पर चला जाता है. आंखों में गंभीरता चली आती है.. हो सकता है आपके न आती हो? हो सकता है ‘’जीवन व समाज में चिंता का स्‍थान’’ का प्रसंग उठते ही आप मुस्‍कराने लगते हों? दांत दिखाने लगते हों? मैं नहीं कह रहा कि वाक़ई में दिखाते ही हैं.. मगर जबतक अपन वस्‍तुस्थिति को लेकर ढंग से सूचित नहीं होंगे, सच्‍चाई कुछ की कुछ तो हो ही सकती है? कि मैं कुछ समझे हुए हूं और आप चमड़ी के मोटे न होकर भी डायरी लिखे मार रहे हों?..

अब ज़रा इस तथ्‍य पर गौर कीजिए.. स्‍टेशनरी की दुकानों के काउंटर व बाहर पटरी पर डायरियां थोक की थोक सजनी शुरू हो गई हैं.. तो हर वर्ष ऐसे ही थोड़ी सज जाती हैं?.. लोग आकर खरीदते होंगे इसीलिए सजती हैं.. और खरीदनेवाले सब मोटी चमड़ी के ही होंगे, या जुम्‍मा-जुम्‍मा जीवन का स्‍वाद लेना शुरू किये युवजन होंगे, ऐसा तो नहीं होगा.. होगा भी तो, कम से कम मुझे मानने में संकोच हो रहा है.. और लोग खरीदते हैं तो बारहों महीने न भी सही, कुछेक महीने तो ज़रूर ही उसके पृष्‍ठों पर वृतांतों की दर्ज़गी होती होगी? भई, सब हमारी तरह असमंजस और व्‍यर्थताबोध में थोड़ी गिरफ़्तार होंगे.. क्‍यों होंगे? अर्थपूर्ण, ऊटपटांग कुछ का कुछ तो लिखा ही जा रहा होगा? आज ‘स’ फिर दिखी, उन नज़रों की ताप में मैं सारे दिन दफ़्तर की एसी में जलता रहा. शाम को घर लौटते हुए भी, विदाऊट एसी. रात के खाने का इंतज़ार करते हुए भी आंखों के आगे ‘स’ की वही नज़रें तैरती रहीं. ‘द’ के पास पांच क्रेडिट कार्ड्स हैं और अब वह हमेशा हंसता रहता है! क्‍यों हंसता रहता है बहन.... क्‍या रेड्डी के बाद सचमुच वही प्रोमोट होनेवाला है? पापाजी इंदौर में मुन्‍नी के यहां इलाज के बाद हफ़्ते भर के लिए मेरे पास आने की ज़ि‍द कर रहे हैं, उन्‍हें रखूंगा कहां? व्‍हॉट एन ईडियट पापाजी इज़..

यही सब या और कुछ? अब डायरी में काहिरा, दमासकस, फ़ि‍लीस्‍तीन की ताज़ा हालत, दुनिया में आतंकवाद या परवेज़ मुशरर्फ़ के भविष्‍य की चिंता तो नहीं ही होनेवाली. वह तो हिंदी पत्रिकाओं के पृष्‍ठों पर भी महज़ परिपाटी के नाम पर होती है. तो फिर डायरियों में उनके पीछे कोई व्‍यर्थ में क्‍यों कांखे? फिर किसपे कांखे? आप कुछ बता नहीं रहे और मैं जाने क्‍या-क्‍या सोचकर जला जा रहा हूं..

8 comments:

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  2. डायरी के भीतर क्या है बहुत कम ही होंगे बताने वाले साहसी ! अपने द्वंद्व ,कुंठा ,पीडा को अब कौन बताता जताता है .... ! अब तो लॉक वाली डायरियां भी आने लगी हैं ! बच्चों के लिए रंगीन कार्टून छ्पी डायरियां भी हैं ..उसके शुरू में फेवरेट एक्ट्रेस ,खिलाडी हॉबीज..वगैरह को दर्ज करने के कॉलम्स भी होते हैं ...हम कहां जा रहे हैं ?

    22 नवंबर, 2007 12:02 अपराह्न

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  3. हमने तो बहुत साल पहले एक-दो बार लिखने की कोशिश की थी. पर चूंकि रेगुलर नहीं हो सके, लिहाजा छोड़ दी.

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  4. डायरी कुछ ऐसी भी हो सकती है , कि उसमें मनुष्य वह सब लिखे जो वह महसूस करता है और वह भी जो वह एक बाहर खड़े दर्शक की तरह अपने अन्दर देखता है । बहुत ही सुकून देने वाली और बहुत ही क्रूरता से अपना विश्लेषण करने वाली भी ।
    घुघूती बासूती

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  5. डायरी वायरी लिखना छोड़िए , आपके मेरे जैसे सब पागल लोग डायरी लिखते ही हैं। और कब कहां क्या बात दिल को छू गई और कहां किस बात पे आंख में से आंसू टपक पड़े थे लड़िकयों की डायरी में ये सब विवरण भी मिल जाएगा(वैसे मैं रोती नहीं हूं)
    पर आप मुझे हिन्दी लिखना सिखाने के लिए जयपुर आ रहे हैं अपना सामान पैक करिए , जो भी अगली गाड़ी मिलती है पकड़िए और जयपुर आइए। और यहीं से मिस्र और यूनान घूमने का प्रोग्राम तय कर लेंगे। लौटती डाक से जवाब भेज दीजिएगा, स्टेशन पर लेने भी तो आना पड़ेगा।

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  6. और हां आप भी कहां मेरे अखबार की स्पांसरशिप के चक्कर में पड़ गए, तो ईजिप्ट छोड़िए जयपुर भी ना आ पाएंगे, आप तो बस आ जाइए, स्पांसर हम कर देंगे। घर बहुत बड़ा ना सही, दिल तो बड़ा है।

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  7. Diary to kya kuch bhi likhne padne ki baat poochiye,bahut bahut dino tak kuch nahi ho pata ya jo log bahut kuch kar bhi rahe woh bhi kitna bhara hua hai, pata nahi, yatraon par diary jarur likhta tha, ab choonki yatrain bhio yatrain jaisi nahi hain isliye unki smritian kaid karne ki jarurat nahi banti, isliye diary ke page nahi bahrte. aisa kuch ho sake ki kuch yaad karne jaisa kuch likhoon iski iccha jarur abhi mari nahi hai, dekhiye kab yah sab fir se shuru hota hai,...
    sector 9 vasundhara, gzd se jossi sanjay

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  8. मैं भी दो चार दिनों से सोच ही रहा था की डायरी के बरे में कुछ लिखूँ. की तभी आपका लेख दिख गया आज. और सच कहूँ तो मेरा सोचने का नजरिया थोड़ा तो बदला ही. बाकि जब अपना लेख लिखूँगा तो आपको बता ही दूंगा.

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